शनिवार, 18 मई 2019

सौम्या मर्डर केस

मेरे सामने सौम्या की लाश पडी थी। मैं दहशत से कांप उठा।जो मै देख रहा था,उस पर यकीन कर पाना असंभव था। सौम्या का बेडरूम पूरी तरह अस्त-व्यस्त था।ऐसा लग रहा था, जैसे बेडरूम की एक-एक चीज़ को उठा-उठाकर जोर से फेंका गया हो। सौम्या के मुंह से निकल रहा झाग और पास ही पडी जहर की खाली शीशी यह साबित करने के लिये काफी थे कि सौम्या ने आत्महत्या की है,लेकिन यह हत्या का मामला भी हो सकता था। यह हत्या थी या आत्महत्या-इस पर सोचने से ज्यादा जरूरी था- मेरा वहां से भाग निकलना। आखिर आधे घंटे पहले ही सौम्या से फोन पर मेरी बात हुई थी और अब मैं उसके बेडरूम में था। इतना तो तय था कि अगर इस पर तहकीकात होती,तो मैं आसानी से फंस सकता था। यह सोचते ही मेरी रुह कांप उठी,मुझे लगा कि मेरे पैरों के नीचे कुछ है ही नहीं और मैं हवा में ठहरा हुआ हूँ। ठंड के मौसम में भी मैं पसीने से नहा उठा। मैं उल्टे पांव लौट पडा। सौम्या के बैडरूम से निकलकर मैं सीढियों से नीचे उतरा और घर से बाहर आकर मैन गेट को ठीक उसी तरह बंद कर दिया,जैसे वो पहले बंद था। मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और केशव नगर स्थितअपने मकान की ओर चल पडा।

जो कुछ हुआ था और जो कुछ भी मैंने देखा था,उस पर यकीन करना बहुत मुश्किल था।क्या सौम्या सच में मर चुकी थी ? उसने आत्महत्या की ? ......नहीं, यह सच नहीं हो सकता, वह आत्महत्या नहीं कर सकती। सौम्या जैसी हंसमुख और खुशमिज़ाज लडकी आत्महत्या नहीं कर सकती, कभी नहीं। .....तब किसी और ने उसे जहर दिया ?सौम्या जैसी खूबसूरत लडकी को जहर देकर मारने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है ?.....लेकिन अगर किसी ने ऐसा किया है तो वो कौन हो सकता है ? ......कौन सौम्या का मर्डर कर सकता है ? .......सच में सौम्या का मर्डर हुआ है या उसने आत्महत्या की है!.....क्या हुआ था ? ......आखिर क्या हुआ था ? ....हत्या या आत्महत्या ? ....हत्या या आत्महत्या ? ....मेरा सिर चकराने लगा। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। ....और एक बात यह भी थी कि अगर पुलिस ने तहकीकात की और यह साबित हो गया कि सौम्या का मर्डर हुआ है, तो सीधा-सीधा शक मुझपर ही जायेगा। ......ऐसी हालत में मुझे क्या करना चाहिए ?.....क्या मैं वापस सौम्या के घर जाकर अपने फिंगर प्रिंट मिटा डालूं ? .....लेकिन ऐसा करना रिस्की हो सकता है, संभव है कि अब तक पुलिस उसके घर पहुंच चुकी हो!.....या हो सकता है कि ना भी पहुंची हो!.....क्या मुझे पुलिस में खबर करनी चाहिए कि मेरी दोस्त सौम्या मर चुकी है और मैं यह नहीं जानता कि यह हत्या है या आत्महत्या!....लेकिन ऐसा करने से पुलिस सबसे पहले मुझ से ही सवाल-जवाब करेगी और   मैं शक के घेरे में आ जाऊंगा।....और जब मुझे फंसना ही है, तो क्यों न मैं यहाँ से कहीं दूर भाग जाऊँ ?....लेकिन नहीं, ऐसा करने से तो पुलिस का मुझपर शक यकीन में बदल जायेगा।....और यह भी तो हो सकता है कि पुलिस की तहकीकात में यह मामला सिर्फ आत्महत्या का लगे, वैसे भी सौम्या के बैडरूम की हालत और उसका जहर खाना-सभी कुछ तो सीधे-सीधे यही साबित करते है कि उसने आत्महत्या की है।...फिर मैं उसे हत्या समझनेे की कोशिश क्यों कर रहा हूँ ?....सिर्फ उससे फोन पर हुई बात के आधार पर!....सौम्या से फोन पर हुई मेरी बात को किसी ने रिकॉर्ड नहीं किया। यह सिर्फ मैं जानता हूँ कि सौम्या की मौत की एक वजह हत्या भी हो सकती है, लेकिन बाकी सारे सबूत तो यही साबित करते है कि यह आत्महत्या है।.....फिर मैं इस बात की इतनी अधिक चिंता क्यों कर रहा हूँ ?-यह सोच कर मुझे थोड़ा रिलैक्स महसूस हुआ।
लेकिन यह तो तय था कि सौम्या ने जहर अपनी मरजी से नहीं खाया था, उसकी हत्या हुई थी और यह बात सिर्फ मैं जानता था।
घर पहुंच कर मैंने अपनी बाइक अंदर ली और बैडरूम में जाकर बिस्तर पर लेट गया।


