उस बारिश के बाद - 4

 उस बारिश के बाद - 4

सौरभ पुरोहित कैफे से निकलकर अपनी कार में बैठा और ड्राइव करते हुए घर की तरफ बढ़ने लगा।

वह समझ नहीं पा रहा था कि केवल आकाश के कहने पर वह इस शहर में वापस क्यों आ गया था।

हां, यह सच था कि आकाश कभी उसका बेस्ट फ्रेंड हुआ करता था।

लेकिन, वह तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली थी।

अब उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था न आकाश से, न अंकिता से।

तीन साल बाद जब अचानक आकाश का कॉल आया तो उसका तो मन भी नहीं था कॉल पिक अप करने का।

मोबाइल की रिंग बजती रही…बजती रही।

दो बार कॉल करने के बाद आकाश शांत बैठ गया।

लेकिन, उसका मन अब अशांत हो चुका था।

वह चाहे जितनी भी नफरत करता हो आकाश से, पर उसका कॉल आते ही वह बेचैन सा हो उठा था।

आकाश शब्द सुनते ही उसके मस्तिष्क में आकाश की छवि उभर आतीं थी और वह अकेली कहां आती थी!

वह तो अपने साथ - साथ अंकिता को भी तो लेकर आती थी।

आकाश और अंकिता - ये वे दो शब्द थे, जिनके कानों में पड़ते ही उसके दिल में भावनाओं का सैलाब उमड़ आता था।

और ये भावनाएं होती थी - नफरत की, जलन की और शायद बदले की भी!

लेकिन, क्या वह कुछ कर सकता था ?... नहीं, वह कुछ नहीं कर सकता था।…कुछ भी नहीं।

हां, उसे नफरत थी, कभी - कभी जलन भी होती थी।

लेकिन, बदला!.. प्रतिशोध या बदले की भावना उसके दिल में ही दबकर रह जाती थी।

सोच भी कैसे सकता था वह, कभी बेस्ट फ्रेंड रहे आकाश से या कभी गर्लफ्रेंड रह चुकी अंकिता से प्रतिशोध लेने की बात!...

नहीं नहीं वह कभी इस तरह की बात सोच तक नहीं सकता।

यही वजह थी कि उसकी हालत 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' जैसी हो चुकी थी और इसी वजह से उसने अपने शहर को हमेशा - हमेशा के लिए छोड़ देने का निश्चय कर लिया था।

इसी इरादे के साथ वह तीन साल पहले यहां इतनी दूर जबलपुर शहर में आ गया था।

एक IT कम्पनी ज्वॉइन करके एक किराए के फ्लैट मे उसने अपना मुकाम बना लिया था।

सब कुछ ठीक ठाक चलने लगा था।

उसकी बिखर चुकी जिन्दगी धीरे - धीरे पटरी पर आने लगी थी।…वक्त जरूर लगा था। लेकिन, खुद को उसने संभाल लिया था।

पर, आज अचानक आकाश के कॉल ने उसे फिर से बेचैन कर दिया था।

मोबाइल पर दो बार पूरी - पूरी रिंग आने के बाद अब वह शांत पड़ा था और उसे एकटक देखते हुए उसके मन में विचारों का बवंडर चल रहा था।

कुछ देर वह मोबाइल के फिर से बजने का इंतजार करता रहा।

लेकिन जब दस मिनट तक भी वह नहीं बजा तो उसने मोबाइल उठाया और खुद ही आकाश को कॉल किया।

एक ही रिंग में कॉल रिसीव हुई।

“हैलो, सौरभ!” - मोबाइल के दूसरी तरफ से आकाश की आवाज सुनाई दी।

“बोलो।” - उसने बड़ी बेरुखी से कहा था।

“कैसे हो तुम ?”

“मेरे पास तुम्हारे फालतू सवालों का कोई जवाब नहीं है।” - उसकी बेरुखी बरकरार थी - “क्यों कॉल किया तुमने ?”

“अंकिता तुमसे मिलना चाहती है।”

बस इतना ही सुना उसने और पता नहीं, प्यार का असर था या अपनी भड़ास निकालने का जुनून…बिना कुछ आगे सुने, बिना कुछ सोचे बोल दिया उसने - “आ रहा हूं।”

इसके बाद आकाश को कुछ भी बोलने का मौका दिए बिना ही उसने कॉल कट की और जयपुर जाने की तैयारी करने लगा।

और अब तो वह आकाश से मिल भी चुका था।

उसके पास पूरा मौका था आकाश पर अपनी भड़ास निकालने का।

लेकिन, पता नहीं क्यों, वह ऐसा कर नहीं पाया।

उसको तो जिस वजह से आकाश ने बुलाया था, उस वजह का पता होने के बाद भी वह पूछ बैठा था कि उसे क्यों बुलाया गया है और जब आकाश ने अंकिता की उससे मिलने की इच्छा जाहिर की, तब भी उसका उससे मिलने का मन नहीं हुआ।

वह बस यूं ही बिना अंकिता से मिले चला आया।

उसे तो पहले से पता था कि इस शहर में उसे अंकिता से मिलने आना था, क्योंकि वह मिलना चाहती थी।

क्यों मिलना चाहती थी ?

इस सवाल का जवाब उसके पास अभी नहीं था।

हो सकता था, लेकिन इस 'होने' के लिए उसे अंकिता से मिलना ही था।

“क्यों मिलना चाहती है अंकिता मुझसे ?” - सौरभ ने सोचा - “और वो भी अब! पूरे तीन साल बाद! उसने खुद मुझसे कॉन्टैक्ट क्यों नहीं किया ? आकाश को बिचौलिया बनाने की क्या जरूरत थी ? वह उसका BF है ना, उसकी परमिशन तो उसे लेनी ही पड़ेगी।”

ड्राइव करते हुए सौरभ एक रेस्टोरेंट तक जा पहुंचा।

सुबह से उसने कुछ खाया नहीं था।

उसे तेज भूख लग आई थी।


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