अंधेरे का साया
रात का वक़्त था। बादल गरज रहे थे , बिजलियां चमक रही थी। मूसलाधार बारिश अपना कहर ढा रही थी।
ऐसे कयामती मौसम में भी एक साया सड़क के बीचोबीच बिना किसी खौफ के चला जा रहा था। मजबूत देह , कसरती शरीर और तेज कदमों वाला वह शख्स ब्लैक कलर का ही रेनकोट पहने हुए था।
उसकी चाल से इतना तो तय था कि उसे अपने लक्ष्य का भान अवश्य है।
लेकिन , आधी रात के वक़्त यूँ बीच सड़क पर चलने का उद्देश्य भला क्या हो सकता है !
जल्द ही वह साया एक नाईट क्लब में दाखिल हुआ।
वहाँ उसने ढेर सारी शराब अपने हलक से नीचे उतारी।
नशे के अतिरेक ने उसकी आंतरिक भावनाओं को उसके अधरों के माध्यम से सबके सामने व्यक्त कर दिया।
" मैं ' अँधेरे का साया ' हूँ। " - उसने बोलना शुरू किया - " एक पैगाम लाया हूँ। मेरी मजबूत कद - काठी पर ना जाना दोस्तों। भीतर से बहुत कमजोर हूँ मैं। अपनी इसी शराब पीने की बुरी आदत ने आज मेरा घर तोड़ दिया। आज ही तलाक हुआ है मेरा। मेरी प्यारी पत्नी ने मेरी मासूम बच्ची के साथ मेरा घर छोड़ दिया।...अब भटकता फिरूँगा , बस यूं ही सुनसान सड़कों पर , अँधेरी रातों में। अँधेरे का साया हूँ , एक पैगाम लाया हूँ। "

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