रात 9. 30 बजे मैं अपने घर पहुँचा। मैंने बाइक अंदर ली और बेडरूम में आकर बिस्तर पर लेट गया।
मैं सोने की कोशिश कर रहा था,लेकिन सौम्या मेरे दिमाग से निकल ही नहीं रही थी। उससे फोन पर हुई अंतिम बातचीत मुझे बार -बार याद आ रही थी।
उस दिन मैं घर में बैठा टीवी देख रहा था। उसी समय मेरे मोबाइल पर सौम्या का फोन आया।
"हैलो आशुतोष!''
"हैलो! कैसी हो तुम?"
"बहुत... बहुत... बहुत अच्छी!"- सौम्या की आवाज़ में ज़बरदस्त उत्साह था-"आशुतोष! तुम्हें तो कुछ पता ही नहीं,अशोक के साथ मेरी सगाई फिक्स हो चुकी है और इसी खुशी में मैंने अपने घर पर एक छोटी-सी पार्टी दी है। सभी लोग आ चुके हैं।.... बस एक तुम ही हो,जिसे कुछ खबर ही नहीं।"
"अरे वाह!"-मैं खुशी से बोल पड़ा - "कॉंग्रैचुलेशन!"
" सिर्फ कॉंग्रैचुलेट करने से काम नहीं चलेगा मिस्टर!"- सौम्या शिकायत भरे लहजे में बोली -" आपको यहां आना भी है... क्विक्ली!"
"ओके! मैं १० मिनट में पहुंचता हूँ।"- कहते हुए मैंने फोन रखा।
मैंने जल्दी से अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनी और बाइक से सौम्या के घर की ओर चल पड़ा।
इस समय मुझे सबसे ज़्यादा खुशी इस बात से हो रही थी कि सौम्या को वो मिल रहा था,जिसकी उसने सच्चे दिल से ख्वाहिश की थी।
अशोक!
एक पढ़ाकू लड़का,जिसे पढ़ाई के अलावा और कुछ भी नहीं सूझता था। इसी पढ़ाई ने तो उसकी आँखों को दो से चार कर दिया था,मतलब भरी जवानी में ही उसकी आँखें कमज़ोर हो गयी थी और कुछ भी पढ़ने के लिये उसे अब चश्मे का सहारा लेना पड़ता था।
और रही प्यार- मोहब्बत की बात... तो उसके लिए ये सब बातें बेमानी थी।
दूसरी तरफ, सौम्या अपने नाम की ही तरह बेहद सौम्य थी...चेहरे से भी, व्यवहार से भी। स्टाइलिश रहना, दिखावे पर फालतू पैसा खर्च करना- उसके व्यक्तित्व के अनिवार्य गुण थे। इन्हीं गुणों की बदौलत काॅलेज के ज्यादातर लड़के उसके दीवाने थे, लेकिन सौम्या की रुचि तो सिर्फ और सिर्फ पढाकू अशोक में ही थी और वजह ?...उसकी सादगी! प्यार भी अजीब चीज़ होती है । कब किसको किससे हो जाये, कहा नहीं जा सकता।
....और यही प्यार आज सगाई के बंधन में बंधने जा रहा था।
मैं सौम्या के घर पहुंच चुका था। घर के बाहर बाइक खडी करके मैंने बेल बजायी,लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। मैंने 3 - 4 बार बेल बजायी,पर कोई फायदा नहीं हुआ। मुझे थोड़ा अजीब लगा। जिस घर में किसी की सगाई की पार्टी हो, उसमें से किसी तरह के शोरगुल की आवाज़ न आना और कई बार बेल बजाने पर भी कोई प्रतिक्रिया न होना- निश्चित रूप से बेहद आश्चर्यजनक था।
अब मैंने गेट को थोड़ा अंदर की ओर धक्का दिया।...गेट खुल गया, लेकिन भीतर अंधेरा था।
" अजीब बात है!" - मैंने सोचा - " क्या ये किसी तरह का सरप्राइज है ? "
मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था।
" सौम्या!" - मैंने आवाज़ लगायी...लेकिन जवाब में सिर्फ सन्नाटा था।
मैं धीरे-धीरे आगे बढता हुआ सीढियां चढकर ऊपर पहुंचा। यहाँ भी अंधेरा ही था। एक कमरे से रोशनी बाहर आ रही थी। उस कमरे का गेट खुला हुआ था। मैं धीमे-धीमे चलता हुआ कमरे के भीतर दाखिल हुआ। कमरे के भीतर का दृश्य देखते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी।
मेरे सामने सौम्या की लाश पडी थी।....
सोचते - सोचते मैं अचानक उठकर बैठ गया। मेरे चेहरे पर अनायास ही पसीने की बूंदें छलक आयी।
" सौम्या! तुम क्यों मर गयी ? " - मैं  मन ही मन बोल उठा।
सौम्या के मरने से ज्यादा चिंता मुझे इस बात की थी कि मैं इस केस में फंस ना जाऊँ! दिमाग तो कह रहा था कि मेरा इस मैटर में फंसने का चांस 1% से भी कम था,लेकिन दिल...दिल तो दहशत से भरा हुआ था।
मगर, इस दहशत में भी दिमाग सक्रिय था। वह बार-बार सौम्या के मर्डर से जुडी एक - एक चीज़ को याद किये जा रहा था और अचानक एक बहुत छोटी - सी चीज़ पर मेरा ध्यान गया, एक ऐसी चीज़,जिस पर मुझे सबसे पहले ध्यान देना था।

