उस बारिश के बाद - 26
सुबह के 9 बजे थे। लेकिन सौम्या ने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा था। नींद तो उसकी बहुत देर पहले खुल गई थी। लेकिन, उठने का मन नहीं होने से वह बस यूं ही पलंग पर लेटी हुई थी।
बाहर बारिश हो रही थी। उसने ईशान का एक क्यूट सा गुड मॉर्निंग msg किया। वह ईशान के प्यार में थी और उसके बिना एक पल भी बिताना उसके लिए काफी मुश्किल हो रहा था। हां, अंकुर की चेतावनी उसे याद थी और उसने तय कर लिया था कि वह आगे से कभी भी सार्वजनिक रूप से ऐसी बेवकूफी नहीं करेगी, जिससे उसे भविष्य में किसी तरह की परेशानी झेलनी पड़े।
सौम्या के गुड मॉर्निंग msg के रिप्लाई में ईशान का गुड मॉर्निंग msg तो उसे मिला ही, साथ ही उसका कॉल भी आ गया।
सौम्या ने जल्दी से कॉल रिसीव की।
“हैलो, ईशान!” - सौम्या बोली।
“क्या कर रही हो ?”
“बस लेटी हूँ अभी तो।…और तुम ?”
“खास कुछ नहीं। आज हॉस्पिटल से छुट्टी ली थी मैंने।” - ईशान बोला - “पूरे दिन घर पर रेस्ट करने वाला हूं मैं।”
“गुड!”
“गुड बोलने से काम नहीं चलेगा!”
“तो ?”
“तुमको भी आना है यहां। मुझे कंपनी देने!”
ईशान की बात सुनकर सौम्या के होंठों पर एक शरारती मुस्कान उभर आई - “कंपनी देने!... इरादे तो नेक है ना तुम्हारे!”
“नेक है या नहीं, ये तो तभी पता चलेगा, जब तुम यहां आओगी।”
“ओके। दस मिनट में पहुंचती हूँ।” - कहते हुए सौम्या ने कॉल डिस्कनेक्ट की।
इसके बाद वह उठी और जल्दी से तैयार होने लगी। कुछ ही देर बाद वह ईशान के घर जाने के लिए तैयार थी। वह जल्दी से बाहर आकर स्कूटी पर सवार हुई।
***
उसकी आंखों पर बड़े - बड़े गोल फ्रेम का चश्मा लगा हुआ था और अंगुलियां की - बोर्ड पर बड़ी ही तेजी से शिरकत कर रही थी। चश्मा उसकी आंखों के साइज के हिसाब से काफी बड़ा था। वह हर थोड़ी देर में उसकी नाक पर थोड़ा सा आगे खिसक आता था, जिसे कि वह अपने हाथ की अंगुली से फिर से आंखों पर एडजस्ट कर लेती थी।
उसका चेहरा बर्फ की तरह सफेद था। आंखों की पुतलियां कंप्यूटर की स्क्रीन पर किसी मृगछोने की तरह बाएं से दाएं और दाएं से बाएं घूम रही थी।
इस समय वह उस रूम के एक छोटे - से हिस्से पर ही कब्जा जमाए बैठी थी। बाकी का पूरा कमरा, जिसकी साइज 20× 20 से कुछ ज्यादा ही थी, पूरी तरह से सुनसान और व्यवस्थित था।
डबल बेड का एक बड़ा सा पलंग, जिस पर वह अकेली सोया करती थी। एक साइड की वार्ड रॉब, जो कमरे की एक पूरी दीवार को घेरकर बनाई गई थी। इस वॉर्डरोब में उसके ढेर सारे कपड़े रखे हुए थे, जिनमें से ज्यादातर का तो वह उपयोग भी नहीं करती थी। बाकी की तीन दीवारों में से एक पर कमरे का प्रवेश द्वार और उसके दाएं - बाएं कुछ सजावटी सामान रखा हुआ था। एक पूरी दीवार तरह - तरह की किताबों से सजी बुकरैक से भरी हुई थी और एक दीवार पर नेचर का एक सुंदर सा वॉलपेपर लगा हुआ था। उस वॉलपेपर में एक झरना बहता हुआ दिख रहा था। झरने से गिरता हुआ पानी एक नदी बना रहा था और उस नदी के बीच में एक बड़ी सी चट्टान बनी हुई थी, जिस पर एक लड़की बैठी हुई थी। उसने अपने पैर नदी के जल में डुबोए हुए थे। साथ ही वह अपनी हथेली को अपनी ठुड्ढी से टिकाए हुए बैठी किसी गंभीर विचार में खोई हुई थी। उसने जो बड़ा सा चश्मा लगाया हुआ था, उससे तो साफ लग रहा था, जैसे कि उस वॉलपेपर में वही लड़की थी, जो इस समय रूम में मौजूद थी।
सुबह के 9 बजे का समय था। इसी समय मेड कॉफी लेकर आई।
लड़की को कंप्यूटर पर काम करते देख उसने वहीं एक मेज पर कॉफी की ट्रे रख दी और बोली - “सर ब्रेकफास्ट के लिए आपका वेट कर रहे हैं।”
मेड की बात पर वह पीछे पलटी और बोली - “बस 5 मिनट में आती हूँ।”
लड़की का जवाब सुनकर मेड वहां से चली गई।
लड़की ने जल्दी से कंप्यूटर शट डाउन किया और कॉफी का कप उठा लिया। वह रूम में टहलते हुए कॉफी सिप करने लगी। कॉफी पीकर टहलते हुए वह कुछ सोच भी रही थी। उसके चेहरे पर चिन्ता की रेखाएं साफ नजर आ रही थी।
“कॉलेज का ये प्रोजेक्ट में पैसे देकर किसी ऑनलाइन शॉप वाले से भी तैयार करवा सकती थी, जैसा कि ज्यादातर स्टूडेंट्स करेंगे ही।” - वह सोच रही थी - “लेकिन, उसमें मजा नहीं आता।…खुद मेहनत करके कुछ हासिल करने की खुशी ही कुछ और होती है। बस थोड़ी सी मेहनत और…फिर मेरा प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा।”
कॉफी खत्म करके वह रूम से बाहर निकली और सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंची, जहां पर उसके पिता ब्रेकफास्ट के लिए उसका इंतजार कर रहे थे।

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