उस बारिश के बाद - 19
“भाई! केशव नगर से होते हुए चलना, किसी से मिलते हुए जाना है।” - इंस्टा पर msg का रिप्लाई करते हुए सौरभ ने ड्राइवर से कहा।
“ओके सर!” - बोलते हुए ड्राइवर ने मोबाइल पर केशव नगर की लोकेशन सेट कर दी।
“I'm On the way.” - सौरभ ने msg के रिप्लाई में लिखा था।
इसके साथ ही उसने कैब ड्राइवर को केशव नगर चलने का इंस्ट्रक्शन दिया था।
“I'm Also.” - संजना के रिप्लाई ने सौरभ को थोड़ा चौंका दिया।
“तो, वह खुद भी अभी घर पर नहीं है!” - सौरभ ने सोचा।
सौरभ को वैसे भी कोई ज्यादा जल्दी नहीं थी। उसकी ट्रेन एक घंटे बाद थी। कैब केशव नगर की तरफ चल पड़ी।
रास्ते का ट्रैफिक, बड़े - बड़े हॉर्डिंग, इमारतें, रेस्टोरेंट आदि देखकर शहर के बारे में सौरभ सोच रहा था - “कितना प्यार था मुझे इस शहर से! यहां की सड़कें, यहां को इमारतें - सबसे कितना लगाव था मुझे! लेकिन अब.. अब तो सिर्फ नफरत है।”
अपने ही खयालों में खोए सौरभ को पता ही नहीं चला कि कैब कब केशव नगर कॉलोनी के मकान नंबर 34 के बाहर तक पहुंच गई। ड्राइवर को वेट करने का बोलकर सौरभ ने संजना के घर की बेल बजाई।
कुछ ही देर बाद गेट खुला। गेट खोलने के लिए जो लड़की आई थी, उसे सौरभ ने पहले कभी देखा तक नहीं था।
लोहे का गेट खोलकर सौरभ को देखते ही वह बोल पड़ी - “आपका नाम सौरभ है ?”
“हां।” - सौरभ धीरे से बोला।
“संजना को आने में थोड़ी देर लगेगी।.. आप अंदर आइए ना !” - सौम्या उसे अन्दर आने का संकेत करते हुए बोली - “संजना का फोन आ गया था। इसीलिए मुझे आपके बारे में पता है।”
सौम्या के पीछे - पीछे आते हुए सौरभ ने पहले लोहे का व्हाइट कलर का गेट क्रॉस किया। इसके बाद 3 - 4 कदम पोर्च में चलने के बाद वह 4 सीढ़ियां चढ़कर घर के भीतर दाखिल हुआ। घर में दाखिल होते ही उसने खुद को हॉल में पाया।
हॉल में ही रखे एक सोफे की तरफ संकेत करते हुए सौम्या बोली - “आप यहां बैठिए।”
सौरभ बैठा।
सौम्या भी उसी के सामने रखे एक दूसरे सोफे पर बैठी।
“मेरा नाम सौम्या है।” - सौम्या ने अपना हाथ सौरभ की तरफ बढ़ाते हुए कहा - “मैं संजना की छोटी बहन हूँ।”
सौरभ ने मुस्कुराते हुए संजना से हाथ मिलाया।
“आपने अपना नाम नहीं बताया ?” - सौम्या ने पूछा।
“वो तो शायद आपको पहले से ही मालूम है।” - सौरभ फिर से मुस्कुराया।
जवाब में सौम्या भी मुस्कुराई।
“तो क्या लेंगे आप चाय, कॉफी या कुछ ठंडा ?” - सौम्या ने कैजुअली पूछा।
“नो थैंक्स!”
“अरे, ऐसे कैसे!... आप तो शायद पहली बार हमारे घर आए हैं। कुछ तो लेना ही होगा ना!”
“तो आप बस एक गिलास पानी ले आइए।”
“ओके।” - बोलते हुए सौम्या उठी और किचन की तरफ चली गई।
इसी समय घर की बेल बजी।
सौम्या दौड़ती हुई आई और पानी का गिलास लिए - लिए ही गेट खोलने गई।
कुछ ही देर बाद जब वह वापस आई तो उसके साथ संजना भी थी।
पानी का गिलास सौरभ को पकड़ाते हुए वह संजना से बोली - “तू भी कमाल करती है संजू! तुझे पता भी है कि तेरा बॉयफ्रेंड कितनी देर से तेरा इंतजार कर रहा है!”
सौम्या की इस बात पर हाथ में पानी का गिलास लिए बैठा सौरभ और सोफे के पास ही खड़ी संजना दोनों ही बुरी तरह से चौंक उठे।
“क्या तू कुछ भी बोल रही है!” - संजना जल्दी से बोली - “मैंने बताया तो था कि मेरा एक फ्रेंड आ रहा है।”
“हां तो ये बॉय नहीं है क्या!” - सौम्या आंख मारते हुए शरारती अंदाज में बोली - “अच्छा! आप अपने फ्रेंड से बात करो। मैं तो अपने रूम में जा रही हूं।”
सौम्या दौड़कर सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर की तरफ चली गई।
संजना, सौरभ के सामने ही एक सोफे पर बैठी।
“तो, तुम मुझसे मिलना चाहती थी!” - बात शुरू करने के लिए सौरभ बोला।
“हां।.. मुझे लगा हमें मिलना चाहिए।” - संजना धीमे स्वर में बोली।
“क्यों ?”
“क्या ?”
“क्यों लगा कि मिलना चाहिए ?”
संजना, सौरभ के सवाल का जवाब सोच ही रही थी कि उसका ध्यान सौरभ के बैग पर गया, जो सोफे के पास ही रखा हुआ था।
“ये बैग!” - संजना चकित स्वर में बोली।
“मेरा है।” - सौरभ ने कहा।
सौरभ की बात पर संजना हँसी - “तुम ये बैग लिए - लिए कहां घूम रहे हो ?”
“मैं वापस जा रहा हूं।” - सौरभ ने मानो विस्फोट सा करते हुए कहा।
“शहर छोड़कर!”
“हां।”
“जिस काम के लिए आए थे, वह हो गया ?”
“नहीं।” - सौरभ दूर कहीं शून्य में देखते हुए बोला - “अंकिता मुझे जो झूठी कहानी सुनाना चाहती है, उसे सुनने की हिम्मत मुझमें तो नहीं है।…और यहां आने की वजह अंकिता की वही झूठी कहानी सुनना थी।”
“तुम्हे कैसे पता कि वह तुम्हें कोई झूठी कहानी सुनाना चाहती है ?”
“वो कहती है कि आकाश और उसके बीच कुछ भी नहीं है, न कभी था। लेकिन, मैंने खुद अपनी आंखों से देखा था कि उनके बीच…”
“तो इसीलिए अब तुम वापस जा रहे हो ?”
“हां।”
“अजीब है!”
“क्या ?”
“महज दो लोगों की वजह से तुमने पूरे शहर को ही छोड़ दिया।…भगोड़े बन गए!”
“मैं भगोड़ा नहीं हूं।” - सौरभ थोड़ा तेज स्वर में बोला।
“तो भाग क्यों रहे हो ?”
“मैं भाग नहीं रहा। बस वापस जा रहा हूं।”
“एक ही बात है।”
“छोड़ो भी ये सब!... तुम मुझसे क्यों मिलना चाहती थी ?”
“बताती हूँ।” - संजना बोली - “मेरे साथ आओ।”
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