इंसान जब किसी मुसीबत में फंसता है तो साधारण सी दिखने वाली चीज़ों पर भी फोकस नहीं कर पाता। .... यही हुआ था मेरे साथ भी।

''सौम्या ने कहा  था कि उसके घर पर पार्टी है और बहुत से लोग वहाँ आ चुके हैं,लेकिन वहाँ मुझे ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। इसका सीधा - सीधा अर्थ यही निकलता है कि उसने झूठ बोला था। लेकिन सौम्या ऐसा क्यों करेगी?''-मुझे अपनी ही सोच पर शक हुआ।

"सौम्या मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी,फिर वह मुझसे झूठ क्यों बोलेगी?" - बहुत सोचने पर भी मुझे इसके पीछे कोई वजह दिखायी नहीं दी।

सुबह खिड़की से आती तेज़ धूप से मेरी आँख खुली। मेरी निगाह पास ही टेबल पर रखी घडी की ओर गयी। 9 बज चुके थे। मतलब,आज कॉलेज के लिए लेट होना तय था। बेमन से मैं उठा और कॉफी बनाने के लिये रसोई की ओर बढ़ा। उसी समय मुझे दरवाजा खटखटाने की आवाज़ सुनायी दी।

"इतनी सुबह- सुबह कौन होगा ?" - सोचते हुए मैं दरवाज़े की ओर बढ़ा।
दरवाज़ा खोलते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। सामने ३-४ पुलिसकर्मी खड़े थे.
 "आपको हमारे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा।" - उनमे से एक बोला।
"पर,मेरा कसूर क्या हैं ?" -अपनी घबराहट छिपाते हुए मैंने पूछा।
"आपको सौम्या देसाई का क़त्ल करने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता है मिस्टर आशुतोष !"

अब मेरी कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे लग रहा था कि कल रात जो भी मेरे साथ हुआ,उसे मैंने गंभीरता से नहीं लिया ; अगर लिया होता तो बात यहां तक नहीं पहुँचती।
"क्या होगा,जब गाँव में रहने वााले मेेरे माता - पिता को पता चलेेगा कि उनका बेटा एक  कातिल है ?.......नहीं मैंं कातिल नहींं हूँँ, मैंने किसी का खून नहीं  किया था। अभी तक मुझ पर न तो कोई आरोप साबित हुआ था और न ही मेरे खिलाफ कोई अरेस्ट वारन्ट जारी हुआ था। केवल शक के आधार पर मुझे गिरफ्तार किया गया था और वो भी सिर्फ पूछताछ के लिये।......अगर मुझ पर आरोप साबित हो गया तो ?......एक कत्ल की सजा क्या हो सकती है ?......फांसी ?.......नही.....नही हो सकता ऐसा मेरे साथ! मैं बेगुनाह हूं।" - सोचते - सोचते मैं घबरा उठा।
अगले कुछ ही मिनटों में मैं जेल के अंदर था।
" अगर कल ही मैंने पुलिस को खबर कर दी होती, तो....." - अचानक जेल का दरवाजा खुलने से मेरे विचारों में बाधा पडी।
" लाश का क्या किया तुमने? " - भीतर दाखिल होते ही इंस्पेक्टर ने पूछा।
"लाश ?" - मैं बुरी तरह चौंक उठा।
तो क्या सौम्या की लाश घटनास्थल से गायब थी ? ऐसा कैसे हो सकता था ?......अगर मैं कल रात को सौम्या के घर से भागा नहीं होता, तो मुझे पता चल सकता था कि कातिल कौन था ! लाश गायब होने से एक बात तो साबित होती है कि सौम्या ने आत्महत्या नहीं की, उसकी हत्या हुई है ; क्योकि उसने आत्महत्या की होती तो लाश गायब नहीं हो सकती थी।

सौम्या मर्डर केस ( PART - 3 )

                          CH-3 लाश गायब



इंसान जब किसी मुसीबत में फंसता है तो साधारण सी दिखने वाली चीज़ों पर भी फोकस नहीं कर पाता। .... यही हुआ था मेरे साथ भी।

''सौम्या ने कहा  था कि उसके घर पर पार्टी है और बहुत से लोग वहाँ आ चुके हैं,लेकिन वहाँ मुझे ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। इसका सीधा - सीधा अर्थ यही निकलता है कि उसने झूठ बोला था। लेकिन सौम्या ऐसा क्यों करेगी?''-मुझे अपनी ही सोच पर शक हुआ।

"सौम्या मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी,फिर वह मुझसे झूठ क्यों बोलेगी?" - बहुत सोचने पर भी मुझे इसके पीछे कोई वजह दिखायी नहीं दी।

सुबह खिड़की से आती तेज़ धूप से मेरी आँख खुली। मेरी निगाह पास ही टेबल पर रखी घडी की ओर गयी। 9 बज चुके थे। मतलब,आज कॉलेज के लिए लेट होना तय था। बेमन से मैं उठा और कॉफी बनाने के लिये रसोई की ओर बढ़ा। उसी समय मुझे दरवाजा खटखटाने की आवाज़ सुनायी दी।

"इतनी सुबह- सुबह कौन होगा ?" - सोचते हुए मैं दरवाज़े की ओर बढ़ा।
दरवाज़ा खोलते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। सामने ३-४ पुलिसकर्मी खड़े थे.
 "आपको हमारे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा।" - उनमे से एक बोला।
"पर,मेरा कसूर क्या हैं ?" -अपनी घबराहट छिपाते हुए मैंने पूछा।
"आपको सौम्या देसाई का क़त्ल करने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता है मिस्टर आशुतोष !"

