सोमवार, 29 जुलाई 2019

हिप्नोटाइज - 15

दिव्या ने अमर को काॅल किया।

" हैलो! "

" हैलो अमर! मैं दिव्या बोल रही हूँ। "

" कैसी हो ? "

" ठीक हूँ। " - कहते हुए दिव्या बोली  - " अमर ! तुमसे मिलना था। क्या अभी तुम मेरे घर आ सकते हो ? "

" हाँ । "

□  □  □

कुछ ही देर में अमर दिव्या के सामने था।

वे दोनों इस समय दिव्या के घर के बाहर खड़े थे।

" अमर! " - दिव्या बोली  - " आधी अधूरी सच्चाई हमेशा घातक होती है। "

" तुम कहना क्या चाहती हो ? "

" कुछ कन्फ्यूजन है, तुमने जो अपने दोस्तों के बारे में बताया; हो सकता है कि वो पूरी तरह से सच न हो! "

" हो ही नहीं सकता। " - अमर जोर से बोला  - " मैंने जो कुछ भी तुम्हें बताया, वो बिल्कुल सच है और वैसे, तुम ये सब क्यों पूछ रही हो ? "

" अमर! एक बार, सिर्फ एक बार जो कुछ भी तुम्हारे साथ हुआ, उस पर फिर से विचार करो, हो सकता है कि तुम्हें कोई गलतफहमी हुई हो और दोबारा विचार करने से तुम्हारी गलतफहमी दूर हो जाये। "

" हो सकता है कि तुम सही हो। " - अमर कुछ सोचते हुए बोला  - " लेकिन, मेरे कुछ विचार करने या न करने से क्या फर्क पड़ेगा ? "

" अकेले विचार करने से फर्क नहीं पडेगा, लेकिन साथ मिलकर विचार करने से जरुर फर्क पड़ेगा। "

" साथ ? " - अमर चौंक उठा  - " किसके साथ ? "

" अपने दोस्तों के साथ, जो अंदर बैठे तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। "

" क्या ? कौन दोस्त ? "

" सचिन, सनी और भारती। "

अमर की आंखें आश्चर्य से चौड़ी होती चली गयी ।

" वे सब यहाँ क्या कर रहे हैं ? " - उसने पूछा।

" उन्हे मैंने बुलाया है ताकि आपसी गलतफहमियां दूर हो सके। बस एक बार अपने दोस्तों से मिल लो और सारे गिले- शिकवे दूर कर लो। "

" दिव्या! तुम बहुत अच्छी हो। " - अमर बोला - " पर, मैं नहीं। "

" क्या मतलब ? "

" मुझे किसी से नहीं मिलना। " - कहते हुए अमर वहां से जाने लगा।

" रुको अमर! " - दिव्या ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोकना चाहा- " मेरी खातिर सिर्फ एक बार अपने दोस्तों से मिल लो। "

अमर विवश था।

कोई ओर होता, तो अमर लापरवाही से वहां से जा चुका होता। लेकिन यह दिव्या थी, जो दोस्त के रुप में अमर के मन पर छा चुकी थी।

" ठीक है। " - अमर ने कहा  - " पर मेरा दावा है कि इससे कुछ भी फायदा नहीं होगा। "

" देखते है। "

दिव्या और अमर के भीतर दाखिल होते ही सब एकदम से खड़े हो गये।

" ये सब दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं है, मैं यहाँ पर सिर्फ दिव्या की वजह से आया हूँ। " - कहते हुए अमर बडी शान से वहीं रखे एक सोफे पर बैठ गया।

शनिवार, 27 जुलाई 2019

हिप्नोटाइज - 14

" क्या मतलब ? " - दिव्या ने पूछा।

" अमर के सबसे अच्छे दोस्त थे  - भारती, सनी और सचिन। " - रवि ने बताया - " ये तीनों कभी मतलबी नहीं हो सकते। "

दिव्या बोली - " लेकिन अमर ने खुद बताया कि इन दोस्तों ने जो कुछ किया, उससे अमर का जीवन तबाही की ओर बढ़ गया। "

