मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 15
" जाॅब कर करके मर जाओ। सीनियर अफसर तारीफ कभी करेंगे नहीं और आम जनता भरोसा कभी करेगी नहीं। लोग समझते हैं कि हम पुलिस वाले यहाँ आराम फरमाने और रिश्वत खाने के लिये ही बैठे हैं। " - इंस्पेक्टर सोमेश मुखर्जी बोला - " अब तुम ही बताओ नोखेलाल ! अगर हम लोगों को सिर्फ पैसों की ही तलब होती , तो पुलिस विभाग ज्वाॅइन ही क्यों करते , पैसा बनाने के पचासों तरीके इजाद किये जा सकते हैं और तरीके भी ऐसे , जिनमें जान का जोखिम ना हो।...तुम्हें क्या लगता है ? "
" किया तो जा सकता है सर ! " - नोखेलाल बोला - " लेकिन सरकारी नौकरी…"
" ...हर किसी के भाग में नहीं होती। " - नोखेलाल का अधूरा रह गया वाक्य किसी और स्वर के माध्यम से पूरा हुआ।
इंस्पेक्टर मुखर्जी और नोखेलाल दोनों ने आवाज़ की दिशा में घूमकर देखा , आवाज़ पुलिस स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार की ओर से आयी थी और उसका मालिक था - ' डिटेक्टिव साकेत अग्निहोत्री ! "
" आइये , अग्निहोत्रीजी ! स्वागत है आपका। " - इंस्पेक्टर व्यंग्य भरे लहजे में बोला - " जो कि लगता है , आपको नसीब नहीं हुई। "
" जाहिर सी बात है। " - इंस्पेक्टर मुखर्जी के ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए साकेत बोला - " नसीब हुई होती तो मैं जासूसी का पेशा ना अपनाकर आप ही की तरह किसी छोटे - मोटे पुलिस स्टेशन में सरकारी ड्यूटी बजा रहा होता। "
" वो तो तुम अब भी कर सकते हो। "
" आपको ऐसा लगता है ? "
" काबिलियत है तुममें। "
" अच्छा ! "
" सीधे क्राइम ब्रांच में लगवा सकता हूँ। "
साकेत मुसकराया।
" पुलिस की ये सरकारी नौकरी आप ही को मुबारक हो। मैं अपनी प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी में ही खुश हूँ। वैसे भी जाॅब प्राइवेट हो या सरकारी मेरी पर्सनैलिटी को सूट नहीं करती। "
" जाॅब तो तुम अब भी कर ही रहे हो , प्राइवेट डिटेक्टिव की। "
" यह जाॅब नहीं , मेरा पेशन है , जुनून है और आप इसे जाॅब ही समझते हैं तब भी इस जाॅब में अपना मालिक मैं खुद हूँ। मेरा कोई सीनियर नहीं है , लेकिन मैं कईयों का सीनियर हूँ और सबसे जरूरी बात , जब मन होता है , काम करता हूँ। जब मन होता है , आराम करता हूँ। "
इंस्पेक्टर मुसकराया - " और ऐसी ही जाॅब तुम्हारी पर्सनैलिटी को सूट करती है ! "
" सही फरमाया। "
" सब पैसों की माया है अग्निहोत्री जी ! वरना , यूँ महंगे सूट पहन के घूमना , फोरव्हीलर से नीचे पैर न रखना - हर किसी के बस में तो होता नहीं है। "
" सब इसी जासूसी के पेशे की बदौलत है। "
" छोटी सी डिटेक्टिव एजेंसी और 24 घंटे अलर्ट रहने वाले इतने बड़े स्टाफ के साथ ऐसी हाई लाइफ स्टाइल जीने लायक कमाई होना...कुछ तो झोल है अग्निहोत्री जी ! कुछ तो झोल है। "
साकेत मुसकराया - " कोई झोल नहीं है। मुझे अपने हर कस्टमर से एक - एक केस साॅल्व करने की अच्छी खासी रकम हासिल होती है। "
" खैर , छोड़िये इन अनसुलझी पहेलियों को। ये बताइये कि आज आपको हमारे इस गरीबखाने की याद कैसे आ गयी ? "