अब मेरी कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे लग रहा था कि कल रात जो भी मेरे साथ हुआ,उसे मैंने गंभीरता से नहीं लिया ; अगर लिया होता तो बात यहां तक नहीं पहुँचती। 
"क्या होगा,जब गाँव में रहने वााले मेेरे माता - पिता को पता चलेेगा कि उनका बेटा एक  कातिल है ?.......नहीं मैंं कातिल नहींं हूँँ, मैंने किसी का खून नहीं  किया था। अभी तक मुझ पर न तो कोई आरोप साबित हुआ था और न ही मेरे खिलाफ कोई अरेस्ट वारन्ट जारी हुआ था। केवल शक के आधार पर मुझे गिरफ्तार किया गया था और वो भी सिर्फ पूछताछ के लिये।......अगर मुझ पर आरोप साबित हो गया तो ?......एक कत्ल की सजा क्या हो सकती है ?......फांसी ?.......नही.....नही हो सकता ऐसा मेरे साथ! मैं बेगुनाह हूं।" - सोचते - सोचते मैं घबरा उठा।
अगले कुछ ही मिनटों में मैं जेल के अंदर था।
" अगर कल ही मैंने पुलिस को खबर कर दी होती, तो....." - अचानक जेल का दरवाजा खुलने से मेरे विचारों में बाधा पडी।
" लाश का क्या किया तुमने? " - भीतर दाखिल होते ही इंस्पेक्टर ने पूछा।
"लाश ?" - मैं बुरी तरह चौंक उठा।
तो क्या सौम्या की लाश घटनास्थल से गायब थी ? ऐसा कैसे हो सकता था ?......अगर मैं कल रात को सौम्या के घर से भागा नहीं होता, तो मुझे पता चल सकता था कि कातिल कौन था ! लाश गायब होने से एक बात तो साबित होती है कि सौम्या ने आत्महत्या नहीं की, उसकी हत्या हुई है ; क्योकि उसने आत्महत्या की होती तो लाश गायब नहीं हो सकती थी।
        
                                                                       - क्रमश:

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

सौम्या मर्डर केस ( PART - 2 )