" मैं नहीं मानता, अमर ऐसा सोच भी नहीं सकता। " - रवि ने आवेश में आकर कहा।

दिव्या ने पूछा  - " तब क्या मैं झूठ बोल रही हूँ ? "

" मुझे नहीं पता, लेकिन न तो अमर अपने दोस्तों को मतलबी कह सकता है और न ही उसके दोस्त मतलबी हो सकते हैं। " - रवि बोला  - " मैंने सोचा था कि तुम अमर को समझा सकोगी, लेकिन शायद मैं गलत था। "

" नहीं रवि! "

" नहीं। " - रवि टेबल से उठ खड़ा हुआ - " तुम बहुत बोल चुकी अमर के बारे में। "

" रवि! " - दिव्या अपने पर्स से मोबाइल निकालते हुए बोली  - " पहले ये रिकार्डिंग सुन लो, फिर जो कहना हो, कह देना। "

दिव्या ने मोबाइल की रिकार्डिंग चालू की।

रवि ध्यान से सुनने लगा।

अमर ने अपनी जो कहानी दिव्या को सुनायी थी, वो पूरी कहानी दिव्या ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर ली थी।

रवि जैसे जैसे सुनता गया, उसका दिल बैठता गया।

" अब बोलो रवि! " - पूरी रिकार्डिंग सुनाने के बाद दिव्या ने कहा।

" मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि अमर ये सब बोल सकता है। लेकिन आवाज़ उसी की है, तो यकीन तो करना पडेगा। पर, मैं ये भी कहूँगा कि अमर का दिमाग खराब हो गया है। "

" मैं समझी नहीं। "

" अमर झूठ बोल रहा है। सब झूठ है और मैं ये साबित भी कर सकता हूँ। "

" कैसे ? "

" सनी, सचिन और भारती से मिलकर। "

" क्या ? " - दिव्या चकित भी थी और खुश भी  - " क्या इनसे मिलना संभव है ? "

" हाँ। मेरे पास इन तीनों के मोबाइल नंबर है और अमर का नाम लेकर इन्हें कभी भी, कहीं भी बुलाया जा सकता है। "

दिव्या खुश होते हुए बोली  - " मैं नहीं मानती कि अमर कभी झूठ भी बोल सकता है और  तुम्हारा मानना है कि अमर के दोस्त मतलबी नहीं हो सकते। ऐसे में अगर अमर और उसके दोस्तों को एक ही जगह बुलाकर उन्हें सच बोलने को विवश किया जाये तो सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। "

" मुझे भी ऐसा ही लगता है। " - कहने को तो रवि कह गया, लेकिन वह कशमकश में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अमर ने ऐसी झूठी कहानी क्यों सुनायी ? और अगर अमर की कहानी सच थी तो उसके दोस्त अचानक इतना बदल कैसे गये ?

खैर, जल्द ही सच सामने आने वाला था।

□  □  □

शानदार तरीके से सजा हुआ दिव्या का घर!

रवि भारती, सचिन और सनी को फोन करके बुला चुका था।

सभी ड्राइंग रूम में सोफे और कुर्सियों पर बैठे थे।

हर किसी के चेहरे पर सिर्फ एक सवाल था - ' क्यों? '

आखिर पूरे एक साल बाद अमर ने उन्हें एकाएक ही मिलने के लिये क्यों बुलाया ?

दिव्या सबकी मन:स्थिति समझते हुए बोली - " जैसा कि आप सभी जानते हैं कि अमर ने अपने कदम एक ऐसे वन वे स्ट्रीट की ओर बढा दिये हैं, जहां से उसका लौट पाना लगभग असंभव ही है। "

" हाँ! " - भारती बोली - " हम सबको इसका बेहद अफ़सोस है और हमने कई बार अमर को समझाने की कोशिश की, लेकिन अमर तो हमारी सूरत तक देखने को तैयार नहीं और वह हमसे ऐसे बिहेव करता है जैसे हम उसके दोस्त नहीं, दुश्मन हो। "
कहते हुए भारती फूट - फूटकर रो पड़ी।

दिव्या को भारती की भावनायें सच्ची लगी। वह समझ नहीं पा रही थी कि अमर ने जो भारती के बारे में बताया वो सच था या जो वो देख रही थी वो सच था ?