" कुछ दिन पहले एक कत्ल हुआ था। "
" किस तारीख को ? "
" 14 तारीख , वेलेंटाइन की रात को। "
इंस्पेक्टर मुसकराया - " वेलेंटाईन्स नाइट वाला मर्डर ? "
" हाँ , वही।...रिचा नाम था लडकी का। "
" हाँ , याद आया। लेकिन , तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो ? "
" कमाल करते हो इंस्पेक्टर साहब आप भी। प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ , दो ही चीजों से तो मतलब रखता हूँ। एक , पैसा और दूसरा वह केस , जिसे साॅल्व करने की एवज में मुझे पैसा मिलने वाला है। "
" ओह ! " - इंस्पेक्टर सोमेश मुखर्जी कुछ सोचते हुए बोला - " तो तुम रिचा वाले केस की इन्वेस्टीगेशन कर रहे हो ! "
" हाँ। "
" तो वह शख्स तुम ही हो , जिसके दम पर घमंड में भरकर रागिनी नाम की उस लड़की ने दोबारा पुलिस स्टेशन की ओर रूख करने तक की जरूरत नहीं समझी। "
" वह पहली बार कब आयी थी यहाँ ? "
इंस्पेक्टर मुसकराया - " डिटेक्टिव साहब ! आपको जरा भी अंदाजा है कि आप किसके सामने बैठे हैं ! "
" क्या मतलब ? "
" जिनके जवाब आपको पहले से मालूम है , ऐसे सवाल पूछकर अपना और मेरा कीमती वक्त बर्बाद करने की क्या जरूरत है ? "
" आप तो बुरा मान गये इंस्पेक्टर साहब ! " - साकेत बोला - " मुझे लगा कि आप डिटेल में बात करना पसंद करेंगे , इसीलिये मैंने यह सवाल पूछा था। अब अगर आपको शाॅर्ट में ही बात करना पसंद है , तो ठीक है , मैं अपना सवाल ही बदल देता हूँ। "
" बातों से ज्यादा मैं काम करना पसंद करता हूँ। "
" ओके। अब एक काम के सवाल का जवाब दीजिये। "
" पूछो। "
" रागिनी अंतिम बार पुलिस स्टेशन कब आयी थी ? "
" क्या बात है अग्निहोत्री ! तुम्हारी सूई तो रागिनी पर ही अटकी हुई है। " - इंस्पेक्टर मुसकराकर बोला - " इन्वेस्टीगेशन तुम रिचा के कत्ल की कर रहे हो , लेकिन सवाल रागिनी के बारे में पूछ रहे हो। वजह जान सकता हूँ इसकी ? "
" आप खुद को इंस्पेक्टर कहते हैं और जवाब एक मामूली सवाल का नहीं दे सकते। " साकेत ने कहा - " लेकिन मैं आपकी तरह नहीं हूँ।...रागिनी बहुत बेताब है रिचा के कातिल तक पहुंचने के लिये और इसीलिये वह कल सुबह मेरे पास आयी थी यह केस लेकर। वह चाहती है कि जल्द से जल्द कातिल का पता चल जाये और इसीलिये मेरा मानना है कि वह मेरे अकेले के भरोसे तो रहेगी नहीं , आपके निरंतर सम्पर्क में रह रही होगी। लेकिन आपका कहना है कि उसने दोबारा पुलिस स्टेशन की ओर रुख तक नहीं किया ! इसका तो यही अर्थ निकलता है कि रिचा के कत्ल के बाद वह सिर्फ दो ही बार यहाँ आयी होगी। एक , F.I.R. लिखवाने और दूसरा पोस्टमार्टम रिपोर्ट की जानकारी हासिल करने के लिये। "
" सही कहा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बारे में जान लेने के बाद उसने पुलिस स्टेशन की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। "
" जो लड़की कातिल तक जल्द से जल्द पहुंचना चाहती है , उसने महज एक F.I.R. लिखवाने के बाद आपसे सम्पर्क तक नहीं किया।...क्यों ? "
" क्योंकि उसने तुमसे सम्पर्क कर लिया। "
" आप कहना क्या चाहते हैं ? "
