उस बारिश के बाद - 8
बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी।
सौरभ अपने घर में अपने रूम की ग्लास विंडो से बाहर बारिश की बूंदों को खिड़की पर टप - टप की आवाज के साथ गिरते देख रहा था। मौसम का सर्द अहसास उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
तीन साल पहले इस शहर से उसे नफरत हो चली थी और यही वजह थी कि उसने इस शहर को हमेशा - हमेशा के लिए छोड़ने का निश्चय कर लिया था।
लेकिन अब फिर से उसे इस शहर से प्यार होने लगा था और क्या वजह थी इसकी ?
बस एक लड़की!
हां, महज एक लड़की।
जिस तरह इस शहर से नफरत करने की वजह एक लड़की ही बनी थी, उसी तरह एक दूसरी लड़की की वजह से ही उसे फिर से इस शहर से प्यार होने लगा था।
संजना…हां संजना ही वह लड़की थी, जिसकी वजह से उसे इस शहर की हवा से फिर से प्यार होने लगा था।
आकाश ने सच ही कहा था कि दोबारा शहर में आने के बाद वह जा नहीं सकेगा।
अब वह वाकई वापस जाना नहीं चाहता था।
बारिश को देखना उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
इसी समय उसका मोबाइल बज उठा।
बेड की तरफ बढ़कर उसने मोबाइल की स्क्रीन पर निगाह डाली।
स्क्रीन पर अंकिता का नाम फ्लैश हो रहा था।
नफरत थी उसे इस नाम से।
“क्यों कॉल कर रही है ये ? क्या चाहिए इसको ?” - सौरभ ने सोचा।
उसका कॉल रिसीव करने का बिलकुल भी मन नहीं था। लेकिन पहले ही वह आकाश से अपनी मीटिंग अधूरी छोड़कर आ चुका था और अब अंकिता का कॉल रिसीव न करने से तो उसका वापस इस शहर में आने का उद्देश्य भी पूरा नहीं हो सकता था।
उसने कॉल कट होने से पहले ही रिसीव कर ली।
“हैलो, सौरभ!” - अंकिता की मीठी आवाज उसके कानो में पड़ी।
वह आवाज शहद से भी ज्यादा मधुर थी। एक वक्त था, जब इस आवाज को सुनने के लिए वह घंटों तक अंकिता से मोबाइल पर बात करते रहता था। लेकिन अब तो एक मिनट के लिए भी उसे यह आवाज सहन करना मुश्किल हो रहा था।
“हैलो।” - सौरभ बेमन से बोला।
“क्या हम मिल सकते हैं ?” - अंकिता ने पूछा।
“कहां आना है ?”
“वहीं जहां हम दोनों अक्सर मिला करते थे।”
“शहर के बाहर वाले पहाड़ी एरिया में ?”
“हां।”
“ठीक है। मैं पहुंचता हूँ।” - कहते ही सौरभ ने कॉल कट कर दी।
जिस वजह से आकाश ने उसको कॉल करके इस शहर में फिर से आने के लिए मजबूर किया था, जल्द ही वो वजह सामने होगी - ये सोचकर सौरभ को बहुत सुकून मिल रहा था।
अंकिता उससे मिलना चाहती थी और वह यही जानने आया था कि इतने सालों बाद अंकिता को उसकी याद क्यों आ गई थी ?
क्यों मिलना चाहती थी अंकिता उससे ?
इस सवाल का जवाब जल्दी ही उसे मिलने वाला था।
***
कार ड्राइव करते हुए सौरभ शहर से बाहर पहाड़ी वाले एरिया में पहुंचा।
अंकिता पहले ही वहां पहुंची हुई थी।
वह शायद सौरभ के ही आने का इंतजार कर रही थी।
सौरभ ने कार रोकी और बाहर निकला।
सौरभ को देखते ही अंकिता बोली - “कितने समय बाद देख रही हूँ तुम्हे, अभी भी वैसे के वैसे ही हो। बिल्कुल भी नहीं बदले तुम तो।”
“मैं यहां बेकार की बातें सुनने नहीं आया हूं।” - सौरभ बेरुखी से बोला - “मैं तो सब कुछ भूलने की कोशिश कर रहा था और बहुत कुछ भूल भी चुका था। अपने अतीत को पीछे छोड़कर सुकून भरी जिन्दगी की तरफ बढ़ रहा था। फिर अचानक मुझे यहां आने पर मजबूर क्यों किया ? क्यों मिलना चाहती थी मुझसे ? क्या बात करना चाहती हो ?”