" लेकिन सब ठीक हो सकता है। " - दिव्या बोली  - " अमर ने मुझे बताया है कि किस वजह से उसने गलत राह पकड़ी। "

" किस वजह से ? " -  सचिन ने पूछा।

" आप खुद ही सुन लो। " - कहते हुए दिव्या ने अपने मोबाइल की रिकार्डिंग चालू की।

जैसे जैसे रिकार्डिंग आगे बढती गयी, बारी बारी से भारती, सचिन और सनी के मुंह से बस यही शब्द निकले - " यह झूठ है, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। "

" तब अमर ने झूठ बोला ? " - दिव्या ने पूछा।

" नहीं। " - सनी चीखा  - " अमर कभी झूठ नहीं बोल सकता। "

" यह कैसे हो सकता है ? " - दिव्या बोली - " न अमर झूठ बोल सकता है और न ही तुम लोगों की बातें झूठी लग रही है। फिर अमर के साथ जो कुछ भी हुआ, उसकी वास्तविक वजह क्या है ? यह सवाल तो एक अजीब सी पहेली बनकर रह गया है। "

भारती बोली - " हमें अमर को भी यहाँ बुला लेना चाहिए, शायद कुछ मदद मिल सके। "

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

हिप्नोटाइज - 13

" तो तुम अपने मतलबी दोस्तों की वजह से भीतर ही भीतर टूट कर बिखर गये। " - पूरी कहानी सुनने के बाद दिव्या बोली।

" हाँ। " - अमर ने कहा।

" अब हमें चलना चाहिये अमर! "

" क्या ? यूँ  अचानक ? "

" हाँ अमर! "

" पर क्यों ? "

" बस यूँ ही। "

" ओके। "

वे कैसीनो से बाहर आये।

अमर ने कार स्टार्ट की।

दिव्या को उसके घर ड्राॅप करके उसने अपने घर की राह ली।

□  □  □

" रवि! तुम अमर को कब से जानते हो ? " - दिव्या ने पूछा।

वे दोनों इस समय काॅलेज की कैंटिन में बैठे काॅफी पी रहे थे।

" बचपन से। " - रवि ने बताया - " मैं अमर के पडौस में ही रहता हूँ। हम हमेशा से अच्छे दोस्त रहे है।  मुझे उसकी काॅलेज लाइफ के बारे में ज्यादा नहीं पता। फिर भी वह मुझसे अपनी हर बात शेयर करता था। "

" अपने काॅलेज के दोस्तों के बारे में बताया कभी उसने ? "

" हाँ। "

दिव्या की आंखें खुशी से चमक उठी।

" भारती, सनी और सचिन के बारे में भी बताया होगा फिर तो ? " - दिव्या ने पूछा।

" हाँ, ये तीनों तो उसके बेस्ट फ्रेंड थे। " - बताते हुए रवि ने पूछा  - " लेकिन तुम इन सबके बारे में क्यों पूछ रही हो ?

दिव्या हल्के से मुसकरायी।

" तुम अमर से मिली थी ? " - रवि संशयात्मक स्वर में पूछ बैठा।

दिव्या ने सहमति में सिर हिलाया।

" कुछ बताया उसने ? "

" तभी तो मुझे उसके दोस्तों के नाम मालूम हुए। "

रवि ने दिव्या को ऐसे देखा, मानो वह कोई इंसान न होकर कोई महान जादूगरनी हो।

" तुम महान हो दिव्या! " - रवि के मुंह से निकला - तुम बहुत महान हो। जो इंसान अपने अतीत के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करता, उसने तुम्हें अपने दोस्तों के नाम तक बता दिये! "

" सिर्फ नाम ही नहीं बताये। " - दिव्या बोली - " बल्कि उसने अपने नशेबाज बनने की पूरी ट्रेजडी ही समझा दी । "

" क्या ? " - रवि बुरी तरह से चौंक उठा - " तो उसने तुम्हें बता दिया कि वह नशेबाज कैसे बना ? "