" सुनो जासूस ! " - मुखर्जी बेहद गंभीर स्वर में बोला - " जनता को पुलिस पर भरोसा नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बारे में बताने के साथ ही मैंने स्पष्ट कर दिया था कि कातिल का पता लगाना काफी मुश्किल है। रागिनी निराश होकर जाने लगी , तब मैंने आकाश से की गयी पूछताछ के बारे में भी बताया था। मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह 24 घंटों के भीतर केस की प्रोग्रेस के बारे में पता करने पुलिस स्टेशन जरुर आयेगी , लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। "
" हाँ , वैसे उसने बताया था कि उसे पुलिस विभाग पर भरोसा नहीं है , क्योंकि यह सरकारी तंत्र का एक हिस्सा है। " - साकेत ने बताया।
" लोग समझते हैं कि सरकारी तंत्र का हिस्सा होने की वजह से पुलिस वाले काम नहीं करते , रिश्वत लेते है , आराम करते हैं। लेकिन…" - मेज़ पर रखी कुछ फाइलों की ओर संकेत करते हुए इंस्पेक्टर बोला - " ये किसी को दिखायी नहीं देता।...तुम बताओ अग्निहोत्री ! क्या पुलिस ठीक से काम नहीं करती ? "
" करती है इंस्पेक्टर साहब ! करती है। और सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जिस पुलिस विभाग पर अविश्वास करके रागिनी ने एक प्राइवेट डिटेक्टिव को हायर किया है , उस डिटेक्टिव को भी मदद के लिये पुलिस विभाग के पास ही आना पड़ा है। "
" तुम्हें मदद चाहिये ? " - इंस्पेक्टर मुखर्जी चौंका - " और वह भी मुझसे ? "
" हाँ , लेकिन आप तो एक छोटे से सवाल का जवाब देने से भी कतरा रहे हैं। "
इंस्पेक्टर मुसकराया - " यह बात नहीं है। पिछले कुछ दिनों से मैं पुलिस वालों के प्रति जनता के रवैये को लेकर काफी परेशान हूँ।...अब इस वेलेंटाइन नाइट मर्डर केस को ही ले लो। लोगों की पहली ही शिकायत थी कि कत्ल की सूचना मिलने के बाद भी पुलिस समय पर नहीं पहुंची। उस समय हम लोग किसी और केस में फंसे हुए थे , इसीलिये घटनास्थल तक पहुंचने में वक्त लग गया। मगर लोगों को इसकी कोई परवाह नहीं और रागिनी ने भी...खैर , जाने दो। लेकिन तुम यहाँ पुलिस से मदद मांगने आये हो , यह जानने के बाद मुझे विश्वास हो गया है कि लोगों को अब भी पुलिस विभाग पर काफी भरोसा है। "
इंस्पेक्टर की नकली मुसकराहट के पीछे छिपी तकलीफ को पहचानने में साकेत को एक पल भी नहीं लगा।
" आप बेमतलब ही निराशा के गर्त में डूबे हैं इंस्पेक्टर साहब ! " - साकेत बोला - " मुझ जैसे प्राइवेट डिटेक्टिव के सामने एक वक्त में सिर्फ एक ही केस होता है , लेकिन आप पुलिस वाले एक वक्त में कई केस पर काम करते हैं। ऐसे में सबकी उम्मीदों पर खरा उतरना थोड़ा मुश्किल तो होता ही है। "
" तुम काफी अच्छी सोच रखते हो साकेत ! " - इंस्पेक्टर सोमेश मुखर्जी ने कहा - " वैसे किस तरह की मदद चाहिये तुम्हें ? "
" रिचा के केस की प्रोग्रेस जानना चाहता हूँ। "
" तुमने क्या पता लगाया ? "
" अभी तक तो कुछ भी नहीं। "
" तो मेरी एक सलाह मानो , इस केस को तुम रहने ही दो।"
" क्या मतलब ? "
" अपने जासूसी कैरियर में तुमने अब तक 17 केस साॅल्व किये है और कभी असफल नहीं रहे हो , सच कह रहा हूँ ना ? "
