उस बारिश के बाद - 5
कार पार्क करके सौरभ रेस्टोरेंट में दाखिल हुआ।
उसने अपने पसंदीदा ब्रेकफास्ट का ऑर्डर दिया ही था कि अचानक रेस्टोरेंट के एक कर्मचारी के जोर से किसी को डांटने का स्वर उसके कानो में पड़ा।
आवाज की दिशा में नजरें उठाकर उसने देखा तो पाया कि 8 - 10 साल के चार छोटे - छोटे बच्चे रेस्टोरेंट में दाखिल हो गए थे।
वे फटेहाल थे।
वे देखने से ही रैगपिकर लग रहे थे।
“ए! भागो यहां से!” - कर्मचारी जोर से बोला।
सौरभ कुछ सोच या ठीक से समझ पाता, उससे पहले ही उन बच्चों के पीछे - पीछे ही रेस्टोरेंट में दाखिल हुई एक लड़की उसे दिखाई दी।
वह सीधे ही कर्मचारी से मुखातिब हुई - “ये बच्चे मेरे साथ है। जो भी ये खाएंगे, उसका बिल मै पे करूंगी।”
रेड टी शर्ट और ब्लू जींस पहने आकर्षक सी दिखने वाली उस लड़की को देखते ही वह कर्मचारी अपनी आवाज में मिश्री सी मिठास घोलते हुए बोला - “वेलकम मेम!”
सौरभ ने जब उस लड़की को ध्यान से देखा तो देखता ही रह गया।
उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस लड़की को इस समय वह देख रहा है, वह सच में वहां है।
एक पल के लिए तो उसे ऐसा लगा जैसे कि वह कोई सपना देख रहा हो।
“यह कैसे हो सकता है! ये यहां कैसे ?... मुझे तो लगा था कि मैं इसे लाइफ में दोबारा कभी देख नहीं पाऊंगा।”
सौरभ अभी यही सब सोच रहा था कि उस लड़की की निगाह सौरभ से मिली।
उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान उभरी और खुश होते हुए वह सौरभ की तरफ बढ़ी।
उसके साथ के चारों बच्चे खाली मेज पर जा बैठे और वेटर को बताने लगे कि वे क्या खाना चाहते हैं।
“तो हम दोबारा मिल रहे हैं।” - वह लड़की सौरभ के सामने एक चेयर पर बैठते हुए बोली।
“संजना!” - सौरभ खुशी भरे स्वर में बोला - “मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि हम इतनी जल्दी दोबारा मिल रहे हैं।”
“तुमको तो यकीन होना चाहिए। तुमने ही तो कहा था कि हम दोबारा जरूर मिलेंगे।”
“हां। लेकिन इतना जल्दी मिलेंगे, ये मैने सोचा नहीं था।”
“कहीं तुम मेरा पीछा तो नहीं कर रहे थे !” - संजना शरारत भरे अंदाज में बोली।
“नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।” - सौरभ जल्दी से बोला - “और वैसे भी बात अगर पीछा करने की है भी, तो वो तुम हो जो मेरा पीछा कर रही हो।”
“अच्छा! मैं भला ऐसा क्यों करने लगी ?”
“मैं यहां पहले आया था और मेरे बाद तुम आई हो। तो ऐसा सोचा जा सकता है कि तुम यहां पर मेरा पीछा करते हुए आई हो।”
संजना जोर से हंसते हुए बोली - “हां, सोच तो सकते हैं ऐसा। लेकिन यह सच तो नहीं है। मुझे तो बस ये बच्चे सड़क पर दिख गए थे और देखने से ही भूखे लग रहे थे तो मैं इन्हें कुछ खिलाने के लिए यहां ले आई।”
“मतलब, हमारी ये मुलाकात भी पिछली मुलाकात की तरह महज एक संयोग है।”
“हां, लगता तो ऐसा ही कुछ है।” - संजना बोली - “वैसे, तुम यहां कैसे ?”
“घर से कुछ खाकर नहीं निकला था तो बस ब्रेकफास्ट के लिए यहां आ गया।”
“अकेले ही!”
“हां।”
“तुमको अकेले ब्रेकफास्ट करना अच्छा लगता है ?”
“लगता तो नहीं, पर…”
“नहीं लगता ना, तो बस अब आगे कुछ बोलने की जरूरत नहीं है। मैं भी तुम्हारे साथ ब्रेकफास्ट करूंगी, ताकि तुमको कंपनी मिल सके।”
“दैटस ग्रेट!” - कहते हुए सौरभ ने मसाला डोसा ऑर्डर किया।
“और बताओ, कैसा लग रहा है पूरे तीन साल बाद इस शहर में वापस आकर ?” - संजना ने पूछा।
“अच्छा तो लग रहा है। पर, समझ नहीं आ रहा कि कुछ घंटे पहले ही जिस लड़की से मैं मिला था, उससे संयोग से फिर से मिलना कैसे हो रहा है !”
“अच्छा!” - संजना बोली - “ये बात तो मुझे भी नहीं समझ आई। ऐसे संयोग जब होते हैं तो ऐसे लगता है जैसे कि किस्मत हमें एक दूसरे से मिलाना चाहती है।”

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