उस बारिश के बाद - 27
उसके सामने ब्रेकफास्ट की टेबल पर तरह - तरह के फ्रूट्स, टोस्ट, डोसा आदि रखे हुए थे। धीरे - धीरे चलती हुई वह अपने पिता के ठीक सामने बैठी।
“मैं दस मिनट से तुम्हारा वेट कर रहा हूँ। जानती हो, मेरा समय कितना कीमती है!” - लड़की को देखते ही उसके पिता बोले।
“आई नो! बट, वो मैं अपने कॉलेज प्रोजेक्ट पर वर्क कर रही थी।” - लड़की लापरवाही से बोली और ब्रेकफास्ट करने के लिए एक प्लेट से टोस्ट उठाते हुए दूध के गिलास में उसे डिप करने लगी।
“मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है!” - लड़की के पिता ने सख्ती से कहा - “और ये कॉलेज प्रोजेक्ट जैसी फालतू चीजों में टाइम वेस्ट करने की जगह लाइफ में कुछ बड़ा करने की सोचो।”
लड़की का ध्यान अपने पिता की बात पर जरा भी होता, तो दूध के गिलास में टोस्ट को डिप करने जा रहा उसका हाथ बीच में ही रुक चुका होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिता की बात सुनना तो दूर, वह तो उनकी तरफ देख तक नहीं रही थी।
देखती भी कैसे! उसका सारा ध्यान तो ब्रेकफास्ट करने पर लगा हुआ था।…अपना अंतिम वाक्य बोलने के बाद उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए लड़की के पिता कुछ देर रुके।
लड़की अपना टोस्ट दूध के गिलास में डिप कर चुकी थी और अब वह उसे गिलास से ऊपर की तरफ उठा ही रही थी कि उसके पिता फिर से बोले - “तुम जानती हो, मैं हर चीज समय पर किया जाना पसंद करता हूं।”
“जी पापा!” - लड़की ने सिर उठाकर अपने पिता की तरफ देखा।
“तब थोड़ा ध्यान रखो इस बात का और एक अनुशासित बच्ची की तरह बिहेव करो।”
पिता के इस वाक्य के साथ ही लड़की के हाथ से टोस्ट का आधा दूध में डूबकर नरम हुआ हिस्सा टूटकर दूध की गिलास में ही वापस गिर गया।
“वो तो मैं कर लूंगी। पर, देखा आपने आपकी वजह से क्या हुआ !” - लड़की बोली।
“क्या हुआ ?”
“आपकी बात सुनने के चक्कर में मेरा टोस्ट गिलास में ही गिर गया।”
“क्या!... तो उससे क्या फर्क पड़ता है।…चम्मच से खा लो!” - लड़की के पिता ने लापरवाही से कहा।
लड़की ने अपने बड़े से चश्मे के इस तरफ से घूरकर पिता की तरफ देखा - “आप जानते है ना कि मुझे इस तरह से खाना पसंद नहीं!”
लड़की के पिता ने रसोइए को आवाज देकर दूध का दूसरा गिलास मंगवाया। लड़की ने एक नया टोस्ट अपने हाथ में लिया।
“अभी खाना शुरू मत करो। तुम्हारी ये हरकत मैं दोबारा बर्दाश्त नहीं करूंगा।”
लड़की ने टोस्ट फिर से प्लेट में रख दिया।
“जल्दी बोलिए। मुझे कॉलेज के लिए लेट हो रहा है।” - लड़की बड़ी मासूमियत से बोली।
“पिछले हफ्ते ही तुम्हारा आई चेक अप करवाया था मैंने।…हर बार की तरह इस बार भी तुम्हारी आंखों में कोई नुक्स नहीं निकला। फिर तुम ये बड़े - बड़े फ्रेम वाला इतना बड़ा चश्मा क्यों लगाए घूमती हो!... अगर तुम्हे चश्मे का शौक है ही तो कोई फैशनेबल चश्मा ले लो।.. ये सादे कांच का बहुत ज्यादा नंबर का दिखने वाला चश्मा लगाए घूमने का क्या मतलब है!”
