मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 47
" मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। " - पलक इमोशनल होते हुए बोली - " आकाश ! हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। "
" तुम माफी क्यों मांग रही हो ? " - आकाश बोला - " तुमने तो मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं किया और मैं तो खुद तुम पर शक कर रहा था। मुझे लगा था कि वह रिंग तुमने ही मेरे बैग में रख दी होगी। "
" तुम्हें ऐसा लगा था ? " - पलक ने चकित होते हुए पूछा।
" हाँ। मुझे गलतफहमी हुई थी। "
" हाँ और मुझे भी। "
" लेकिन , अब सब क्लियर हो चुका है। " - साकेत बोला - " रिंग चोर सामने है , सलोनी के लापता होने और काव्या के कत्ल की गुत्थी भी सुलझ चुकी है। "
" रिचा का कातिल कौन है ? " - काफी देर से चुप बैठी रागिनी एकाएक पूछ बैठी।
" बस वही बताने जा रहा हूँ। " - साकेत बोला - " रिचा का कत्ल किसने , कैसे और क्यों किया , इस रहस्य का खुलासा जल्द ही होने जा रहा है। "
सभी सतर्क होकर सुनने लगे।
साकेत ने बताना शुरू किया - " रिचा के कातिल को ढूँढना आसान काम नहीं था। क्योंकि यह एक ऐसा कत्ल था , जिसका हमारे पास न कोई सुराग था , न सबूत और न ही गवाह। लेकिन , वो कहते है ना कि ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं। बस इसीलिए हमने हार नहीं मानी और अपनी कोशिशें जारी रखी।...हमने मतलब , मैंने और मेरे तीन सहयोगियों अनिकेत , अर्जुन और विशेष ने अपने - अपने स्तर पर काम जारी रखा। शुरू - शुरू में हमारे पास कोई सुराग ना होने से इस केस में आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था। लेकिन , मुझे पूरा भरोसा था कि अँधेरे में तीर मारने से भी कुछ तो हासिल होगा ही। और जल्द ही हमें सुराग मिल गया। वह कार , जिससे आकाश का एक्सीडेंट हुआ था। यह उस रात की बात है , जब रिचा घर नहीं लौटी थी और इस वजह से रागिनी काफी परेशान थी। उसने आकाश को कॉल करके अपने घर बुलाया था , लेकिन आकाश पहुंच नहीं पाया , क्योंकि एक कार से उसका एक्सीडेंट हो गया था।...आकाश उस कार का नम्बर तो नहीं देख पाया , लेकिन वह कार लाल रंग की थी और एक्सीडेंट के बाद वह ठोकर चौराहा की ओर गई थी।...इतनी इन्फॉर्मेशन पर्याप्त थी। उसी शाम मैंने अनिकेत से कार के बारे में पता करने को कहा। अनिकेत ने ठोकर चौराहा पर स्थित एक पान की दुकान चलाने वाले अशोक सिंह नाम के व्यक्ति से उस लाल कार के सम्बंध में पूछताछ की , जो दो दिन पहले रात को 12.30 बजे के बाद ठोकर चौराहा की ओर आई थी और किसी अज्ञात दिशा की ओर चली गई। अशोक सिंह को मात्र इतना ही बताना था कि वह कार किस दिशा में गई हो सकती है और इतनी सी इन्फॉर्मेशन के लिए अनिकेत ने उसके सामने 10,000 रुपये की पेशकश रखी।….अशोक सिंह का कहना था कि वहाँ से रोज कई कारे गुजरती है , अब दो दिन पहले कोई लाल रंग की कार उधर से गुजरी थी , यह बताना बड़ा मुश्किल काम है। लेकिन , 10,000 रुपये हासिल करने का लालच यूं ही तो नहीं छोड़ा जा सकता ! निश्चित रूप से इसीलिये उसने कहा कि उसे महज 24 घंटे का वक़्त दिया जाए , तो वह पता लगा सकता है कि इस तरह की कोई कार 14 फरवरी की रात 12.30 से 1.00 बजे के बीच उस तरफ से गुजरी थी या नहीं और अगर गुजरी थी , तो किस दिशा में गई।
अनिकेत ने उसे 24 घंटे का समय दिया।
17 फरवरी की शाम वह अशोक सिंह से दोबारा मिला और अशोक सिंह ने उस वक़्त तक अपना काम पूरा कर दिया था। उसने न केवल ये पता लगाया कि वह कार किस दिशा में गई , बल्कि यह भी पता लगा लिया था कि उस वक़्त वह कार कहाँ हो सकती है !
