उस बारिश के बाद - 18

 उस बारिश के बाद - 18

“सौरभ! आखिर तू चाहता क्या है ? पूरे तीन साल बाद जब तेरी वापसी की सूचना मिली तो मुझे लगा कि अब तू पुराना सब कुछ भूल गया है। एक नई शुरुआत करने के लिए वापस आ रहा है।” - सौरभ की मां शालिनी दीवान सौरभ को समझा रही थी - “लेकिन, तेरा रवैया देखकर तो लगता है कि तू अब भी उस लड़की को भूला नहीं है!... कब तक सौरभ!... कब तक चलता रहेगा ये सब!.. कब तक तू उस लड़की के चक्कर में अपनी लाइफ को ऐसे ही तबाह करता रहेगा!”

शालिनी दीवान का बोलना शायद रुकता ही नहीं, अगर सौरभ बीच में न बोल उठता - “मेरा अब उस लड़की से कुछ लेना - देना नहीं है!... मैं कोई अपनी लाइफ बर्बाद नहीं कर रहा हूं।…मुझे बिजनेस करने में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। अपने खुद के दम पर कुछ करना चाहता था, इसीलिए जयपुर से जबलपुर गया था और अब भी वहीं हूँ!”

“अच्छा!.... जरा मैं भी तो सुनूं कि क्या कर लिया तूने इन तीन सालों में अपने दम पर!”

“दिल दुखाने वाली बातें मत करो मां!” - सौरभ थोड़ा चिल्लाया - “अभी मेरा स्ट्रगल टाइम चल रहा है। मैं जल्द ही कुछ बड़ा कर दिखाऊंगा!”

“तू कितना ही स्ट्रगल कर ले! कितना ही कुछ बड़ा करने की कोशिश कर ले!.. अपने पिता की तरह बड़ा बिजनेस मेन तो नहीं बन पाएगा ना!” - शालिनी दीवान बोली।

“पैसा और रुतबा ही सब कुछ नहीं होता!” - सौरभ बोला।

“तो तू इनसे भी कुछ बड़ा करने वाला है !... क्या करने वाला है!”

“जब कर लूंगा तो आपको खुद ही पता चल जाएगा।” - कहते हुए सौरभ तेजी से सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने रूम में जा पहुंचा।

सौरभ का घर, घर न होकर एक तरह का बंगला ही था।  घर में 3 - 4 नौकर भी थे, जो कि इतने बड़े घर की सालों से देखभाल कर रहे थे।

सौरभ अपने माता - पिता की इकलौती संतान था।.. कहने का अर्थ है कि उस घर कुल 3 ही सदस्य रहते थे।

सौरभ की मां शालिनी दीवान कभी नहीं चाहती थी कि वे लोग इतने बड़े घर में रहे। लेकिन सौरभ के पिता शलभ दीवान को विरासत में जो कम्पनी मिली थी, उसे उन्होंने इतना अधिक आगे बढ़ा दिया था कि अब उनकी गिनती जयपुर शहर के टॉप 5 बिजनेस घरानों में होने लगी थी।

इसके साथ ही अपने चारों तरफ उन्होंने खुद की बनाई हुई ऐसी दीवारें खड़ी कर दी थी, जो उनको यह विश्वास दिलाती थी कि समाज में उनका बड़ा नाम और रुतबा है।

अब इस रुतबे के अनुरूप उनके पास बंगला और दिखावे के लिए शोहरत की तमाम चीजें भी तो होनी ही चाहिए थी।…बस इसीलिए उन्होंने इस बंगले में अपना मुकाम बनाया हुआ था और ड्राइवर, बागवान, रसोइया, नौकर - इन सबको इस बंगले की देख रेख के लिए लगाया हुआ था।

इतने अमीर घराने का वारिस होने के कारण सौरभ खुद भी अपनी जिन्दगी बड़े आलीशान ढंग से जीता आया था। उसकी लाइफ स्टाइल में महंगे ब्रांड की चीजें इस्तेमाल करना और लग्जरी लाइफ जीना भी शामिल था।..