" हाँ रवि! उसने मुझे सब कुछ बता दिया है। " - दिव्या ने बताया।

" तो तुम्हें क्या लगता है ? क्या वह सुधर सकता है ? " - रवि ने बैचैनी से पूछा।

" तुमने कभी किसी से प्यार किया है ? " - दिव्या ने बहुत सीरियस होकर पूछा।

" क्या ? "

" रवि! प्यार में जब किसी का दिल टूटता है ना, तो उसका जीना और मरना एक जैसा हो जाता है। ऐसे में उसके सामने सिर्फ दो रास्ते होते है या तो वह जीना छोड़ दे या फिर शराब के सहारे धीमी मौत को अपना ले और अमर ने अपने लिए दूसरा रास्ता चुन लिया। " - बोलते - बोलते दिव्या की आंखें नम हो आयी।

रवि ने संदेहपूर्ण निगाहों से दिव्या की ओर देखा।

" क्या हुआ रवि ? " - दिव्या ने पूछा।

" कुछ नहीं। " - रवि बोला - " अमर ने कभी बताया नहीं कि उसकी कोई प्रेमिका भी है। "

दिव्या मुसकरायी - " मुझे भी नहीं बताया। "

रवि फिर चौंका - " पर अभी जो तुमने कहा...."

" रवि! " - दिव्या बोली  - " यह जरूरी नहीं कि प्यार हमेशा किसी लड़की से ही किया जाये; प्यार सिर्फ एक भावना है जिसके जरिये हर इंसान अपने भीतर की एक भावनात्मक जरुरत को पूरी करता है। इसके लिए वह अलग - अलग माध्यम अपनाता है, जैसे  - माता-पिता, भाई-बहन, प्रेमिका, दोस्त। जिस माध्यम से उसकी प्रेम संबंधी भावना अधिक सशक्त रुप से संतुष्ट होती है,उससे उसका रिश्ता गहरा होता जाता है। हम ऐसी घटनायें अक्सर पढते-सुनते हैं कि किसी इंसान को अपने घर-परिवार में माता-पिता या भाई-बहन से वो प्यार नहीं मिला, जिसकी उसे दरकार थी और वही प्यार जब उसे बाहर किसी से मिला तो उसने उस अजनबी के लिये अपना घर-परिवार तक छोड़ दिया। "

" तुम्हारा संकेत उन नौजवानों की तरफ है, जो चार दिन के प्यार के लिये अपने परिवार के मान  - सम्मान की परवाह किये बगैर भागकर शादी कर लेते है ? " - रवि ने कहा।

" हाँ। " - दिव्या बोली - " और अमर के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है। बचपन में ही मां के देहांत के बाद अमर एकाएक ही अकेला पड़ गया। पापा थे, लेकिन अपने बिजनेस की वजह से वो अमर को अधिक समय नहीं दे पाते थे और यही वजह थी कि अमर की भावनात्मक जरुरतें पूरी न हो पायी। "

रवि बुरी तरह से चकित था।

दिव्या की केस स्टडी, सोचने का तरीका, किसी भी इंसान के अंदर गहराई तक घुस जाने की प्रवृत्ति और उसका साइकोलाॅजिकल व्यू  - सब कुछ अद्भुत था।

दिव्या आगे बोली  - " अपनी भावनात्मक जरुरतें पूरी करने के लिए अमर ने एक माध्यम खोज निकाला, वह माध्यम था- उसके दोस्त। दोस्तों से उसका रिश्ता गहरा होता गया और जब उसे यह पता चला कि उसके दोस्तों की दोस्ती सिर्फ पैसों के लिये थी तो अमर बुरी तरह से टूटकर बिखर गया। "

" लेकिन, यह झूठ है। " - अचानक से रवि चीखा - " अमर के सभी दोस्तों की दोस्ती सच्ची थी, उनकी दोस्ती की वजह पैसा कभी नहीं रहा। "