                              CH - 2   फ्लैशबेक


रात 9. 30 बजे मैं अपने घर पहुँचा। मैंने बाइक अंदर ली और बेडरूम में आकर बिस्तर पर लेट गया।
मैं सोने की कोशिश कर रहा था,लेकिन सौम्या मेरे दिमाग से निकल ही नहीं रही थी। उससे फोन पर हुई अंतिम बातचीत मुझे बार -बार याद आ रही थी।
उस दिन मैं घर में बैठा टीवी देख रहा था। उसी समय मेरे मोबाइल पर सौम्या का फोन आया।
"हैलो आशुतोष!''
"हैलो! कैसी हो तुम?"
"बहुत... बहुत... बहुत अच्छी!"- सौम्या की आवाज़ में ज़बरदस्त उत्साह था-"आशुतोष! तुम्हें तो कुछ पता ही नहीं,अशोक के साथ मेरी सगाई फिक्स हो चुकी है और इसी खुशी में मैंने अपने घर पर एक छोटी-सी पार्टी दी है। सभी लोग आ चुके हैं।.... बस एक तुम ही हो,जिसे कुछ खबर ही नहीं।"
"अरे वाह!"-मैं खुशी से बोल पड़ा - "कॉंग्रैचुलेशन!"
" सिर्फ कॉंग्रैचुलेट करने से काम नहीं चलेगा मिस्टर!"- सौम्या शिकायत भरे लहजे में बोली -" आपको यहां आना भी है... क्विक्ली!"
"ओके! मैं १० मिनट में पहुंचता हूँ।"- कहते हुए मैंने फोन रखा।
मैंने जल्दी से अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनी और बाइक से सौम्या के घर की ओर चल पड़ा।
इस समय मुझे सबसे ज़्यादा खुशी इस बात से हो रही थी कि सौम्या को वो मिल रहा था,जिसकी उसने सच्चे दिल से ख्वाहिश की थी।
अशोक!
एक पढ़ाकू लड़का,जिसे पढ़ाई के अलावा और कुछ भी नहीं सूझता था। इसी पढ़ाई ने तो उसकी आँखों को दो से चार कर दिया था,मतलब भरी जवानी में ही उसकी आँखें कमज़ोर हो गयी थी और कुछ भी पढ़ने के लिये उसे अब चश्मे का सहारा लेना पड़ता था।
और रही प्यार- मोहब्बत की बात... तो उसके लिए ये सब बातें बेमानी थी।
दूसरी तरफ, सौम्या अपने नाम की ही तरह बेहद सौम्य थी...चेहरे से भी, व्यवहार से भी। स्टाइलिश रहना, दिखावे पर फालतू पैसा खर्च करना- उसके व्यक्तित्व के अनिवार्य गुण थे। इन्हीं गुणों की बदौलत काॅलेज के ज्यादातर लड़के उसके दीवाने थे, लेकिन सौम्या की रुचि तो सिर्फ और सिर्फ पढाकू अशोक में ही थी और वजह ?...उसकी सादगी! प्यार भी अजीब चीज़ होती है । कब किसको किससे हो जाये, कहा नहीं जा सकता।
....और यही प्यार आज सगाई के बंधन में बंधने जा रहा था।
मैं सौम्या के घर पहुंच चुका था। घर के बाहर बाइक खडी करके मैंने बेल बजायी,लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। मैंने 3 - 4 बार बेल बजायी,पर कोई फायदा नहीं हुआ। मुझे थोड़ा अजीब लगा। जिस घर में किसी की सगाई की पार्टी हो, उसमें से किसी तरह के शोरगुल की आवाज़ न आना और कई बार बेल बजाने पर भी कोई प्रतिक्रिया न होना- निश्चित रूप से बेहद आश्चर्यजनक था।
अब मैंने गेट को थोड़ा अंदर की ओर धक्का दिया।...गेट खुल गया, लेकिन भीतर अंधेरा था।
" अजीब बात है!" - मैंने सोचा - " क्या ये किसी तरह का सरप्राइज है ? "
मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था।
" सौम्या!" - मैंने आवाज़ लगायी...लेकिन जवाब में सिर्फ सन्नाटा था।
मैं धीरे-धीरे आगे बढता हुआ सीढियां चढकर ऊपर पहुंचा। यहाँ भी अंधेरा ही था। एक कमरे से रोशनी बाहर आ रही थी। उस कमरे का गेट खुला हुआ था। मैं धीमे-धीमे चलता हुआ कमरे के भीतर दाखिल हुआ। कमरे के भीतर का दृश्य देखते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी।
मेरे सामने सौम्या की लाश पडी थी।....
सोचते - सोचते मैं अचानक उठकर बैठ गया। मेरे चेहरे पर अनायास ही पसीने की बूंदें छलक आयी।
" सौम्या! तुम क्यों मर गयी ? " - मैं  मन ही मन बोल उठा।
सौम्या के मरने से ज्यादा चिंता मुझे इस बात की थी कि मैं इस केस में फंस ना जाऊँ! दिमाग तो कह रहा था कि मेरा इस मैटर में फंसने का चांस 1% से भी कम था,लेकिन दिल...दिल तो दहशत से भरा हुआ था।
मगर, इस दहशत में भी दिमाग सक्रिय था। वह बार-बार सौम्या के मर्डर से जुडी एक - एक चीज़ को याद किये जा रहा था और अचानक एक बहुत छोटी - सी चीज़ पर मेरा ध्यान गया, एक ऐसी चीज़,जिस पर मुझे सबसे पहले ध्यान देना था।
                                                                - क्रमश: 

रविवार, 9 दिसंबर 2018

सौम्या मर्डर केस ( PART - 1 )



CH-1 हत्या या आत्महत्या ?


मेरे सामने सौम्या की लाश पडी थी। मैं दहशत से कांप उठा।जो मै देख रहा था,उस पर यकीन कर पाना असंभव था। सौम्या का बेडरूम पूरी तरह अस्त-व्यस्त था।ऐसा लग रहा था, जैसे बेडरूम की एक-एक चीज़ को उठा-उठाकर जोर से फेंका गया हो। सौम्या के मुंह से निकल रहा झाग और पास ही पडी जहर की खाली शीशी यह साबित करने के लिये काफी थे कि सौम्या ने आत्महत्या की है,लेकिन यह हत्या का मामला भी हो सकता था। यह हत्या थी या आत्महत्या-इस पर सोचने से ज्यादा जरूरी था- मेरा वहां से भाग निकलना। आखिर आधे घंटे पहले ही सौम्या से फोन पर मेरी बात हुई थी और अब मैं उसके बेडरूम में था। इतना तो तय था कि अगर इस पर तहकीकात होती,तो मैं आसानी से फंस सकता था। यह सोचते ही मेरी रुह कांप उठी,मुझे लगा कि मेरे पैरों के नीचे कुछ है ही नहीं और मैं हवा में ठहरा हुआ हूँ। ठंड के मौसम में भी मैं पसीने से नहा उठा। मैं उल्टे पांव लौट पडा। सौम्या के बैडरूम से निकलकर मैं सीढियों से नीचे उतरा और घर से बाहर आकर मैन गेट को ठीक उसी तरह बंद कर दिया,जैसे वो पहले बंद था। मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और केशव नगर स्थितअपने मकान की ओर चल पडा।



