मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 19
करीब 1.10 बजे कार एक घर के सामने रूकी।
साकेत ने ध्यान दिया , मकान बहुत ही सामान्य था। गनीमत यही थी कि घर पक्का था और दीवारें मजबूत।
साकेत घर के मेनगेट पर पहुंचा। ढूंढने पर भी काॅलबैल नहीं दिखी , तो उसने हाथ से 2 - 3 बार गेट को बजाया।
करीब 5 मिनट की प्रतीक्षा के बाद गेट खुला।
" कहिये। " - गुस्से भरे स्वर में एक सज्जन बोला।
करीब 38 वर्षीय सांवले चेहरे वाला वह व्यक्ति न मिलनसार दिख रहा था और न ही अचानक से एक अजनबी के यूँ आ धमकने से खुश।
साकेत ने वस्तु स्थिति को जल्द ही समझ लिया।
" मैं साकेत अग्निहोत्री हूँ , प्राइवेट डिटेक्टिव और सलोनी की गुमशुदगी के बारे में पूछताछ करने आया हूँ। "
डिटेक्टिव शब्द सुनते ही उस व्यक्ति के चेहरे से गुस्सा काफूर हो गया।
अपने शब्दों में मिश्री घोलते हुए वह बोला - " रिपोर्ट तो हमने पुलिस स्टेशन में लिखवा दी थी। आप…"
" मैं एक दूसरे केस के सिलसिले में आर्ट्स काॅलेज गया था , प्रिंसिपल महेंद्र चौबीसा ने मुझे सलोनी के बारे में बताया।"
" अच्छा ! " - वह व्यक्ति जैसे कुछ समझते हुए बोला - " आप बाहर क्यों खड़े हैं , अंदर आइये ना। "
साकेत ने घर के भीतर कदम रखा।
" सोनू ! जल्दी से दो कुर्सीयां ले आ। " - भीतर आते ही वह व्यक्ति जोर से बोला।
पलक झपकते ही 14 - 15 साल का एक लड़का दो फाइबर की कुर्सियां लिये वहां प्रकट हुआ।
" बैठिये। " - एक कुर्सी की ओर संकेत करते हुए वह आदमी बोला।
वे वहीं बरामदे में कुर्सियों पर बैठ गये।
" जाओ , साहब के लिये चाय लेकर आओ। " - लडके को आदेश हुआ।
" इसकी कोई जरूरत नहीं है। " - साकेत बोला - " सलोनी आपकी बेटी है ? "
आदमी ने अजीब निगाहों से साकेत की ओर देखा।
" बेटी न सही , लेकिन बेटी से कम भी नहीं है। "
साकेत चौंका - " मैं समझा नहीं। "
" सलोनी मेरे भाई आशुतोष की लड़की है। सलोनी केवल तीन साल की थी , जब आशुतोष अपनी पत्नी आशा और बेटी सलोनी के साथ एक बार ससुराल से लौट रहा था , तो रास्ते में बस का एक्सीडेंट हो गया। दूसरे कई यात्रियों के साथ सलोनी के माता - पिता भी चल बसे। लेकिन , ईश्वर की दया अपार है। सलोनी उस हादसे में बच गयी। बस तभी से उसे अपनी बेटी की तरह पाला है मैंने। "
" ओह ! घर में और कौन - कौन है ? "
" मैं प्रतापसिंह , मेरी पत्नी ईशा और हमारा ये बेटा सोनू। "
" सलोनी को आपने अंतिम बार कब देखा था ? "
" 13 फरवरी को। काॅलेज के लिये निकली थी , फिर शाम को नहीं आयी। हमें लगा , दोस्तों के साथ कहीं होगी तो हमने ज्यादा सीरियस नहीं लिया। लेकिन , जब पूरी रात इंतज़ार करने के बाद भी वह नहीं आयी तो हमने पहले काॅलेज में पता किया , फिर वहां के प्रिंसिपल के कहने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखवायी। "
