मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 50
" कातिल पवन माथुर ही है। " - साकेत बोला - " अपनी इन्वेस्टिगेशन की शुरूआत से ही मुझे शक था कि आकाश ने ही रिचा का कत्ल किया होगा और यह शक उस समय और भी अधिक मजबूत हो गया , जब मुझे ये पता चला कि कत्ल से सम्बंध रखने वाली कार और वह प्लॉट , जहाँ कार दफनाई गई थी - ये दोनों ही आकाश के थे , तब मेरा शक यकीन में बदल गया। लेकिन , जब कार में A अक्षर वाली रिंग मिली , तो मुझे लगा कि यह रिंग मैंने पहले भी कहीं देखी हुई है और मुझे अच्छी तरह से पता था कि मैंने इस तरह की कोई रिंग आकाश के हाथ मे नहीं देखी थी।...दिमाग पर बहुत जोर देने के बाद मुझे याद आया कि इस तरह की रिंग मैंने उस फोटो में देखी थी , जो आकाश के घर के बैठक कक्ष में लगी हुई है और वह फ़ोटो थी , पवन माथुर की। और पवन माथुर को जब मैंने रिचा के कातिल के रूप में देखना शुरू किया , तो मुझे यकीन हो गया कि यही वो शख्स है , जिसे रिचा के कत्ल से फायदा हो सकता था।...अपने बेटे से जरूरत से ज्यादा प्यार करना , रिचा से नफरत करने की वजह सामने आना - सब कुछ क्लियर हो गया।...बताईये , माथुरजी ! यही दो कारण थे ना , रिचा का कत्ल करने के पीछे ? "
" हाँ। " - पवन माथुर बोले - " रिचा को वैसे तो मैं शुरू से ही पसंद नहीं करता था। लेकिन , अपने बेटे की खुशी के लिए मैं चुप था। लेकिन , कॉलेज में हुई रिंग चोरी की घटना के बाद रिचा ने आकाश के साथ जो किया , उसने आकाश की लाइफ तबाह करके रख दी। मेरे मासूम से बेटे ने रोज बार मे जाकर ड्रिंक करना शुरू कर दिया था।...मैं देख रहा था कि रिचा की वजह से ही मेरे बेटे की ऐसी हालत हुई थी। ऐसी लड़की अगर मेरे घर की बहू बनकर आ गई तो आकाश की जिंदगी तो खत्म ही हो जाएगी। अपने बेटे के प्रति प्रेम और रिचा के प्रति नफरत की वजह से मेरे लिए रिचा का कत्ल करना जरूरी हो गया था। "
" और इसीलिये आपने रिचा को मार डाला ? "
" हाँ। "
" कत्ल की योजना कैसे बनायी आपने ? "
" योजना बनाने में मैंने बहुत समय लिया था। मेरी कोशिश थी कि साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।...योजना बन जाने के बाद भी मैंने सही समय का इंतजार किया। कुछ ही दिनों बाद मुझे पता चला कि आर्ट्स कॉलेज की दो लड़कियां एकाएक ही लापता हो गई। मेरे लिए यह सही समय था , क्योंकि जहाँ दो लड़कियां गायब हुई है , वहीं एक और गायब हो जाएगी तो मुझ पर किसी को शक नहीं होगा और मेरी किस्मत अच्छी थी कि 14 फरवरी को आकाश ने खुद ही मुझे बताया कि वह रिचा के साथ डिनर पर जा रहा है।...इससे बढ़िया अवसर और कोई हो ही नहीं सकता था। आकाश कार बहुत कम चलाता था। उस शाम वह बाइक से रिचा के साथ डिनर पर गया और मैं आकाश की कार से उसके पीछे लगा रहा। आकाश ने डिनर के बाद रिचा को उसकी कॉलोनी के बाहर यूनिवर्सिटी रोड पर ड्रॉप किया। आकाश के जाने के बाद मैंने जल्दी से रिचा को कॉल किया।
" हेलो ! " - कॉल रिसीव करते हुए रिचा बोली।
" पवन माथुर बोल रहा हूँ। " - मैं दमदार आवाज में बोला।
" जी , अंकल ! बोलिये। "
" तुमसे एक जरूरी बात करनी थी। यूनिवर्सिटी रोड पर हूँ इस वक़्त। "
" मैं अभी आती हूँ। "
कुछ ही देर बाद वह मेरे सामने थी।
" क्या बात है अंकल ! इतनी रात को आप यहाँ सब ठीक तो है ना ? "
" ठीक तुम रहने दो तब ना ! " - गुस्से भरे स्वर में मैं बोला।
" क्या मतलब ? "
रिचा के सवाल का जवाब देने के बजाय मैंने कार में रखा एक धारदार चाकू निकाला।