जो कुछ हुआ था और जो कुछ भी मैंने देखा था,उस पर यकीन करना बहुत मुश्किल था।क्या सौम्या सच में मर चुकी थी ? उसने आत्महत्या की ? ......नहीं, यह सच नहीं हो सकता, वह आत्महत्या नहीं कर सकती। सौम्या जैसी हंसमुख और खुशमिज़ाज लडकी आत्महत्या नहीं कर सकती, कभी नहीं। .....तब किसी और ने उसे जहर दिया ?सौम्या जैसी खूबसूरत लडकी को जहर देकर मारने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है ?.....लेकिन अगर किसी ने ऐसा किया है तो वो कौन हो सकता है ? ......कौन सौम्या का मर्डर कर सकता है ? .......सच में सौम्या का मर्डर हुआ है या उसने आत्महत्या की है!.....क्या हुआ था ? ......आखिर क्या हुआ था ? ....हत्या या आत्महत्या ? ....हत्या या आत्महत्या ? ....मेरा सिर चकराने लगा। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। ....और एक बात यह भी थी कि अगर पुलिस ने तहकीकात की और यह साबित हो गया कि सौम्या का मर्डर हुआ है, तो सीधा-सीधा शक मुझपर ही जायेगा। ......ऐसी हालत में मुझे क्या करना चाहिए ?.....क्या मैं वापस सौम्या के घर जाकर अपने फिंगर प्रिंट मिटा डालूं ? .....लेकिन ऐसा करना रिस्की हो सकता है, संभव है कि अब तक पुलिस उसके घर पहुंच चुकी हो!.....या हो सकता है कि ना भी पहुंची हो!.....क्या मुझे पुलिस में खबर करनी चाहिए कि मेरी दोस्त सौम्या मर चुकी है और मैं यह नहीं जानता कि यह हत्या है या आत्महत्या!....लेकिन ऐसा करने से पुलिस सबसे पहले मुझ से ही सवाल-जवाब करेगी और   मैं शक के घेरे में आ जाऊंगा।....और जब मुझे फंसना ही है, तो क्यों न मैं यहाँ से कहीं दूर भाग जाऊँ ?....लेकिन नहीं, ऐसा करने से तो पुलिस का मुझपर शक यकीन में बदल जायेगा।....और यह भी तो हो सकता है कि पुलिस की तहकीकात में यह मामला सिर्फ आत्महत्या का लगे, वैसे भी सौम्या के बैडरूम की हालत और उसका जहर खाना-सभी कुछ तो सीधे-सीधे यही साबित करते है कि उसने आत्महत्या की है।...फिर मैं उसे हत्या समझनेे की कोशिश क्यों कर रहा हूँ ?....सिर्फ उससे फोन पर हुई बात के आधार पर!....सौम्या से फोन पर हुई मेरी बात को किसी ने रिकॉर्ड नहीं किया। यह सिर्फ मैं जानता हूँ कि सौम्या की मौत की एक वजह हत्या भी हो सकती है, लेकिन बाकी सारे सबूत तो यही साबित करते है कि यह आत्महत्या है।.....फिर मैं इस बात की इतनी अधिक चिंता क्यों कर रहा हूँ ?-यह सोच कर मुझे थोड़ा रिलैक्स महसूस हुआ।
लेकिन यह तो तय था कि सौम्या ने जहर अपनी मरजी से नहीं खाया था, उसकी हत्या हुई थी और यह बात सिर्फ मैं जानता था।
घर पहुंच कर मैंने अपनी बाइक अंदर ली और बैडरूम में जाकर बिस्तर पर लेट गया।
                                           - क्रमश:

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

नहीं है परवाह किसी को

हर कोई जी रहा है,
जिन्दगी को अपने हिसाब से।
नहीं है परवाह किसी को
इंसानियत की,
न मानवता की,
न नैतिकता की।
हर कोई भाग रहा है,
भौतिक सुखों के पीछे,
नहीं है परवाह किसी को
अच्छाई की-बुराई की,
न किसी के जीने-मरने की,
न किसी के हंसने-रोने की।
जी रहे है जिन्दगी को सभी अपने हिसाब से।
खत्म होती जा रही है संसार से,
मानवीय भावनायें,
परदुःखकातरता,
और,
वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना।
हर कोई चाहता है बस,
अपने स्वार्थों की पूर्ति,
मौज-मस्ती करना,
हमेशा खुश रहना,
और,
हंसते-खिलखिलाते हुए जीवन बिताना।
चाहे चुकानी पडे कीमत इसकी,
दूसरों के दु:ख के रूप में,
दूसरों की खुशियाँ छीनकर,
दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर।
नहीं है परवाह किसी एक को,
दूसरे की,
हर कोई जी रहा है जिन्दगी को,
बस अपने हिसाब से ।

रविवार, 22 जुलाई 2018

मैं और मेरी तन्हाई


तन्हा हूँ मैं,
तन्हा जीवन है मेरा,
तन्हाई मेरी साथिन। 
तन्हा ही चलना है ज़िंदगीभर,
तन्हा ही करना है सामना मुश्किलों का। 

कहानी मेरी है,
लिखने वाला मैं हूँ,
कोई और क्यों करें दखलअंदाज़ी इसमें,
क्यों दूँ हक़ किसी और को ये। 
साक्षी मेरे सुख-दुःख की,
गवाह मेरे संघर्ष की,
रही है सदा तन्हाई ही।

क्या तकलीफें उठायी मैंने,
क्या कुछ सहा,
महसूस किया,
ये सब,
जाना-समझा है बस मेरी तन्हाई ने। 

तब,
क्यों दिखाऊं किसी और को जख्म अपने,
क्यों कोई समझेगा मुझे,
मेरी तकलीफों को। 
.
रास नहीं आती दुनिया मुझे,
न यहाँ के रीति-रिवाज़,
रहता हूँ बस इसीलिये तन्हा ही मैं। 

