उस बारिश के बाद - 25
सौरभ और संजना पहाड़ों पर चढ़ ही रहे थे कि अचानक आकाश में बादल गरजने लगे और बिजलियां चमकने लगी।
“ये अचानक मौसम बदलने कैसे लगा!” - सौरभ आश्चर्य प्रकट करते हुए बोला।
“बारिश का मौसम है। बारिश कभी भी शुरू हो जाती है।” - संजना ने कहा।
पहाड़ पर चढ़ते हुए वे दोनों ही समतल चट्टान पर जा पहुंचे थे। यह चट्टान काफी बड़ी और समतल थी।
वे लोग पहाड़ चढ़ रहे थे, बिना किसी औजार या ट्रैकिंग के सामान के!.. तो इसकी वजह बस यही थी कि न तो उन पहाड़ों की चढ़ाई सीधी थी और न ही वे केवल पहाड़ थे।
वहां पर एक तरह की ऐसी चढ़ाई थी, जिस पर कोई भी बिना खास मेहनत के ऊपर की तरफ जा सकता था और पहाड़ों के साथ ही बीच - बीच में पेड़ और मिट्टी भी थी। यही वजह थी कि उनको चढ़ाई में कोई खास परेशानी नहीं हो रही थी। पहाड़ से ज्यादा तो वह चढ़ाई वाला जंगल था।
मौसम को बदलते देख वे वापस जाने के बारे में सोच ही रहे थे कि तभी हल्की - हल्की बारिश शुरू हो गई।
“कुछ देर पहले तक तो बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि बारिश भी आ सकती है!” - सौरभ ने कहा।
“हां! लेकिन अब क्या करें!.. यहां तो पेड़ो के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा, जो हमें भीगने से बचा सके!” - संजना बोली।
इस समय जिस जगह पर वे थे, वहां 4 - 5 ऐसे पेड़ थे, जिनके तने काफी पास - पास थे और यही वजह थी कि उन पेड़ो के पत्ते आपस में मिलकर एक बहुत बड़े और घने पेड़ का आभास दे रहे थे।
बारिश तेज होती देखकर सौरभ और संजना ने उन्हीं पेड़ों के नीचे शरण ली। उनको लगा कि वे पेड़ उन्हें भीगने से बचा लेंगे। हालांकि काफी हद तक उनको सही लगा था। लेकिन, फिर भी पेड़ों के पत्तों से छन - छनकर पानी उनके ऊपर भी गिर ही रहा था।
हल्की बारिश धीरे - धीरे तेज होती जा रही थी। वह तेज बारिश जल्द ही मूसलाधार बारिश में तब्दील हो गई। पेड़ के पत्तों से जल्द ही वर्षा के जल की बड़ी - बड़ी बूंदें तेजी से गिरने लगी। कुछ ही देर बाद सौरभ और संजना लगभग पूरी तरह भीग चुके थे।
“ये बारिश तो बहुत तेज हो गई। अब तो सर्दी भी लग रही है!” - संजना बोली।
“अब तो हम पूरे भीग चुके हैं। तो पानी का तो डर रहा नहीं।” - सौरभ ने कहा - “चलो, वापस चलते हैं अब।”
“ठीक है।” - संजना ने कहा।
इसके बाद वे दोनों ही बारिश में भीगते हुए भी उस पहाड़ से धीरे - धीरे ढलान की तरफ बढ़ने लगे।
चलते - चलते एक जगह पर सौरभ को एक गुफा दिखाई दी।
गुफा को देखकर सौरभ, संजना से बोला - “वो देखो! उधर एक गुफ़ा है। वहां जाकर शायद हम बारिश से बच सकते हैं।”
“हां। ठीक है। चलो उधर ही चलते हैं।” - संजना के कहते ही वे दोनों दौड़कर गुफा की तरफ गए।
गुफा अंदर से थोड़ी बड़ी थी। वहां पर बारिश का पानी नहीं आ रहा था।
“हमने बारिश से बचने की जगह तो ढूंढ ली। लेकिन, अब तो हम बहुत ज्यादा भीग चुके हैं और मुझे तो ठंड भी लग रही है।” - संजना ठंड से काँपते हुए बोली।
सौरभ, संजना को ध्यान से देख रहा था।
“यह तो ठंड से बुरी तरह काँप रही है। अगर जल्दी ही इसको गर्मी नहीं मिली, तो इसकी तबियत बिगड़ सकती है।” - सोचते हुए सौरभ ने गुफा में इधर - उधर नजर डाली।
वहां उसे कुछ पत्थर और सूखी घास और लकड़ी के कुछ टुकड़े पड़े दिखे। उन सब चीजों को देखकर सौरभ के होंठों पर मुस्कान उभर आई। उसने जल्दी से दो छोटे पत्थर उठाए और उन्हें आपस मे घिसा। उनसे चिंगारी निकली और उस चिंगारी से सौरभ ने सूखी घास में आग लगाई और जब घास में अच्छी तरह आग लग गई, तो सौरभ ने उस पर लकड़ी के टुकड़े रख दिए।
सौरभ की ये करामात देखकर संजना खुशी से चीख उठी - “वाउ, सौरभ! यू आर जीनियस!”
कुछ देर पहले जो गुफा अंधकार में डूबी थी, वो अब आग से रोशन हो उठी थी।
संजना आग के काफी पास सरक आई और अपने भीगे शरीर को सूखाने का जतन करने लगी। सौरभ भी संजना के सामने ही आग के पास बैठ गया। इस समय उसे बहुत अच्छा लग रहा था। जिस एहसास को इस समय वह जी रहा था, वह उसके लिए अत्यंत दुर्लभ था।
धीरे - धीरे उनके कपड़े सूखने लगे थे। उनके चेहरों से टपकने वाली पानी की बूंदें भी अब सूख चुकी थी।
“अब कैसा लग रहा है ?” - सौरभ ने संजना से पूछा।
“बहुत अच्छा!” - संजना मुस्कुराते हुए बोली - “कुछ देर पहले तो इतनी तेज ठंड लग रही थी कि मैं बता नहीं सकती।”
संजना को मुस्कुराते देख सौरभ भी मुस्कुरा उठा। ठीक उसी समय उनकी नजरें पल भर के लिए मिल गई। लेकिन, अगले ही पल वे दूसरी - दूसरी तरफ देखने लगे।
कुछ देर बाद फिर उनकी नजरें मिली और फिर वे दूसरी - दूसरी तरफ देखने लगे।…ऐसा कई बार हुआ और अंत में, दोनों के ही दिल में खुशी की लहरें दौड़ने लगी।
आखिरकार, सौरभ बोला - “हमारे कपड़े भी अब तो इस आग से सूख चुके हैं। अब हमें चलना चाहिए।”
“ओके।” - संजना धीमे स्वर में बोली।
बाहर निकलने पर उन्हें पता चला कि बारिश तो कब की बन्द हो चुकी थी।
वे चुपचाप, बिना किसी आवाज के पहाड़ से नीचे उतरने लगे। वे कुछ बोल नहीं रहे थे। लेकिन, उनकी खामोशी काफी कुछ कह रही थी।
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