उस बारिश के बाद - 7
“क्या हुआ था ऐसा ?” - संजना ने पूछा।
“आकाश।” - सौरभ बता रहा था। - “आकाश मेरा बेस्ट फ्रेंड था। मेरे और अंकिता के बारे में उसे सब कुछ पता था। उसने जाने ऐसा क्या किया कि अंकिता अचानक ही उससे प्यार कर बैठी। इस बात का जब मुझे पता चला तो नफरत हो गई मुझे दोस्ती और प्यार जैसे लफ्जों से। इसके बाद न मैने किसी से कुछ पूछा, न कुछ कहा। बस, इस शहर को हमेशा - हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया।”
“तो यह त्रिकोणीय प्रेम का मामला है!” - संजना बोली।
“हां। ऐसा कह सकते हैं।” - सौरभ बोला - “लेकिन मैं कभी किसी के बीच में नहीं आया। आकाश आया था मेरे और अंकिता के बीच में। फिर मैं उन दोनों के बीच से हट गया।”
“और ये शहर छोड़ दिया हमेशा - हमेशा के लिए ?”
“हां।”
“एक भगोड़े की तरह ?”
“मैं किसी की परेशानी का कारण नहीं बनना चाहता था।”
“लेकिन इस तरह भागना तो कायरता होती है।”
“अपनों के लिए कायर बनना भी पड़े तो क्या बुरा है !”
“और अब तुम आकाश के बुलाने पर वापस आए हो, क्योंकि अंकिता तुमसे मिलना चाहती है ?”
“हां।”
“तो कब मिलने वाले हो उससे ?”
“पता नहीं। शायद मिलूंगा ही नहीं।”
“फिर इस शहर में वापस आए ही क्यों ?”
“आया तो अंकिता से मिलने ही था। लेकिन अभी थोड़ी देर पहले आकाश से मिला तो मेरा गुस्सा फिर तेज हो गया। अब मेरा कोई मन नहीं है आकाश और अंकिता से मिलने का।”
अब संजना को कुछ - कुछ समझ आ रहा था कि सौरभ के साथ क्या कुछ हो गया।
लेकिन वह यह समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या प्रतिक्रिया दे।
“ये सब छोड़ो।” - अचानक से सौरभ बात बदलने की गरज से बोला - “और बताओ कि तुम कैसी हो ? तुम्हारी लाइफ में क्या चल रहा है ?”
“बस सब कुछ जैसे चलना चाहिए वैसे ही चल रहा है।” - संजना बोली - “घर से निकलते ही मुझे ये बच्चे दिख गए और भूखे भी लग रहे थे तो इन्हें कुछ खिलाने के लिए मैं यहां ले आई। NGO में हूँ ना तो बस यही सब काम है मेरा और पैशन भी।”
“ये तो बहुत अच्छी बात है।”
सौरभ ने उन बच्चों की तरफ देखा। वे बहुत जल्दी - जल्दी खा रहे थे।
उनको खाते देख सौरभ का ध्यान भी अपनी मेज पर एक तरफ रखे मसाला डोसा की प्लेट पर गया।
वेटर काफी देर पहले सर्व करके गया था। अब तो वह ठंडा भी होने लगा था।
उसके हाथों पर अभी भी संजना ने अपने हाथ रखे हुए थे और आंसुओं की वे बूंदें जो उसके और संजना के हाथों पर गिरी थी, सूख भी चुकी थी। बिलकुल उसकी पलकों में ठहरी बूंदों की तरह।
“डोसा पहले ही काफी ठंडा हो चुका है। आई थिंक हमें इसे खा लेना चाहिए।” - सौरभ धीमे स्वर में बोला।
संजना ने हँसते हुए जल्दी से उसके हाथों पर से अपने हाथ हटाए और डोसा की प्लेट मेज की कॉर्नर पर से खींचकर बीच में रखी।
उसने डोसा का एक बाइट तोड़कर दाल और चटनी में डिप किया और सौरभ को अपने हाथ से खिलाने लगी।
“अरे, तुम रहने दो। मैं खुद से खा लूंगा।” - सौरभ ने संकोच भरे स्वर में कहा।
“बस एक ही बाइट खिला रही हूँ। हमारी दोस्ती के नाम!” - कहते हुए संजना ने डोसे का वह बाइट सौरभ के मुंह में रख दिया।
सौरभ ने भी डोसे का बाइट तोड़कर संजना को खिलाने के लिए उसके मुंह की तरफ बढ़ाया।
जब वह संजना को वह बाइट खिला रहा था तो उसकी अंगुलियां संजना के होठों को छू गई। इससे सौरभ को बहुत अजीब लगा। उसने जल्दी से अपना हाथ खींच लिया।
संजना सौरभ के मनोभाव समझकर फिर से हँस पड़ी। जबकि सौरभ की अंगुलियों पर संजना के होठों की छुअन से अभी तक सिहरन हो रही थी।

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