और कहता हूँ फक्र से,
हाँ तन्हा हूँ मैं,
तन्हा जीवन है मेरा,
तन्हाई मेरी साथिन। 

शुक्रवार, 1 जून 2018

स्वाभिमान

स्वाभिमान 



घर में आज बहुत रौनक है,दामादजी आने वाले हैं।कुसुम सुबह से अपना सामान पैक करने में लगी है।पापा और भाई एक तरफ खडे पता नहीं क्या बातें कर रहे हैं।मम्मी और भाभी भी ना जाने क्यूँ नजरें चुरा रही हैं।कुसुम विनय को फोन कर सुनिश्चित करती है कि विनय शाम छह बजे तक पहुँच जायेंगे।सभी फिर तैयारी में लग जाते हैं।पापा, मम्मी, भाई, भाभी-सब सामान गिनवा रहे हैं।
'कुसुम! ये अंगूठी दामादजी के लिए है।'
'ये महंगी वाली साडी तेरी सास के लिए है।'
'और 500 रुपये तेरी ननद के लिए, बाकी छोटू के लिए ये कपडे और खिलौने।तेरे लिए गहने और कपडे अलग बैग में रख दिये हैं।'
'छोटू होने के बाद पहली बार ससुराल जा रही है, देना तो पडता ही है।'
तभी पापा बोले-'सारा सामान पैक कर लेना अच्छे से' फिर भाई की तरफ देखकर बोले-'फिर तेरे साइन भी चाहिये, फाॅर्म पर।'
'कैसे साइन पापा?'-कुसुम ने पूछा।
'वो तेरी शादी हो गयी और अब एक बेटा भी हो गया है, तो सोचा कि अपनी प्रॉपर्टी तेरे भाई प्रवीण के नाम कर दूँ'-पापा थोडा हिचकिचाते हुए बोल रहे थे-'तू साइन कर दे कि तुझे हमसे कुछ नहीं चाहिये।मेरा मतलब है कि प्रॉपर्टी से तुझे तेरा हिस्सा नहीं चाहिये।'
कुसुम बस मुस्कुराकर आंखों में आंसू लिए, गुस्से का घूँट पीकर बोली-'ठीक है पापा! मैं साइन कर दूंगी, लेकिन पहले मेरी बात सुन ले; आप ये जो सामान दे रहे हैं वो वापस ले ले।ये गहने, साडियाँ, खिलौने, रुपये सब।'
कुसुम अब तक रोने लगी थी।
तभी भाई - भाभी बोले-'ऐसा क्यों कह रही हो? ये सब तो देना पडता है, वरना तेरे ससुराल वाले क्या सोचेंगे, हमारे बारे में....और फिर ऐसा थोड़े ही है कि हम तुझे बाद में नहीं देंगे,तू जब-जब मायके आएगी,कुछ न कुछ तो देंगे ही तुझे...'
कुसुम,जो अब तक तीन बैग पैक कर चुकी थी,एक बैग में अपने और छोटू के कपडे पैक करते हुए बोली-'आप कहते है न,में बहुत समझदार हूँ,तो बस.....' और गहरी सांस लेकर कुसुम बोली-'आप मुझे मेरा हक़ नहीं दे सकते और मैं आपसे दान नहीं ले सकती ...विनय आते होंगे ....मैं तैयार हो जाती हूँ।'
आगे विनय खड़ा ही था। शायद उसने सब सुन लिया,वह कुसुम की तरफ देखकर मुस्कुराकर बोला-'चलो,अच्छा है !मुझे एक बैग ही उठाना पड़ेगा,वरना मेरी तो कमर ही अकड़ जाती...'
कुसुम विनय के सीने से लगकर रोने लग गयी और बोली-'हम गनु (विनय की बहन) के साथ ऐसा नहीं करेंगे,बिल्कुल नहीं...।'