अशोक सिंह की बातें भरोसे लायक लग तो नहीं रही थी , लेकिन अनिकेत के पास दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं था।
अशोक सिंह ने उसी समय एक कॉल किया।
कुछ ही समय बाद वहाँ एक मजबूत कद काठी वाला आदमी आया।
" यह कीरतसिंह है। " - अशोक सिंह ने अनिकेत से उसका परिचय कराते हुए कहा - " यह ट्रक ड्राइवर है और 14 तारीख की रात 12.30 बजे के आस - पास इसने लाल रंग की एक कार बड़े अजीब हालात में देखी। इसीलिए ऐसा होना मुमकिन है कि वह कार वो ही हो , जिसकी आपको तलाश है। "
अनिकेत के पूछने पर कीरतसिंह ने बताना शुरू किया - " उस रात मेरा ट्रक प्रतापनगर से गुजर रहा था। रोड के किनारे खाली पड़े एक प्लॉट पर लाल रंग की एक कार खड़ी थी। पास ही एक बड़ा सा गड्ढा खुदा हुआ था। बस मैंने इतना ही देखा। "
अनिकेत ने कीरतसिंह की बताई जगह नोट की और अशोकसिंह को 10,000 रुपये देकर वहाँ से रुखसत हुआ।
अगली सुबह हम लोग उस जगह पहुँचे , जहाँ कीरतसिंह ने लाल रंग की एक कार और एक बड़ा सा गड्ढा खुदा हुआ देखा था।
लेकिन , वहाँ पर हम लोगों को न तो कोई कार दिखाई दी और न ही कोई गड्ढा !
" यही जगह बताई थी , उस कीरतसिंह ने ? " - मैंने अनिकेत से पूछा।
" हाँ , जगह तो यही बताई थी। "
आस पास पूछताछ करने पर पता चला कि इस प्लॉट पर जल्द ही एक मकान खड़ा होने वाला है। प्लॉट के मालिक ने नींव भी खुदवाई थी। लेकिन , वह नींव फिर से भर दी गई। प्लॉट के मालिक के द्वारा नींव खुदवाते हुए तो कइयों ने देखा , लेकिन नींव भरते हुए किसी ने नहीं देखा।
तत्काल ही हमने कुछ मजदूरों को बुलाकर दोबारा उसी स्थान की खुदाई करवाई।
खुदाई में जमीन के नीचे से एक कार निकली।
लाल रंग की कार !
कार को हमने तत्काल ही एक ट्रक में लदवा कर मेरे घर के गैराज में पहुंचाया।
कार के नम्बर से पता चला कि वह कार आकाश की थी।
कार के भीतर से एक सिल्वर रिंग बरामद हुई , जिस पर अंग्रेजी का ' A ' अक्षर खुदा हुआ था।
कार की डिक्की से बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी , चाभी ना होने की वजह से कार की डिक्की तोड़नी पड़ी।
भीतर से काव्या की लाश बरामद हुई।
साफ था कि रिचा और काव्या का कातिल आकाश ही हो सकता है।
लेकिन , काव्या का कत्ल किन परिस्थितियों में हुआ , यह आज हमें पता चल ही चुका है। इसका अर्थ यह हुआ कि काव्या का कत्ल आकाश ने नहीं किया था और मेरा आकाश पर काव्या के कत्ल का संदेह गलत था।
लेकिन , रिचा !...रिचा का कत्ल जरूर आकाश ने ही किया होगा। पर , यह तथ्य भी संदेह जनक है , क्योंकि जिस कार से आकाश का एक्सीडेंट हुआ , उसी कार की मदद से उसने रिचा का कत्ल किया हो , यह कैसे मुमकिन है ?...बहरहाल , कार को जिस खाली प्लॉट पर जमीन के नीचे दबाया गया था , उस प्लॉट का मालिक आकाश ही है। "
" इसका मतलब , आकाश ने ही रिचा का कत्ल किया है ! " - आश्चर्यजनक रूप से चौंकते हुए रागिनी चीखी।
" अब इसका जवाब तो आकाश ही दे सकता है। " - कहते हुए साकेत ने आकाश की ओर देखा।
आकाश ने अपनी नजरें झुका ली।
" हाँ , मैंने ही रिचा का कत्ल किया था। " - आकाश ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा।
हर कोई आकाश को आश्चर्य से देखने लगे।
किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि आकाश जैसा मासूम इंसान किसी की और किसी की क्या अपनी खुद की प्रेमिका की जान ले सकता है !
लेकिन , आकाश खुद अपना गुनाह कबूल कर चुका था।

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