" काॅलेज टाइम के बाद जब वह घर नहीं आयी , तो आपने उसे फोन नहीं किया ? "
" किया था , लेकिन उसका मोबाइल स्विच ऑफ था। हमें लगा कि बैटरी चली गयी होगी। "
" आपकी बातों से लग रहा है कि सलोनी के समय पर घर नहीं पहुंचने पर भी आपको ज्यादा चिंता नहीं हुई , ऐसा क्यों ? "
यह सवाल जैसे प्रतापसिंह पर बिजली बनकर गिरा।
कुछ पल के लिये वह शांत रहा।
उसने कुछ बोलने के लिये मुंह खोलना ही चाहा था कि तभी ईशा वहां आ गयी।
" मैं बताती हूँ। " - ईशा ने कहा।
" नहीं। " - अचानक से प्रतापसिंह बोला - " तुम अंदर जाओ , बात कर रहा हूँ ना मैं। "
" अब रहने भी दो। किस किससे छिपाते फिरोगे ? " - ईशा बोली - " ये तो जासूस है , कैसे भी पता लगा लेंगे और हमने कोई बात छिपाने की कोशिश की , तो अपनी ही बेटी के लापता होने का इल्जाम हम पर ही आ जायेगा। "
" बात क्या है ? " - साकेत ने पूछा।
" सलोनी ऐसी लड़की है नहीं , जिसकी कोई फिक्र की जाये। " - ईशा ने बताना शुरू किया - " उसे तो लड़की कहना भी कभी कभी गलत लगता है। लडकों के साथ रहना , लडकों के जैसे ही कपड़े पहनना - ऐसे ही शौक है उसके। खुद के पास तो है नहीं , फिर भी दोस्तों की बाइक चलाना , गाली - गलौच करना और सबसे बुरी बात गुटखा तम्बाकू , बीड़ी - सिगरेट - इन सबका सेवन करना , ऐसे लक्षणों वाली लड़की को कौन लड़की कहेगा ?...अब ऐसी लड़की रात भर घर ना भी लौटे तो कौनसी बडी बात है ? और होता भी तो था ऐसा ही , कई - कई बार रातभर घर नहीं लौटती थी और जब पूछते थे कि रातभर कहाँ रही तो बड़ी शान से कहती थी कि मेरे इस दोस्त का बर्थडे था , उस दोस्त की पार्टी थी। तसदीक के लिये उससे मोबाइल नंबर लेकर उसके दोस्तों को पूछते भी थे , तो उसकी बात सही निकलती थी। "
" अब जिसके घर में ऐसी बेटी हो , वो समाज सिर उठाकर कैसे जी सकता है ? " - प्रतापसिंह बोला।
" सोनू भी अब तो उसकी सोहबत में बिगडकर चोरी छिपे गुटखा खाने लगा है , क्या पता सिगरेट भी पीता हो ! " - ईशा ने कहा।
" आपके घर की हालत देखते हुए लगता नहीं है कि जितने बड़े - बड़े शौक आपकी बेटी ने पाल रखे हैं , उन्हें पूरा करने लायक आपकी कुल आय भी होगी ! "
" सही कहा। हम बडी मुश्किल से उसकी पढाई लिखाई का खर्चा उठा रहे हैं। "
" फिर उसे अपने शौक पूरे करने के लिये पैसे कहाँ से मिलते होंगे ? "
" उसके आवारा दोस्तों से। " - ईशा बोली।
" उसके दोस्तों के नाम जान सकता हूँ मैं ? " - साकेत ने पूछा।
ईशा ने उसके काॅलेज के कुछ दोस्तों के नाम बताये।
" ओके। अब मैं चलता हूँ। " - कहते हुए साकेत उठा - " किस्मत ने साथ दिया तो सलोनी जल्द ही मिल जायेगी। "
" ना ही मिले तो अच्छा है। " - तेजी से बाहर की ओर जाते हुए साकेत के कानों में पड़े ये अंतिम शब्द ईशा के थे।
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