उस बारिश के बाद - 35
“ब्लैकमेलर के ट्रैप में फंसने के बाद मैंने जो निर्णय लिया, उससे तुम्हारी लाइफ बिखर गई।” - अंकिता सौरभ के सवालों का जवाब देते हुए बोली - “मैं उस ब्लैकमेलर के हाथों की कठपुतली नहीं भी बनती, तब भी बिखरना तो तुमको था ही।.. खैर, उस समय जो मुझे समझ आया, मैंने किया।…पर तुम्हारे शहर छोड़ने से सबसे ज्यादा तकलीफ तुम्हारी मां को ही हुई थी और तुम्हारी मां ने तुम्हारे बेस्ट फ्रेंड आकाश से कई बार कहा कि वो तुमको वापस इस शहर में लेकर आ जाए।…तुम्हारी मां इतना तो समझती थी कि तुम्हारे इस शहर को छोड़कर जाने की वजह मैं ही थी, लेकिन उनको पता नहीं था कि इस खेल में आकाश भी शामिल था।…तीन साल तक तो सब कुछ नॉर्मल चलता रहा। पर फिर एकाएक ही मेरा दिमाग में एक विचार आया, एक ऐसा विचार, जो बहुत पहले आ जाना चाहिए था।”
“कैसा विचार ?”
“उस ब्लैकमेलर की तरफ से मुझे सिर्फ एक कॉल आया था और महज एक वीडियो मिला था, पर उस घटना को तो अब तीन साल बीत चुके थे। उसने न तो उस विडियो को वायरल किया और न ही दोबारा मुझसे कोई कॉन्टैक्ट किया।…तो फिर, अब मैं किस चीज से डर रही थी!... मेरे डरने की अब कोई वजह ही नहीं थी और उधर आकाश भी कई बार मुझसे कह चुका था कि तुम्हारी मां तुमसे मिलना चाहती थी।…कभी - कभी तो ऐसा लगता था कि अगर मैं तुमसे प्यार ही नहीं करती, अगर मैं कभी तुम्हारी लाइफ में आई ही नहीं होती, तो तुम कभी शहर छोड़कर नहीं जाते।”
“और इसीलिए तुमने मुझे वापस बुलाने का निर्णय लिया ?”
“हां।…मुझे लगा था कि इतने सालों बाद शायद तुम पिछली बातें भुलाकर मुझे माफ कर दोगे। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और हालात ऐसे हो गए कि यहां आने के बाद भी तुम यहां रुकने को तैयार नहीं थे।…कहीं अगर तुम फिर से ये शहर छोड़कर चले जाते, तो शायद फिर कभी नहीं आते।…बस यही सोचकर आज मैंने तुमको सारी सच्चाई बताने के लिए यहां बुलाया और रही बात तुम्हारी याद आने की, तो तुम्हें मैं भूली ही कब थी, जो याद करती!” - कहते हुए अंकिता एक बार फिर सौरभ के गले लग गई।
सालों से बिछड़े दो निश्छल हृदय आज फिर से एक हो चुके थे।
अचानक आकाश बादलों से घिरने लगा, बादल गरजने लगे, बिजलियां चमकने लगीं।…बारिश एक बार फिर शुरू हो चुकी थी।
***
कहने की आवश्यकता नहीं कि सौरभ की लाइफ में एक तूफान थम चुका था, तो दूसरा उठ भी चुका था।
सौरभ ने अब हमेशा के लिए जयपुर शहर में ही रहने का निर्णय तो ले लिया था, लेकिन उस वीडियो ने उसके दिलोदिमाग में हलचल सी मचा दी थी।
अंकिता उसकी लाइफ में फिर से आ चुकी थी, आकाश फिर से उसका बेस्ट फ्रेंड बन चुका था, मां के साथ उसका रिश्ता फिर से मजबूत हो चुका था।
लेकिन, जो नया तूफान उसकी जिन्दगी में उठा था, उसने उसे विचलित तो कर ही दिया था। पर, साथ ही वह सच्चाई को करीब से जानने की भी जिद करने लगा था।…वजह साफ थी, कभी - कभी कुछ ऐसी बातें होती है, जिनको अपनी आंखों से देखकर भी इंसान उस पर विश्वास नहीं कर पाता।
सौरभ के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था।
ब्लैकमेलर का वह वीडियो उसने देखा जरूर था, लेकिन वह उस पर विश्वास अभी तक नहीं कर पाया था।
वह उस वीडियो को सत्यता को परखना चाहता था और ऐसा करने का एक ही तरीका था। वीडियो में दिख रहे दो लोगों से मिलकर पूछताछ करना!