" बिल्कुल। "
" एक पुरानी कहावत है , आप चाहे जितने भी सफल हो , एक छोटी सी चूक सारी सफलता को एक पल में धूल के ढेर में तब्दील कर सकती है। "
" आप कहना क्या चाहते हैं ? "
" तुम्हारे कैरियर का यह 18वां केस ऐसी ही एक चूक साबित हो सकता है। "
" आप मुझे डराने की कोशिश कर रहे हैं ? "
" नहीं। लेकिन , तुमने इस केस के संबंध में और कुछ जाना हो या ना जाना हो , इतना तो जान ही लिया होगा कि कातिल बहुत चालाक है और उस तक पहुंचना काफी मुश्किल है। "
" कातिल कितना ही चालाक क्यों ना हो , ज्यादा देर तक छिपा नहीं रह सकता। "
" तुम्हारी हर बात सच है साकेत ! " - इंस्पेक्टर बोला - " लेकिन , यह केस बेहद उलझा हुआ है और कातिल ने कहीं कोई सुराग तक नहीं छोड़ा। "
" आपके बात करने के तरीके से तो ऐसा लग रहा है कि आपने कातिल का पता लगा लिया है और वह कोई बहुत ही खतरनाक शख्स है। "
इंस्पेक्टर मुखर्जी हंसा - " तुम्हारी दोनों ही बातें गलत है साकेत ! मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि ईश्वर ना करे , अगर तुम कातिल का पता लगाने में नाकाम रहे तो तुम्हारा जासूसी कैरियर संकट में पड़ जायेगा। जानते हो ना , प्राइवेट डिटेक्टिव के जिस पेशे में तुम हो , उसमें एक भी केस के असफल होने का अर्थ है , पिछली सारी सफलताओं को भूला दिया जाना और अगर ऐसा हुआ तो तुम्हें कोई पूछेगा तक नहीं। "
साकेत मुसकराया - " आप चाहते हैं कि मैं इस केस से अपने कदम पीछे कर लूँ ? "
" हाँ। "
" और वजह भी नहीं बताना चाहते ? "
" वजह मैं बता चुका हूँ , यह केस तुमसे साॅल्व नहीं होने वाला। "
" मतलब , आप मुझे कोई जानकारी देना ही नहीं चाहते। "
" तो तुम पीछे नहीं हटोगे ? "
" नहीं। "
" ठीक है। " - इंस्पेक्टर मुखर्जी थोड़ा आवेश में बोला - " तो जाकर पता कर लो कातिल का। साइको किलर है। "
" क्या ? " - साकेत लगभग चीखते हुए बोला।
" क्यों , डर गये ? "
" कौन है कातिल ? "
" रिचा के मर्डर से एक दिन पहले उसी के काॅलेज की दो लड़कियां अचानक से गायब हो गयी थी , मुझे शक है कि वे लड़कियां गायब नहीं हुई बल्कि उनका भी रिचा की तरह ही कत्ल किया गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन लडकियों की लाशें तक नहीं मिल पायी और रिचा की लाश मिली है। कत्ल करने के बाद जो शख्स सुराग मिटा सकता है , वह लाश भी गायब कर सकता है।...मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि इन तीनों का कातिल एक ही है और 24 घंटे के भीतर तीन कत्ल करने वाला शख्स कोई साइको किलर ही हो सकता है। "
' साइको किलर ' शब्द सुनकर साकेत अंदर तक से हिल गया।
" इसीलिये कह रहा हूँ , इस केस को भूल जाओ। यह काम हम पुलिस वालों को करने दो। " - इंस्पेक्टर सोमेश मुखर्जी की बड़ी प्रबल इच्छा थी कि साकेत इस केस को छोड़ दे।
" सहयोग के लिये शुक्रिया इंस्पेक्टर साहब ! " - साकेत खड़े होते हुए बोला - " चलता हूँ। "
साकेत पुलिस स्टेशन से बाहर निकला।
उसने रिस्टवाॅच पर निगाह डाली।
10 बज चुके थे।
वह कार में बैठा और कार यूनिवर्सिटी रोड़ पर दौड़ा दी।

0 Comments