एक ही साँस में सौरभ सब कुछ पूछ बैठा था।
सिम्पल से सलवार सूट में खड़ी अंकिता ने एक ही पल में समझ लिया कि सौरभ उसका सामना करने से अब भी बचना चाहता है। वह जल्द से जल्द वहां से जाना चाहता है।
“तुम तो सच में नहीं बदले सौरभ !” - अंकिता बोली - “तुम इतनी दूर से आए हो इस शहर में सिर्फ ये जानने कि मैं तुमसे क्यों मिलना चाहती हूँ और फिर भी तुम कुछ देर के लिए भी मेरे साथ रुकना बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हो!... तुम यहां किसी और के मजबूर किए नहीं आए हो, बल्कि तुम अपने दिल के हाथों मजबूर होकर आए हो और ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम शायद अब भी मुझसे प्यार करते हो।”
“वो सब अब बीते जमाने की बातें हो चुकी है। मुझे अब तुमसे कुछ लेना - देना नहीं है।” - सौरभ थोड़ा तेज स्वर में बोला।
“अच्छा ! फ़िर क्यों आए हो वापस ?... आकाश के लिए ?”
“मुझे कोई मतलब नहीं है। न तुमसे , न आकाश से !”
“आकाश तुम्हारा बेस्ट फ्रेंड…”
“था।…अब नहीं है।"
“फिर…”
“जानना चाहता हूं कि पूरे तीन साल बाद तुम लोगों को मेरी याद कैसे आ गई ?” - सौरभ आवेशित स्वर में बोला - “जब मैं अपनी तबाह जिन्दगी का बोझ ढोने के लिए अकेला ही इस शहर को छोड़कर जा रहा था। तब तो किसी को मेरी याद नहीं आई। फिर अब…”
“ये तुम्हारी गलतफहमी है सौरभ! हम लोग कभी एक पल के लिए भी तुमको भूले नहीं। हर दिन तुमको याद किया है हमने। लेकिन, हम मजबूर थे और तुम्हें वापस बुलाने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे थे। वो सही समय अब आया है।”
“अच्छा!”
“हां। और सुनो, तुम एक साजिश का शिकार हुए थे, मैं एक साजिश का शिकार हुई थी और आकाश!... आकाश तो यूं ही बेवजह इस खेल का हिस्सा बन गया था।”
“कैसी साजिश ?.. कैसा खेल ?”
“बताती हूँ। वही तो बताने के लिए तुमको यहां बुलाया है मैंने।” - इमोशनल होते हुए अंकिता बोली - “लेकिन इतना समझ लो कि सच जानने के बाद तुमको अफसोस होगा कि तुमने ये शहर छोड़ा ही क्यों था।”
“अच्छा!” - सौरभ व्यंग्य भरे स्वर में बोला है - “ऐसा है तो बताओ सच। मैं भी तो सुनूं कि अंकिता और आकाश की प्यार की कहानी को छिपाने के लिए ऐसी कौनसी नई कहानी गढ़ ली गई, जिसके लिए पूरे तीन साल लग गए !”
“तुम कहना क्या चाहते हो ?” - अंकिता आश्चर्य भरे स्वर में बोली - “मैं जो सच तुमको बताने जा रही हूं, वो कोई मनगढ़ंत कहानी है ?”
“और नहीं तो क्या! लेकिन तुम चिन्ता मत करो। मैं बीच में टोकूंगा नहीं। पूरी कहानी तसल्ली से सुनूंगा और अगर अच्छी लगी तो उसे कोई अवॉर्ड दिलवाने की भी कोशिश करूंगा।”
“तुम मुझे हर्ट कर रहे हो सौरभ ! “ - आंखों में आंसू भरे अंकिता बोली - “इस तरह से तो तुम कभी सच जान ही नहीं पाओगे।.. अब तो मुझे लग रहा है कि तुमसे मिलने की मेरी इच्छा गलत ही थी। तुमको बुलाना ही नहीं चाहिए था। जाओ, चले जाओ वापस और अब कभी लौटकर मत आना। मैं बुलाऊं तब भी नहीं।”
अंकिता अपनी बात चिल्लाकर रोते हुए कह रही थी।
सौरभ को उसके आंसू मगरमच्छ के आंसू लग रहे थे।
इसके बाद अंकिता वहां नहीं रुकी।
सौरभ को अकेले छोड़कर वह अपनी स्कूटी पर सवार हुई और वहां से चली गई।

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