दिव्या स्तब्ध रह गयी।

रविवार, 14 जुलाई 2019

हिप्नोटाइज - 12

" अमर! तुम चिंता मत करो, तुम सनी के रुम पर रह सकते हो। " - सचिन ने कहा।

" यह कैसे हो सकता है ? " - एकाएक ही सनी बोल उठा  - " मैं खुद अपने गांव से दूर यहाँ शहर में रुम किराये से लेकर रह रहा हूँ और पिछले तीन महीने से रुम का किराया भी बाकी है। ऐसे में मेरा मकान मालिक किसी और को रखने के लिये कभी राजी नहीं होगा।..... सचिन! तुम अपने घर ले जाओ न अमर को। "

" मैं जरुर करता ऐसा पर, मेरे पापा कभी इसके लिए तैयार नहीं होंगे। " - सचिन ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा।

अब काफी देर से चुप खडी भारती से सहा नहीं गया।

वह बोल उठी  - " तुम लोगों को जब भी किसी मदद की जरूरत होती, अमर करता था और आज जब अमर को मदद की जरूरत है तो तुम सब पीछे हट रहे हो ? लानत है ऐसे दोस्तों पर। "

" तो तुम खुद क्यों नहीं ले जाती अमर को अपने घर ? " - सचिन बोला।

" मैं जरुर लेकर जाऊंगी, पर कुछ दिनों बाद। "

" कुछ दिनों बाद क्यों ? अभी क्यों नहीं ? "

" अभी मेरी नानी घर पर आयी हुई है और वे बहुत पुराने विचारों वाली है। वो चली जाये, फिर ....."

अमर अन्दर ही अन्दर बुरी तरह से टूट चुका था।

जो कुछ वह सुन रहा था, उस पर भरोसा करना उसे नामुमकिन सा लग रहा था। लेकिन फिर भी जो कुछ वह देख रहा था, सुन रहा था, महसूस कर रहा था - वही सच था। और आज नहीं तो कल, उसे यह सच स्वीकार करना ही था।

ये उसके वही दोस्त थे, जिनको उसने अपनी जिन्दगी मान रखा था।

सब एकदम से कैसे बदल गये!

अमर का मन हुआ कि वह खूब जोर जोर से रोये , चीखे।

लेकिन, फिलहाल अमर ऐसा कुछ कर नहीं सकता था। क्योंकि अभी उसे अपने इस नाटक का अंतिम पार्ट खेलना था।

" तुम लोग परेशान मत हो। " - अमर बोला - " मैं किसी होटल में रह लूंगा। "

" तुम्हारी लाइफस्टाइल से हम वाकिफ है अमर! " - " अमर के कंधे पर हाथ रखते हुए भारती ने पूछा  - " लेकिन अब, जबकि तुम्हारे पापा ने तुम्हें घर से बाहर निकाल दिया है तो...."

" तो ? "

" तो होटल में रहना तुम्हारे लिये बहुत महंगा पड जायेगा। तुम पैसे कहाँ से लाओगे ? "

" पैसे ? " - अमर बोला  - " मेरे बैंक अकाउंट में कम से कम एक लाख रुपये तो होंगे ही। तो फिलहाल मुझे पैसों की चिंता..."

" क्या हुआ अमर ? " - भारती ने चिन्तित स्वर में पूछा।

" मुझे डर है कि पापा कहीं मेरा अकाउंट बन्द न करवा दें। अगर मैं अपना सारा पैसा किसी और अकाउंट में ट्रांसफर करवाना चाहूँ भी तो किसके अकाउंट में करवाऊं ? समझ नहीं आ रहा। " - अमर ने परेशान होते हुए कहा।

" मेरे अकाउंट में करवा दो। " - तीनों दोस्तों के मुंह से एक साथ निकला।

अमर अपने तीनों दोस्तों को और तीनों दोस्त अमर को अजीब ढंग से देखते रह गये।

" किसके अकाउंट में ? " - अमर के मुंह से फिर निकला।

" मेरे अकाउंट में। " - तीनों फिर बेशर्मी से बोले।

□  □  □

अमर ने अपनी पैप्सी खत्म की और बोला  - " बस उस दिन के बाद से न मैंने अपने उन मतलबी दोस्तों को पलटकर देखा और न ही कभी उस इंजीनियरिंग काॅलेज की ओर रुख किया।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

चीटफंड कम्पनी

चीटफंड कम्पनी की एक मीटिंग!

