उस बारिश के बाद - 1

उस बारिश के बाद - 1

आकाश बादलों से घिरा हुआ था। काले घने बादल गरज रहे थे। रह - रहकर बिजलियां भी चमक रही थी। 


कुछ ही देर बाद बारिश शुरू हो गई। बारिश की बड़ी - बड़ी बूंदें रेलवे स्टेशन की टीन की छत से टकराकर बहुत तेज शोर कर रही थी। बारिश से बचने के लिए खुले में खड़े लोग टीन शेड की तरफ भागने लगे। 


सौरभ तो पहले से ही टीन शेड के नीचे ही खड़ा था। वह टीन शेड के नीचे नहीं भी खड़ा होता तो भी शायद बारिश से बचने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि वह उदास था, थका हुआ था और अंदर से टूटा हुआ भी।


आज वह उस शहर वापस लौट रहा था, जहां से तीन साल पहले सबकुछ छोड़कर आ गया था। अपने सपने को, अपने रिश्ते को और अपने विश्वास को - सबको छोड़कर आ गया था।


लेकिन आज फिर उसे उसी शहर में वापस लौटना था। ऐसा वह अपनी खुशी से नहीं कर रहा था। उस शहर में वापस लौटना तो बस उसकी मजबूरी थी। उसके शहर ने उसे फिर से याद किया था और इसीलिए उसे वापस जाना पड़ रहा था। 


फिर से वही जख्म, वही लोग, वही अतीत उसके सामने होंगे - ऐसा सोचकर ही उसकी रूह काँप उठी।


वह बार - बार बेचैनी से अपनी कलाई घड़ी में समय देख रहा था। ट्रेन काफी लेट थी। हर थोड़ी देर में अनाउंस हो रहा था कि ट्रेन 15 मिनट लेट है…ट्रेन 10 मिनट लेट है।


ऊबकर सौरभ चहलकदमी करने लगा।


यही वो समय था, जब उसकी नजर बारिश में भीगती और बारिश से बचने के लिए टीन शेड की तरफ भागकर आती एक लड़की पर पड़ी। 


उसने ग्रीन कलर का सूट पहना हुआ था और हल्के नीले रंग का दुपट्टा धारण कर रखा था। उसके चेहरे पर बारिश की बूंदे ठहरी हुई थी। 


वह वहीं सौरभ के पास ही आकर खड़ी हो गई।


इसी समय हवा का एक झोंका आया और लड़की का दुपट्टा हवा में लहराया और सौरभ के कंधे को छू गया।


सौरभ को थोड़ा अजीब लगा।


“सॉरी!” - लड़की ने जल्दी से कहा।


सौरभ कुछ बोला नहीं। बस मुस्कुरा दिया।

जवाब में लड़की भी हल्के से मुस्कुराई।


“आप को कौनसी ट्रेन पकड़नी है ?” - लड़की ने बस यूं ही पूछ लिया।


“जयपुर की।” - सौरभ ने जवाब दिया।


“ग्रेट! मैं भी वहीं जा रही हूं।” - खुश होते हुए लड़की बोली।


“अच्छा!”


“वैसे मैं संजना हूँ।” - लड़की सौरभ की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोली।


सौरभ ने भी हाथ आगे बढ़ाकर लड़की से हाथ मिलाया और बोला - “मेरा नाम सौरभ है।”


इसके बाद वे फिर से खामोश हो गए।


कुछ देर बाद ट्रेन आ गई।


दौड़ते हुए लोग ट्रेन में चढ़ने लगे।


सौरभ और संजना भी ट्रेन में चढ़े।


भीड़ काफी थी। लेकिन, किसी तरह उनको विंडो सीट मिल गई। 


बारिश की बूंदे ग्लास विंडो से टकराकर दम तोड़ रही थी।


“वैसे तुम जयपुर क्यों जा रही हो ?” - सौरभ ने पूछा।


“क्योंकि मैं वहीं रहती हूं। मेरा घर वहीं पर है।”


“ओह!”


“और तुम ?” - संजना ने पूछा।


“क्या ?”


“तुम क्यों जा रहे हो वहां ?”


“पता नहीं।”


“क्या!”


“तीन साल पहले मैं उस शहर को छोड़ चुका था। लेकिन अब जबकि शहर ने मुझे याद किया है तो मैं वापस जा रहा हूं।” - सौरभ बोला - “ वैसे, तुम करती क्या हो ?”


“कुछ खास नहीं। बस एक NGO में काम करती हूँ। लोगों की कहानियां सुनती हूँ और अपनी भूलने की कोशिश करती हूँ।” - संजना मुस्कुराते हुए बोली।


सौरभ को लगा, जैसे किसी ने उसके दिल की बात कह दी हो।


“और तुम क्या करते हो ?” - संजना ने पूछा।


“मैं पहले इस शहर में बहुत कुछ छोड़ गया था। अब शायद कुछ ढूँढने लौटा हूँ।” - सौरभ ने जवाब दिया।


संजना ने उसकी तरफ देखा।


“कभी-कभी जो हम ढूँढते हैं, वो नहीं मिलता और जो नहीं ढूँढते, वही ज़िंदगी बदल देता है।”


इसके बाद दोनों खामोशी से ग्लास विंडो की तरफ देखते रहे।


बारिश अभी भी हो रही थी।


बारिश की बूंदे पहले की ही तरफ खिड़की से भीतर आने के असफल प्रयास में कांच से टकराकर दम तोड़ रही थी।


ट्रेन धीमी हुई। संजना का स्टेशन आ गया था।


“मुझे उतरना है।” - उसने हल्की झिझक के साथ कहा।


सौरभ के दिल में अजीब-सी खालीपन की लहर दौड़ गई।


संजना सीट से उठी, अपना बैग संभाला और दरवाजे की तरफ बढ़ी।


दरवाज़े पर खड़े होकर संजना अचानक पलटी।


“क्या हम फिर कभी मिलेंगे ?”


सौरभ ने बिना कुछ सोचे कहा - “ज़रूर।”


ट्रेन चल पड़ी। संजना भीड़ में खो गई। 


सौरभ खिड़की से बाहर देखता रहा। 


कुछ समय बाद सौरभ का स्टेशन भी आ गया।


उसे अब एक बार फिर अतीत का सामना करना ही था।


उसी समय शहर के एक आलीशान घर में एक आदमी फोन पर किसी से कह रहा था - “सौरभ वापस आ गया है। अब खेल शुरू होगा।”


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