उस बारिश के बाद - 20
ईशान हॉस्पिटल से बस अभी घर पहुंचा था। मौसम चाहे कोई भी हो, हॉस्पिटल से घर आते ही सबसे पहले वह शॉवर लेता था और उसके बाद ही कुछ और करता था।
नहाकर तरोताजा हो लेने के बाद वह अभी अपने लिए कॉफी बना ही रहा था कि उसके मोबाइल की रिंग बजी।
मोबाइल की स्क्रीन पर निगाह डालने पर स्क्रीन पर जो नाम उसे दिखाई दिया, उसे देखते ही उसका चेहरा खिल उठा। उसका अंतर्मन खुशी से भर उठा।
जल्दी से उसने कॉल पिक किया।
“Hii” - मोबाइल के दूसरी तरफ से वही परिचित आवाज उसे सुनाई दी।
“हैलो, सौम्या! हाऊ आर यू ?”
“मैं तो एकदम अच्छी हूँ।…तुम कैसे हो ?”
“ मैं भी बढ़िया!”
“क्या कर रहे हो अभी ?”
“कुछ खास नहीं। बस कॉफी बना रहा हूं।”
“मतलब, घर पर ही हो !”
“हां।”
“मेरे लिए भी बनाना!”
“आर यू जोकिंग ?”
“अरे, मजाक नहीं कर रही।…बस अभी आ रही हूं।”
“गुड!.. मैं भी अभी फ्री ही हूँ। आ जाओ मिलकर कॉफी पीते हैं।”
“ओके।” - कहते हुए सौम्या ने कॉल डिस्कनेक्ट की।
इसके बाद जल्दी से तैयार होकर सीढ़ियां उतरते हुए नीचे आई।
नीचे हॉल में सोफे पर सौरभ का बैग तो रखा था। लेकिन संजना और सौरभ वहां से गायब थे।
“पता नहीं ये कहां चले गए!.. पर सौरभ का बैग यहीं रखा हुआ है तो जरूर घर में ही कहीं है…। संजू को बोलकर जाऊंगी तो वो चार सवाल और करेगी, तब फालतू ही मुझे फिर से झूठ बोलना पड़ेगा।” - सोचते हुए सौम्या चुपके से घर से बाहर निकली।
पोर्च में खड़ी अपनी नीली कलर की स्कूटी उसने लोहे के गेट से बाहर निकाली।
कैब ड्राइवर अभी भी बाहर खड़ा सौरभ का वेट कर रहा था।
उस पर एक निगाह डालकर सौम्या ने स्कूटी स्टार्ट की और अगली ही गली में ईशान के घर की तरफ चल पड़ी।
***
ईशान दो कप कॉफी बना चुका था। कॉफी के दोनों कप हाथ में थामे वह किचन से निकलकर बाहर हॉल में आया। अभी कप उसके हाथ में ही थे कि उसे दरवाजे की बेल सुनाई दी।
कप उसने सोफे के सामने रखी मेज़ पर रखे और दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ा।
गेट के खुलते ही उसने अपने सामने सौम्या को खड़े पाया।
सौम्या ने रेड कलर का प्लेन शर्ट और ब्लू जींस पहनी हुई थी।
सौम्या का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर ईशान बहुत खुश हुआ।
सौम्या को अंदर आने का संकेत करते हुए वह खुद सोफे पर जा बैठा।
सौम्या भी उसके सामने ही एक दूसरे सोफे पर बैठी।
दोनों के बीच मेज रखी हुई थी, जिस पर ईशान ने कॉफी के दोनों कप रखे हुए थे।
“कॉफी तैयार है।” - ईशान मुस्कुराते हुए बोला।
सौम्या ने कॉफी पर एक निगाह डाली। कॉफी कप से अभी भाप उठ रही थी। साफ था कि कॉफी बस अभी ही बनाई गई है।
हाथ बढ़ाकर सौम्या ने कप उठाया। ईशान ने भी अपनी कॉफी उठाई।
“तो, कैसे याद आ गई आज ?” - ईशान ने कॉफी का एक बड़ा सा घूंट भरते हुए पूछा।
“याद तो हर रोज आती है। आज बस मिलने आ गई।” - सौम्या ने ईशान की आंखों में देखते हुए कहा।
“गुड।”
“कॉफी बहुत अच्छी बनी है।” - कॉफी सिप करते हुए सौम्या बोली।
“थैंक्स!” - ईशान बोला।
दोनों ने कॉफी लगभग साथ ही खत्म की।
कॉफी का कप मेज पर रखते ही सौम्या उठी और मेज के उस पार बैठे ईशान के पास पहुंची। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी।
ईशान की समझ में अभी कुछ आया भी नहीं था कि अचानक वह ईशान पर झुकी और अपना चेहरा उसके चेहरे के बिल्कुल पास ले गई। उसका एक हाथ ईशान के सिर के पिछले हिस्से पर था और दूसरा उसके कंधे पर। फिर सौम्या ने अपने दहकते होंठ ईशान के काँपते होंठों पर रख दिए। ईशान को उसकी गर्म सांसे महसूस हो रही थी। उस पर नशा सा हावी होने लगा। दोनों के होंठों के बीच एक जंग सी छिड़ गई थी, जो कुछ देर चलती रही।
कुछ देर बाद ईशान ने अपने दोनों हाथों से सौम्या का सिर थामा और उसे जोर से पीछे की तरफ धकेला। वह पीछे मेज पर गिरते - गिरते बची। लेकिन , रुकी नहीं। वह तेजी से ईशान के चेहरे पर झुकी और अपने होंठ फिर से उसने ईशान के होंठों पर रख दिए।
कुछ समय बाद ईशान ने उसे फिर से धकेला। इस बार वह ईशान के करीब ही सोफे पर बैठ गई।
दोनों की सांसे काफी तेज चल रही थी।
जब उनकी सांसों की गति सामान्य हुई तो ईशान बोला - “तुम इसीलिए मुझसे मिलने आई थी ?”
“नहीं!” - सौम्या बोली - “मै तुम्हारे साथ ट्रिप पर जाना चाहती थी।”
“कहां ?”
“जहां तुम ले जाना चाहो।”
“ठीक है। चलो फिर।” - कहते हुए ईशान उठ खड़ा हुआ।
***

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