अपने हाथों में मैंने पहले से ही ग्लव्ज पहने हुए थे।
इससे पहले कि रिचा कुछ समझ पाती , मैंने चाकू से 4 - 5 वार उसके पेट पर किये और तब तक वहाँ रुका रहा , जब तक कि उसकी आत्मा उसके शरीर से बाहर नहीं निकल गई।
उसका अंत होते ही मैंने उसका हैंडबैग लिया और मैं वहाँ से निकल गया।
सबसे पहले मैं आयड़ पुलिया की ओर गया और वह चाकू और उसके हैंडबैग से एक - एक चीज निकालकर
मैंने पुलिया के नीचे बहते गंदे पानी मे फेंक दिया। उसके मोबाइल को एक पत्थर से तोड़ा और सिम कार्ड को भी उसी पत्थर से तोड़कर मैंने नाले में फेंक दिया।
इसके बाद मैं दोबारा यूनिवर्सिटी रोड की तरफ आया और एक दूसरे रास्ते से होते हुए ठोकर चौराहा की ओर गया। लेकिन , रास्ते में ही एक तिराहे पर मैंने आकाश को देखा। पता नहीं क्यों , लेकिन मुझे लगा कि रिचा अभी भी जिंदा होगी और आकाश वहीं जा रहा होगा। वह आकाश को बता देगी कि मैंने ही उसे मारने की कोशिश की थी।
" नहीं , यह नही होना चाहिए। " - सोचते हुए मैंने तय किया कि किसी भी हाल में आकाश रिचा तक पहुंचना नहीं चाहिये।
मैंने आकाश की बाइक को कार से टक्कर मारी और तेज गति के साथ वहाँ से प्रतापनगर की ओर कार दौड़ा दी।
मैं जल्द ही उस प्लॉट पर पहुंचा , जिसे मैंने आकाश के नाम से खरीद रखा था। वहाँ पर मैंने नींव खुदा रखी थी। कार को वहीं नींव वाले गड्ढ़े में उतारकर मैंने गढ्ढा मिट्टी से भर दिया। लेकिन , एक गलती हो गई मुझसे कार से बाहर निकलते वक्त जल्दबाजी में मेरे हाथ से रिंग फिसल गई। पर , मैं इतनी हड़बड़ी में था कि इस बात का मुझे पता ही नहीं चला।…उसी प्लॉट पर मैंने योजना के मुताबिक अपनी एक कार पहले से रखी हुई थी , जिसकी मदद से मैं जल्द ही घर पहुंचा। "
" तो , अब सब कुछ क्लियर हो चुका है। " - साकेत बोला - " सिर्फ एक बात को छोड़कर। "
" कौनसी बात ? " - पलक ने पूछा।
" रागिनी और आकाश रेस्टोरेंट में क्यों मिले थे ? " - रागिनी की ओर देखते हुए साकेत ने पूछा।
" आकाश बहुत दुखी था। " - रागिनी ने बताया - " यह एक डरपोक किस्म का इंसान हैं। आकाश नहीं चाहता था कि आपको उस पर रिचा के संबंध में किसी तरह की कोई गलतफहमी हो। इसीलिए हमने मिलने के लिए ऐसी जगह चुनी , जिसके बारे में किसी को भी पता न हो। "
" और हुआ बिल्कुल इसके विपरीत। मेरा संदेह हमेशा आकाश पर ही रहा और तुम लोगों के छिपकर मिलने की वजह से तो तुम भी शक के दायरे में आ गई थी। "
" क्या ? मैं ? " - रागिनी चौकी - " मैं क्यों ? "
" तुमने कभी बताया नहीं कि रिचा तुम्हारी सगी बहन नहीं थी। "
" मैंने जरूरी नहीं समझा और बता भी देती , तो होता क्या… आप मुझे अपनी ही बहन का कातिल समझने लगते। "
" ये तो सही है। " - कहते हुए साकेत ने एक कॉल किया - " इंस्पेक्टर मुखर्जी ! रिचा के कातिल की पहचान हो चुकी है। उचित होगा यदि आप मेरे घर आ जाये। "
कुछ ही देर बाद 3 - 4 पुलिस कर्मियों के साथ इंस्पेक्टर मुखर्जी वहाँ आये।
साकेत ने उन्हें सारी कहानी बताई।
पवन माथुर , अभय और सलोनी को अरेस्ट किया गया।
रागिनी ने साकेत को तय रकम देनी चाही।
लेकिन , साकेत ने महज 50,000 रुपये ही लिये।
" लेकिन , आपने तो 5 लाख रुपये की डील की थी ना ? " - चौंकते हुए रागिनी बोली।
" अपनी अहमियत बरकरार रखने के लिए। " - साकेत ने मुस्कराते हुए कहा - " जासूसी मेरा पेशन है , बिज़नेस नहीं। "
- समाप्त

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