“मुझे अच्छा लगता है।”
“हो सकता है। लेकिन, अब तुम्हे इसे पहनना छोड़ना होगा।”
“अच्छा!”
“बहुत जल्दी तुम्हारी शादी होने वाली है।”
“तो!”
“तो, हो सकता है कि ये इतना बड़ा चश्मा तुम्हारी शादी में रुकावट बन जाए!”
“एक तो आप बहुत जल्दी मेरी शादी करवाने की कोशिश में है। अब ऊपर से मैं अपनी पर्सनल लाइफ भी बदल दूं!”
“तुमको चश्मा पहनना बन्द करना होगा। इसकी वजह से तुम रिजेक्ट की जा सकती हो।”
“कौन.. लड़का कौन है?”
“सौरभ!... सनशाइन स्टील कंपनी के डायरेक्टर शलभ दीवान का बेटा!”
“सौरभ!... नाइस नेम!” - बोलते हुए लड़की ब्रेकफास्ट करने में व्यस्त हो गई।
इस बार उसके पिता भी ब्रेकफास्ट शुरू कर चुके थे।
ये थे अतुल सक्सेना। शलभ दीवान के बहुत अच्छे बिजनेस फ्रेंड।…वही शख्स, जिसकी बेटी से वे सौरभ की शादी करवाने का मन बना चुके थे।
और ये जो लड़की थी, वो थी - अतुल सक्सेना की बेटी रोशनी सक्सेना!
रोशनी अच्छे खासे बिजनेसमेन की बेटी जरूर थी। लेकिन, उसकी लाइफ स्टाइल वैसी नहीं थी, जैसी कि आम तौर पर अमीर घराने से ताल्लुक रखती लड़कियों की हुआ करती है। वह तो इस धरती पर एलियन की तरह थी।
अजीब हरकतें, अजीब आदतें! कभी - कभी तो खुद अतुल सक्सेना को यह डर लगने लगता कि कहीं रोशनी की दिमागी हालत खराब तो नहीं होने लगी है!... और ऐसा आज से नहीं, बल्कि तभी से था, जब वह सिर्फ 11 साल की थी। आंखों की तरह ही उसकी दिमागी हालत का भी रूटीन चेक अप हुआ करता था। लेकिन रिपोर्ट हमेशा निगेटिव ही आती रही थी।
अतुल सक्सेना ने बहुत कोशिश की थी कि उसकी बेटी भी आम लड़कियों की तरह घूमे - फिरे। खूब रुपए खर्च करे और लाइफ एंजॉय करे। इसके लिए वे उसे बहुत ज्यादा पॉकेट मनी भी देते थे। लेकिन, रोशनी की लाइफ स्टाइल में कभी कोई बदलाव नहीं आता।
जल्दी से ब्रेकफास्ट खत्म करके रोशनी उठी।
“बहुत जल्दी नहीं कर लिया ब्रेकफास्ट तुमने!” - अतुल सक्सेना बोले।
“मैंने बोला तो पापा!.. मुझे कॉलेज के लिए लेट हो रहा है।…अच्छा बाय! शाम को मिलते हैं।” - कहते हुए रोशनी तेजी से बाहर की तरफ भागी।
“ड्राइवर तुम्हें ड्रॉप कर देगा।” - अतुल सक्सेना ने पीछे से कहा।
“जरूरत नहीं है। मैं रिक्शा से चली जाऊंगी।” - अतुल सक्सेना को सिर्फ रोशनी की आवाज सुनाई दी।
हां। रोशनी कॉलेज अक्सर ऑटो रिक्शा से ही जाती थी। ये अजीब लग सकता है कि एक मिलेनियर बिजनेसमैन की बेटी होकर भी वह ऑटो रिक्शा से ही कॉलेज जाती थी। लेकिन, अगर एक बार आप समझ लें कि वह एक तरह से एलियन ही थी, तब कुछ भी अजीब नहीं रह जाता।

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