परिचित तो वह उन दोनों से ही था। लेकिन, उनमें से एक से वह न केवल परिचित था, बल्कि उससे खून का रिश्ता था उसका!.. क्योंकि वह शख्स और कोई नहीं, बल्कि उसके खुद के पिता शलभ दीवान थे।
हां, ब्लैकमेलर ने जो आपत्तिजनक वीडियो भेजा था, उसमें एक शख्स उसके पिता शलभ दीवान थे!
और दूसरा शख्स था, उनकी सेक्रेटरी अर्चिता देसाई!
अब अपने पिता से तो वह कुछ पूछने से रहा, तो अब बची थी, अर्चिता देसाई!
वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था कि शलभ दीवान और अर्चिता देसाई में अफेयर जैसा कुछ था। लेकिन, सौरभ इस पर विश्वास नहीं कर पा रहा था।
सच पता लगाने का एक ही तरीका था और सौरभ ने उस पर काम करना शुरू कर भी दिया था।
***
ऑटो रिक्शा आर्ट्स कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने रुका। बाकी कॉलेज स्टूडेंट्स के साथ रोशनी सक्सेना भी रिक्शा से बाहर निकली।
उसने पिंक कलर का सलवार सूट पहना हुआ था। रिक्शा से उतरते ही उसने अपने पर्स से 100 रुपए का नोट निकालकर रिक्शा चालक की तरफ बढ़ाया।
“कीप द चेंज” - बोलकर वह कॉलेज की तरफ बढ़ चली।
“ऐसे कौन करता है भाई!” - खुश होते हुए रिक्शा चालक ने सोचा - “इस लड़की का किराया तो 40 रुपए ही हुआ है। पूरे 60 रुपए इसने कीप द चेंज बोलकर मुझे एक्स्ट्रा दे दिए।…वैसे इसका बड़ा सा चश्मा देखकर तो लगता ही है कि ये थोड़ी मेंटल थी।”
इधर कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार को क्रॉस करते हुए रोशनी सोच रही थी - “वो रिक्शा वाला जरूर मुझे मूर्ख समझ रहा होगा, क्योंकि मैंने पूरे 60 रुपए उसे टिप में दे दिए!... पर फर्क नहीं पड़ता। पापा रोज - रोज मुझे इतनी सारी पॉकेटमनी दे देते हैं खर्च करने को। अब इसको ऐसे किसी की हेल्प करने में खर्च करने में ही तो ज्यादा मजा आता है।”
रोशनी आर्ट्स कॉलेज में फाइनल ईयर की स्टूडेंट थी। सौम्या और अंकुर भी उसी के क्लासमेट थे।
हर रोज की तरह आज भी रोशनी जल्दी ही कॉलेज आ गई थी। हां, ये सच है कि वह घर से ये बोलकर निकली है कि उसे कॉलेज के लिए लेट हो रहा है। लेकिन अपने पापा की बकवास से बचने के लिए अक्सर उसे छोटे - मोटे झूठ बोलने ही पड़ते थे और आज की शादी वाली जो बकवास थी, वो तो इतनी वाहियात थी कि उससे बचने के लिए रोशनी कुछ भी कर सकती थी।
उसके पास शादी जैसी फालतू चीजों के लिए टाइम ही कहां था!
अपनी ही धुन में चली जा रही रोशनी के कदम उस वक्त अचानक ही थम गए, जब सार्थक नाम का वो फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट रेड रोज लेकर उसके सामने घुटनों के बल प्रपोज करने वाली स्टाइल में बैठ गया।
उसको देखते ही चश्मे के अंदर से ही रोशनी की बड़ी - बड़ी अट्रैक्टिव आँखें आश्चर्य की वजह से और भी ज्यादा बड़ी हो गई।

0 Comments