" हम एक नया प्रोजेक्ट लाये हैं,


अतुल धन-सम्पदा कमाने को हमने


कई हथकण्डे अपनाए है।


हो नहीं पाये सफल अभी तक हम,


नहीं है फिर भी कोई गम।"


- भूमिका बांधने के साथ ही कम्पनी के प्रेसीडेंट ने अपना वक्तव्य शुरू किया।


" क्योंकि आज हम चीटफंड कम्पनी के जरिये लोगों को चीट कर करके फंड जमा करेंगे। लोग हमसे फंड  के रिफंड की आशा करेंगे और हम सारा फंड लेकर रफूचक्कर हो जायेंगे। "


" लेकिन यह संभव होगा कैसे ?


हम तो अक्सर ही हारते रहे है वैसे। " - एक कर्मचारी ने सवाल दागा।


" नहीं करो तुम जरा भी फिक्र,


कर रहा हूँ अब मैं बस इसी मुद्दे का जिक्र। " प्रेसीडेंट की वाणी में उत्साह था।


" हमारी कम्पनी का हर एक कर्मचारी अपने नीचे एक आदमी को जोडेगा, जुडने वाला आदमी ज्वाइनिंग फीस के रुप में 1000 रुपये जमा करेगा। यह 1000 रुपया सीधे चीटफंड कम्पनी के खाते में जमा होगा। कम्पनी उस आदमी को लाइफ टाइम हर महीने 100 रुपये रिफंड देगी। वह आदमी अपने नीचे दो आदमियों को जोडेगा और वे दो आदमी भी अपने नीचे दो- दो आदमियों को जोडेंगे। इस तरह से आदमी जुडते जायेंगे, हमारी कम्पनी का प्रोफिट बढता जायेगा और हम जुडने वाले हर आदमी को 100 रुपये हर महीने देते जायेंगे। "


मीटिंग में उपस्थित सभी कर्मचारी पेशोपेश में पड गये।


" लेकिन, इससे हमें क्या लाभ होगा ? " - एक कर्मचारी ने साहस करके पूछा।


प्रेसीडेंट ने हल्के से मुसकराते हुए कहा- " 6 महीने में ही हमारे चंगुल में  लाखों मुफ्तखोर फंस जायेंगे और सातवें महीने में हम कम्पनी बंद करके रफूचक्कर हो जायेंगे। "

प्रेसीडेंट की बुद्धीमत्ता पर हाॅल तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा।

सभा की सफलता पर सबने एक दूसरे को बधाई दी।

इसी के साथ मीटिंग समाप्त हुई।


बुधवार, 10 जुलाई 2019

हिप्नोटाइज - 11

आज की रात अमर की आंखों में नींद नहीं थी।
उसने तो बस यूँ ही अपने दोस्तों का एक छोटा सा इम्तिहान लेना चाहा था।

बचपन से पढता सुनता आ रहा था कि किसी से दोस्ती करते समय उसे परख लेना चाहिए, मगर अमर ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया।

भारती की उसने हमेशा हर मुमकिन मदद की थी।

सचिन की टीम के दो खिलाड़ी ऐन वक्त पर मैच खेलने से मुकर गये, तब अमर ने ही दो नये खिलाड़ियों को तत्काल तैयार किया।

और आज उसी सचिन ने उसकी मदद करने से मना कर दिया।

लेकिन, भारती केमिस्ट्री में कमजोर है और परीक्षा भी नजदीक ही है।
सचिन अपना लकी बेट नहीं दे सकता।

उनकी अपनी जरुरतें है, उनकी अपनी मजबूरियाँ!

" मुझे अपने दोस्तों पर अब भी पूरा भरोसा है। मैं बस एक अंतिम इम्तिहान और लूंगा। फिर यह साबित हो जायेगा कि मेरे दोस्त सच्चे है। "

अमर को अपने दोस्तों पर पूरा भरोसा था।
इन छोटी- मोटी घटनाओं से अमर का भरोसा डिग सकता था, टूट नहीं सकता था।

भरोसा टूटने के लिये एक और इम्तिहान लेने की योजना तैयार की जा चुकी थी और इस बार घटना भी बडी घटने वाली थी।

□  □  □

" तुमने हमें यहाँ क्यों बुलाया अमर ? "  -  सनी ने पूछा।

काॅलेज के पास वाले पार्क में वे सब इकट्ठा हुए थे।

भारती, सचिन, सनी  और अमर!