मंगलवार, 29 मई 2018

नवोदित कथाकार हिमाद्री पालीवाल:एक परिचय

लेखन का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है,उतने ही विस्तृत है हमारे विचार,उतनी ही विस्तृत है हमारी भावनायें और इन सबका कारण है-हमारे आसपास फैला,सामाजिक ताने-बाने से बुना ये विस्तृत संसार।
'अपने विचारों और भावनाओ के सहयोग से विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों और घटनाओं को गहरायी से समझना,उनके साथ एकाकार होना और उनमें इतना डूब जाना कि मानो,हम स्वयं ही उन परिस्थितियों और घटनाओं के भुक्त-भोगी हों।'-ये ही वे तत्व हैं,जो एक आम इंसान को विवश करते हैं,एक नयी रचना की सृष्टि करने को। जिन मनुष्यों में ये तत्व पाए जाते हैं,उनमे एक तरह की व्यग्रता रहती है और यही व्यग्रता उन्हें एक नयी रचना की सृष्टि करने को बाध्य करती है। परिणामस्वरूप संसार को समय-समय पर नए-नए कवि,लेखक और साहित्यकार मिलते रहते हैं। लेकिन यह आश्चर्य,घोर आश्चर्य का विषय है कि संसार को जितने रचनाकार मिल सकते हैं,उसकी तुलना में बहुत ही कम मिल पाते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि अनेक रचनाकारों को अवसर ही नहीं  पाता अपनी प्रतिभा दिखाने  का,क्योंकि अधिकतर रचनाकारों को प्रोत्साहनयुक्त उचित वातावरण मिल ही नहीं पाता,उन्हें किसी का मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। यही कारण है कि उनकी रचना करने की गति मंथर ही रहती है। इससे इतर कुछ रचनाकार ऐसे भी होते हैं,जो बिना किसी प्रोत्साहन और मार्गदर्शन के पूर्ण उत्साह से  रचनायें करते रहते हैं,लेकिन वे 'गुदड़ी के लाल' ही रहते हैं। वे अपनी रचनायें दुनिया के सामने लाने में थोड़ा संकोच महसूस करते हैं। शायद,उन्हें भय होता है कि लोग उनकी रचनाओं की महत्ता नहीं समझेंगे,ना ही कद्र करेंगे।
आज के ब्लॉग में  ऐसी ही एक रचनाकार से आपका परिचय कराया जा रहा है,जो सोशल मिडिया पर तो सक्रिय है,किन्तु अपनी रचनाओं को उन्होंने कभी किसी रूप में भी सोशल मिडिया पर या इंटरनेट पर साझा नहीं  किया है और ना ही किसी अन्य रूप में किसी के सामने उन्हें प्रस्तुत किया है।
 राजस्थान राज्य की जोधपुर निवासी हिमाद्री पालीवाल मूलतः कहानीकार है,जो सामाजिक यथार्थ को अत्यंत भावपूर्ण तरीके से अपनी कहानियों में व्यक्त करती हैं।
साहित्य में अपनी गहन रुचि के कारण मैं स्वयं हमेशा नये-नये रचनाकारों की तलाश में रहता हूँ। जब मुझे ज्ञात हुआ कि हिमाद्रीजी लिखती हैं और बहुत अच्छा लिखती है,तो उनकी रचनायें पढ़ने की उत्सुकता हुई और उन्होंने भी सिर्फ इसलिए मुझे अपनी रचनायें पढ़ने को दी,क्योंकि मैं भी साहित्य में थोड़ी बहुत रुचि रखता हूँ। मेरी दृष्टि में हिमाद्रीजी की रचनायें उत्कृष्ट कोटि की और बहुमूल्य है।
'ऐसी श्रेष्ठ रचनायें और रचनाकार हिन्दी साहित्य को और अधिक समृद्ध कर सकती हैं '-यह विचार आते ही मैंने हिमाद्रीजी से स्वयं का ब्लॉग बनाने की पेशकश की,किन्तु किसी कारणवश उन्होंने सहमति नहीं दी और अन्ततः तय हुआ कि मैं अपने ही ब्लॉग पर उनकी रचनायें पोस्ट करुँ,इसके लिए उनकी सहमति भी मिल गयी।
तो अब से आप इसी ब्लॉग पर हिमाद्री पालीवाल की रचनाएँ भी पढ सकेंगे।

बुधवार, 23 मई 2018

जीवन की उलझन Poem On YouTube

अपनी मंजिल की ओर बढते राही के प्ेम और कर्तव्य के बीच अंतर्द्वंद को दर्शाती शानदार प्रेम कविता अब YouTube पर देखें।


सोमवार, 14 मई 2018

क्यों

कल तक जो चाहते थे,
दूर जाना हमसे। 
क्यों आज पास आने के,
बहाने खोजा करते हैं। 
सहन न होता था जिनको,
हमारा आसपास भी होना। 
 क्यों आज वो ही हमे,
यहां वहाँ खोजा करते हैं। 
चाहते थे कभी,
ओझल  कर देना हमको,
नजरों से अपनी। 
क्यों आज वो ही खुद,
हमारी नज़रों में आना चाहते हैं। 
कहा था हमने तो,
कि,
बेक़सूर है हम,
लगा दिया फिर भी उन्होंने,
आरोप हम पर। 
और,
आज वो ही,
कसूरवार होना चाहते हैं। 

गुरुवार, 1 मार्च 2018

अनुभूति

रह पाता, 
अगर मैं अकेला,रह जाता, 
हमेशा के लिये।
पर,आसान नहीं है, 
ऐसा करना। 
क्योंकि,जरूरत होती है इंसान को,सदा ही दूसरे इंसान की।
सोचता हूं क्या होता,अगर मैं आने ही न देता,किसी को जीवन में अपने।
पर संभव ही न था ऐसा हो पाना,क्योंकि,अकेले जीने की व्यथा को, 
महसूस किया है मैंने
करीब से,इतना करीब से,कि,यह व्यथा भी बनकर रह गयी है,एक अनुभूति जानी-पहचानी सी।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

किस्मतवाला

हँसता है,हंसाता है,
गम अपने वो,
सबसे छिपाता है। 

कहते हैं लोग,
खुश है वो,
और है,
किस्मतवाला भी। 

किये होंगे कर्म अच्छे,
 उस जनम में,
दे रहे हैं फल अच्छे जो,
इस जनम में। 

सुनता है वो,
दुखड़े उन मित्रों के,
है परेशान जो,
अपने ही बेटे-बहू से,
उनके परायेपन के बर्ताव से। 

मित्र आसूँ बहाते हैं,
वो सहानुभूति जताता है। 

और,

न जाने क्यों,
मित्रों के जाते ही,
फुट पड़ती है,
रुलाई उसकी भी। 
रो उठता है,
फूट -फूटकर,
वो खुद भी।