लेकिन, ये सब तो अब पुरानी बातें हो चुकी थी। तीन साल पहले जो कुछ उसके साथ हुआ था, उसके बाद तो जैसे उसने किसी का अहसान तक न लेने की कसम खा ली थी। वह जो भी कुछ करता, अपने दम पर ही करता था।
अब वह सामान्य जीवन शैली से समझौता कर चुका था।

“बस, बहुत हो गया। अब और नहीं झेल सकता मै ये सब!” - अपने रूम में पहुंचकर सौरभ फिर से अपने ही हीन विचारों के जाल में फंस गया - “जबलपुर में कितनी अच्छी लाइफ थी मेरी! कितना बेवकूफ था मैं, जो आकाश के एक कॉल पर यहां दौड़ा चला आया! वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि अंकिता मुझे कोई झूठी कहानी सुनाना चाहती है!... अब और नहीं रुक सकता मै यहां।”

इसके साथ ही सौरभ ने फिर से शहर छोड़ने का फैसला कर लिया। तत्काल में उसने जबलपुर का AC क्लास का ट्रेन टिकट बुक किया और बैग तैयार करने लगा।

जबलपुर से आते समय उसने सांगानेर तक का ही AC क्लास का टिकट बुक किया था। सांगानेर में उसका एक फ्रेंड रहता था, जो कि उससे मिलना चाहता था। उसी की जिद पर वह जबलपुर से सीधा सांगानेर ही पहुंचा था। कुछ घंटे वहां रुककर वह ट्रेन से ही जयपुर आया था और सांगानेर रेलवे स्टेशन पर उसकी मुलाकात संजना से हुई थी। उसी के साथ तो वह जयपुर आया था।.. कितना अच्छा कटा था उसका सांगानेर से जयपुर तक का वह सफर!
लेकिन अब तो उसे सीधे जबलपुर ही जाना था।

बैग लेकर वह जल्द ही रूम से बाहर निकलकर सीढ़ियों से नीचे उतरा।
नीचे उसकी मां अभी हॉल में सोफे पर ही बैठी न्यूजपेपर पढ़ रही थी। उसे बैग के साथ देखकर उसने पेपर वहीं टेबल पर रखा।

“कहां जा रहा है ?”

“मैं वापस जा रहा हूं मां!”

“इतना जल्दी!” - आश्चर्य भरे स्वर में बोलते हुए शालिनी दीवान सोफे पर से उठते हुए बोली - “अच्छा होता, अगर कुछ दिन और रुक जाते।”

“नहीं रुक सकता मां! प्राइवेट जॉब है मेरी। जितनी छुट्टियां लेकर आया था, वो पूरी हो गई।”

शालिनी व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोली - “इतने बड़े बिजनेसमैन का बेटा होकर भी तू प्राइवेट जॉब के लिए मरा जा रहा है!”

“मेरे पास बेकार बातों के लिए टाइम नहीं है मां! मैं जा रहा हूं।” - कहते हुए सौरभ बाहर की तरफ जाने के लिए आगे बढ़ा।

“फ्लाइट बुक हो गई ?”

“मेरी औकात नहीं है फ्लाइट में जाने की।…ट्रेन का टिकट कन्फर्म हो गया है।”

“औकात तो तेरी बहुत है। पर, तेरी बचकानी हरकतें…अब क्या बोलूं मैं।”

“कुछ मत बोलो…बाय!”

“अपने पिता से तो मिलते जाता।”

“मैं वीडियो कॉल कर लूंगा।” - कहने के बाद सौरभ एक पल भी नहीं रुका।

घर में कार और ड्राइवर दोनों ही मौजूद थे। लेकिन, अपनी जिद की वजह से सौरभ ने कैब ही बुक की।

10 मिनट बाद ही वह बुक की हुई कार में बैठकर रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहा था।रास्ते में उसने आदतन मोबाइल निकाला और सोशल मीडिया देखने लगा।

इसी समय इंस्टा पर उसे किसी के msg मिले।

“Hii.. कहां हो तुम ?.. तुमसे मिलना चाहती हूँ। Plz reply”
सौरभ ने msg बड़े ध्यान से पढ़े।

msg भेजने वाले की प्रोफ़ाइल पर संजना का नाम लिखा हुआ था। सौरभ ने DP जूम करके ध्यान से देखी।

यह वही संजना थी, जिससे वह दो बार मिल चुका था।

उसने जल्दी से msg का रिप्लाई किया - “कहां मिलना है ?..reply Fast.”

संजना ऑनलाइन ही थी। जल्दी ही उसने msg किया - “केशव नगर, मकान नंबर 34.

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