" मुझे पापा ने घर से बाहर निकाल दिया है। " - अमर ने बताया।

" क्या ? " - सचिन बुरी तरह से चौंक उठा  - " पर, यह कैसे हो सकता है ? "
" अमर! तुम बहुत अच्छे लडके हो। तुम्हें घर से निकालने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है ? " - भारती बोली।
" हुआ क्या है अमर! " - सनी ने पूछा  - " साफ  - साफ कहो। "

अमर ने बताना शुरू किया - " कल मेरे शर्ट की जेब में सिगरेट का एक पैकेट रह गया, जो सनी का ही था। पापा ने  उसे देख लिया और तुम लोग तो जानते ही हो कि पापा को किसी भी तरह के नशे से सख्त नफरत है। बस, उन्होंने यही समझा कि मैंने सिगरेट पीना शुरू कर दिया है। "

" और बस इतनी सी बात पर उन्होंने तुम्हें घर से बाहर निकाल दिया ? " - सनी ने पूछा।

व्यंग्य से मुसकराते हुए अमर बोला - " तुम्हारे लिये यह इतनी सी बात है, क्योंकि तुम सिगरेट भी पी लेते हो और शराब भी। तुम्हारा इनसे रोज वास्ता पडता है, इसीलिये तुम्हारे लिये यह आम बात है, लेकिन जो सिगरेट- शराब को छूते तक नहीं है उनके लिये यह बहुत बडी बात है। "

" तो अब ? "

" पापा ने मुझे यह कहते हुए घर से बाहर निकाल दिया है कि आज अगर मैं सिगरेट पी सकता हूँ, तो कल शराब भी पी सकता हूँ और फिर ड्रग्स भी ले सकता हूँ। " - भावुक होते हुए अमर बोला।

" अब तुम क्या करोगे अमर ? " - भारती ने पूछा।

" यही तो समझ नहीं आ रहा और इसीलिये तुम लोगों को मैंने यहाँ बुलाया है। " - अमर बोला  - " तुम सबकी हमेशा मैंने मदद की है, आज मुझे मदद की जरूरत है।"

" मैं उन्हें बता देता हूँ कि वह सिगरेट का पैकेट मेरा ही था। " - सनी ने कहा।

" कोई फायदा नहीं। " - अमर बोला  - " मैं  उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ। एक बार जो कह देते हैं, फिर पीछे नहीं हटते और वैसे भी अगर उन्हें पता चला कि मेरे सिगरेट पीने वाले दोस्त भी है, तब तो उन्हें पूरा यकीन हो जायेगा कि मैं भी नशेबाज ही हूँ। फिलहाल तो मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि अब मैं रहूंगा कहाँ। "

