मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 18

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 18

11.30 बजे थे।

कार ड्राइव करते हुए साकेत काव्या के घर की ओर चल पडा।

करीब 20 - 25 मिनट बाद उसकी कार एक घर के सामने रूकी। 

वह कार से निकला।

घर बहुत बड़ा तो नहीं , लेकिन अपने आकार से सम्पन्न लोगों का निकेतन अवश्य लग रहा था।

साकेत ने काॅलबैल बजायी और कुछ देर प्रतीक्षा की।

जल्द ही दरवाजा खुला और गेट पर एक महिला प्रकट हुई।

" मैं साकेत अग्निहोत्री हूँ , प्राइवेट डिटेक्टिव ! "

महिला ने प्रश्नसूचक नैत्रों से देखा।

" मैं काव्या की गुमशुदगी के विषय में छानबीन कर रहा हूँ।"

" भीतर आइये। " 

वे ड्राइंग रूम में पहुंचे।

" बैठिये। " - एक सोफे की ओर संकेत करते हुए महिला बोली।

" आप शायद काव्या की मां है ! "

" जी हाँ। "

" घर में और कोई नहीं है ? " 

" जी नहीं। " - महिला ने जवाब दिया - " काव्या के पिता अभी बाहर है , शाम तक लौटेंगे। "

" अच्छा ! "

" हमने पुलिस में रिपोर्ट तो दर्ज करवायी है , फिर आप...आपको पुलिस वालों ने भेजा है ? "

" नहीं। मैं एक दूसरे केस के सिलसिले में आर्ट्स काॅलेज गया था। प्रिंसिपल महेंद्र चौबीसा ने मुझे काव्या के बारे में बताया। "

" ओह ! "

" अंतिम बार आपने काव्या को कब देखा था ? "

" 12 तारीख को। सुबह काॅलेज के लिये निकली थी , फिर नहीं लौटी। " - बोलते - बोलते काव्या की मां रोने लगी।

साकेत ने ध्यान दिया , महिला की आंखें थकी हुई थी। साफ मालूम पड रहा था कि उसने रो - रोकर अपनी आंखें थका दी थी।

" उस दिन मूड कैसा था उसका ? "

" मूड ? " - काव्या की मां थोड़ा चौंकते हुए बोली - " अब क्या बताऊँ , पिछले कुछ दिनों से वह काफी परेशान लग रही थी। मैंने कई बार परेशानी की वजह भी पूछी , लेकिन उसने कुछ नहीं बताया।...उस दिन मतलब , 12 तारीख को भी वह काफी परेशान थी , उसने खाना तक ढंग से नहीं खाया था और जब मैंने उसे ठीक से खाने के लिये कहा , तो मुझ पर ही बरस पडी। " 

" क्या मैं काव्या का रूम देख सकता हूँ ? " 

" जरूर। " - कहते हुए महिला उसे काव्या के रूम की ओर ले चली।

साकेत ने कमरे में एक सरसरी निगाह दौडायी।

कमरे का कुछ सामान इधर - उधर बिखरा पड़ा था।

" रूम को देखकर लगता है कि काव्या सफाई और साज सज्जा के मामले में थोड़ी लापरवाह है। " - साकेत बोला।

" आपका अंदाजा बिल्कुल गलत है। " - काव्या की मां ने कहा - " काव्या को हर चीज़ को व्यवस्थित ढंग से रखना पसंद है। "

" लेकिन , कमरे की हालत तो कुछ और ही बता रही है। " - साकेत ने फर्श पर रखे कुछ सामान को उठाकर पलंग पर रखते हुए कहा।

" मैंने बताया ना , पिछले कुछ दिनों से वह काफी परेशान थी। " 

" ओह ! " 

साकेत ने फर्श पर रखे एक ब्लेंक पेपर को उठाकर बस यूँ ही पलटा। 

उसके दूसरी तरफ कुछ लिखा हुआ था और जो लिखा हुआ था , वह इतना विस्फोटक था कि एकाएक ही साकेत को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। लेकिन , आंखों देखी हकीकत को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता !

पेपर तीन शब्द लिखे हुए थे , महज़ तीन शब्द !...जिन्होंने साकेत के दिमाग में भूकम्प मचाकर रख दिया।

वे तीन शब्द , जो हर युवा दिल की धडकनों में समाये रहते हैं। 

काव्या के रूम से मिले उस पेपर पर लिखे हुए वे तीन शब्द थे - " आई लव आकाश ! "

" आप आकाश को जानती हैं ? " - एकाएक ही साकेत पूछ बैठा।

" आकाश ? " - काव्या की मां ने दिमाग पर जोर देते हुए कहा - " हाँ , आकाश नाम का एक लड़का काव्या के काॅलेज में है तो सही। दो - तीन बार मिली भी हूँ उससे। बड़ा सीधा लड़का है। "

साकेत फिर चौंका - " आप आकाश से मिली है ?...कब ? ...कहाँ ? "

" यहीं , काव्या उसे घर लायी थी। " - काव्या की मां बोली - " लेकिन , आपको अचानक आकाश के बारे में पूछना कैसे सूझा ? "

साकेत ने दोबारा अपने हाथ में थमे उस पेपर को देखा , फिर कहा - " कुछ नहीं , बस यूँ ही। मैं जिस केस की इन्वेस्टीगेशन कर रहा हूँ , आकाश उसकी बड़ी अहम कड़ी है। "

" अच्छा ! "

" आप बता सकती है कि आकाश और काव्या एक - दूसरे को कब से जानते हैं ? " - पूछने के साथ ही साकेत ने बड़ी सफाई से वह पेपर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

" जानने को तो , जब एक काॅलेज , एक ही क्लास में पढते हैं तो लम्बे समय से जानते होंगे। लेकिन , मुझे तो इन दोनों की दोस्ती के बारे में तभी पता चला , जब एक दिन काव्या ने बातों ही बातों में मुझे यह बताया कि उसकी क्लास में एक बड़ा मासूम - सा लड़का पढता है , जिसका नाम आकाश है। "

" काव्या ने खुद अपने मन से आपको यह बात बतायी ? " - साकेत ने पूछा।

" हाँ और यह कोई बहुत बड़ी बात तो है नहीं , क्योंकि काव्या अक्सर अपने काॅलेज और दोस्तों के बारे में मुझे बताती रहती है। मुझे तो उसके कई दोस्तों के नाम याद भी हो गये हैं। लेकिन , आकाश का नाम तो कुछ दिन पहले ही सुनने को मिला है। "

" कुछ दिन पहले ? " - साकेत का माथा ठनका - " कितने दिन पहले ? "

" अब तारीख वगैरह तो ठीक से याद नहीं , लेकिन यही कोई महीना भर पहले काव्या ने उसका जिक्र किया था और उसके बाद तो लगभग हर रोज उसके बारे में कुछ न कुछ बताती ही रहती थी। "

" आपको ठीक से याद है , महीने भर पहले ही आपने उसका नाम पहली बार सुना था ? "

" हाँ , याददाश्त मेरी कमजोर नहीं है। लेकिन , बात इतनी मामूली है कि तारीख वगैरह ध्यान नहीं रही। फिर भी इतना दावे से कह सकती हूँ कि एक महीने से ऊपर की बात यह है नहीं और जब काव्या ने उस लड़के की कुछ ज्यादा ही तारीफें की , तो मैंने खुद उससे कहा कि तुम्हारा यह दोस्त इतना अच्छा है तो उसे कभी चाय पर इनवाइट करो। इसी बहाने मैं भी उससे मिल लूंगी।...मुझे अच्छी तरह से याद है , उसके बाद वह लड़का कम से कम तीन बार हमारे घर पर आया था और मुझे तो वह आकाश ठीक ही लगा , सीधा और संस्कारी। "

" आपके सहयोग के लिये धन्यवाद। " - साकेत बोला - " अब मैं चलता हूँ। " 

" मेरी बेटी मिल तो जायेगी ना ? "

" हम कोशिश कर रहे हैं , उम्मीद है जल्द ही सफलता मिलेगी। " 

जल्द ही साकेत बाहर निकल आया और कार में बैठा।

उसे फिर से आकाश से मिलने की जरूरत महसूस हो रही थी , लेकिन आकाश से मिलने से पहले उसे किसी और से भी मिलना था।

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