सब एकदम से चुप हो गये।

शनिवार, 29 जून 2019

हिप्नोटाइज - 10

भारती की क्लास जैसे ही खत्म हुई, उसने बाहर अमर को देखा।
" अमर! "
" भारती! " - अमर मुसकराते हुए बोला - " कैसी हो ? "
" अच्छी हूँ। तुम आज क्लास के बाहर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। कुछ खास है आज ? "
" नहीं। ऐसा कुछ नहीं है। बस एक छोटा सा काम था तुमसे। "
" अच्छा! " - भारती बोली - " मुझसे कुछ काम था तुमको ? "
" हाँ। "
" बोलो ना क्या काम है ? " - भारती सीधे अमर की आंखों में देखते हुए बोली  - " तुम्हारे लिये तो जान भी हाजिर है अमर! "
" मुझे तो बस तुम्हारे नोट्स चाहिए थे कैमिस्ट्री के। " - अमर ने बताया।
" केमिस्ट्री के नोट्स ? " - भारती थोडी नर्वस हुई।
" क्या हुआ ? "
" अमर! कुछ ही दिनों में परीक्षा शुरू होने वाली है और तुम तो जानते ही हो कि मैं केमिस्ट्री में बहुत कमजोर हूँ। "
" तो ? "
" साॅरी अमर! मैं तुम्हें अपने नोट्स नहीं दे सकती। " - भारती ने बहुत ही बेरुखी से जवाब दिया।
" पर, भारती! " - अमर ने कहा - " मैं कल लौटा दूंगा। सिर्फ एक दिन के लिये। "
" अमर! तुमने कुछ और मांगा होता तो मैं कभी मना नहीं करती, पर नोट्स नहीं दे सकती। "
अमर को गहरा धक्का सा लगा।
फिर भी अपनी भावनायें छिपाते हुए वह बोला  - " इट्स ओके भारती! "
" अमर! " - भारती ने बात टालने के लिये कहा  - " कैंटिन चलें, काॅफी पीने ? "
अमर का मन तो नहीं था, लेकिन वो एकाएक इनकार करता तो भारती को बुरा लग सकता था।
बस इसीलिये उसने चेहरे पर हल्की सी बनावटी मुसकान लाते हुए कहा  - " हाँ, जरूर। "
काॅफी पीते समय भी अमर अपने ही विचारों में खोया था।
" परीक्षा नजदीक है और भारती की केमिस्ट्री कमजोर है, इसलिए उसने नोट्स देने से मना किया। नहीं तो भारती कभी किसी चीज के लिये मना नहीं करती। " - अमर खुद को तसल्ली दे रहा था।
लेकिन चाहे जो हो, एक परीक्षा भारती को देनी थी जिसका परिणाम भविष्य को तय करना था और एक परीक्षा अमर ले चुका था जिसमें भारती न केवल फेल हुई थी, बल्कि बहुत खराब प्रदर्शन के साथ बुरी तरह से फेल हुई थी।

□  □  □

" सचिन! क्या तुम मेरी हेल्प कर सकते हो ? " - अमर और सचिन काॅलेज में लंच टाइम में बस यूँ ही घूम रहे थे, तब अमर ने पूछा।
" हाँ अमर! बोलो ना। तुम्हारे लिये तो जान भी हाजिर है। "
अमर का मन खुश हो गया सचिन के जोशीले शब्द सुनकर।
" मुझे तुम्हारा 'बेट' चाहिए। " - अमर के मुंह से बेट शब्द  सुनते ही सचिन बुरी तरह से चौंक उठा।
" अमर! "
" क्या हुआ सचिन ? "
" तुम जानते हो ना, मेरे पास सिर्फ एक ही बेट है। "
" तो ? "
" और वो मेरा लकी बेट है। "
" जानता हूँ । " - अमर बोला  - " तभी तो मुझे चाहिए, ताकि उससे खेलकर मैं मैच जीत सकूँ। "
" जब जानते हो। " - सचिन एक - एक शब्द पर जोर देते हुए बोला  - " तो यह भी जान लो कि मैं वह बेट तुम्हें नहीं दे सकता। "
" एक दिन के लिये भी नहीं ? "
" नहीं अमर! मुझे माफ कर देना। " - कहते हुए सचिन जाने लगा।
" सचिन! " - अमर ने पीछे से आवाज़ देते हुए कहा  - " तुम्हें मैं उस बेट की मंहमांगी कीमत दूंगा, बस एक दिन के लिये मुझे वह बेट दे दो। "
सचिन ने पहले घूमकर देखा, फिर कुछ कदम पीछे लौटकर आया और बोला  - " हर चीज़ को तुम पैसों से नहीं खरीद सकते अमर! वह बेट मेरे पापा ने मुझे मेरे 18वें बर्थड़े पर दिया था। वह सिर्फ मेरा लकी बेट ही नहीं, मेरे लिये एक अनमोल तोहफा भी है। मगर, तोहफे की कीमत तुम क्या समझोगे; तुम्हारे लिये तो पैसा ही सबकुछ है। "
फिर सचिन नहीं रुका।
वह चला गया।
और पीछे छोड़ गया मुट्ठियाँ भींचते हुए, आंखों से निकलने को बेताब आंसुओं को रोकने की भरपूर चेष्टा करते हुए अमर को।

□  □  □