मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 44

 मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 44

लाश हमने कार की डिक्की में रखी।
अभय ने काव्या का बैग चैक किया।
उसमें कुछ किताबें , रुपये और काव्या का मोबाइल रखा था।
अभय ने रुपये मेरी तरफ बढ़ाये।
मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
" रख लो , लालच की देवी ! " - बोलते हुए अभय के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था।
उसने मोबाईल को वहीं रखे एक पत्थर से तोड़ा और सिम कार्ड को भी तोड़कर बिल्कुल नष्ट कर दिया।
अभय ने कबाड़ हो चुका मोबाइल दोबारा बैग में डाला और बैग को भी डिक्की में रख दिया।
आयड़ की छतरियों वाला एरिया ज्यादातर समय सुनसान ही रहता है , वहाँ आमतौर पर कोई आता - जाता नहीं है। इसीलिये लाश कार तक ले जाते समय हमें देखने वाला वहाँ कोई नहीं था।
" अब क्या करना है ? " - मैंने पूछा।
" कार में बैठो। " - अभय आदेशात्मक स्वर में बोला।
मैं चुपचाप अभय के बगल वाली सीट पर बैठ गई।
अभय ने कार स्टार्ट की।
" हम कहाँ चल रहे हैं ? "
" तुम कुछ देर चुप रहोगी ? " - अभय गुस्से से चिल्लाया।
वह बहुत ज्यादा टेंशन में था और कुछ सोच रहा था।
कुछ ही देर बाद कार अभय के घर के सामने रुकी।
" आकाश को कॉल करके पूछो कि आज शाम वह किस बार में जा रहा है ? " - कार में बैठे हुए ही अभय आदेशात्मक स्वर में बोला।
रिचा से ब्रेकअप होने के बाद से ही आकाश काफी उदास रहने लगा था।
उसने रोज शाम को शहर के अलग - अलग बार में जाना और वहाँ की शराब टेस्ट करना अपना रूटीन बना लिया था।
" आकाश किस बार में जाने वाला है , यह जानकर हमे क्या करना है ? " -  मैंने सवाल किया।
" लाश से पीछा छुड़ाना है , तो जैसा कह रहा हूँ , वैसा करो। " - मेरी तरफ घूरकर देखते हुए गुस्से से अभय बोला।
मैंने आकाश को कॉल किया।
" हैलो ! " - कॉल रिसीव करते हुए आकाश बोला।
" आकाश ! तुमसे मिलना था , कहाँ हो इस वक़्त ? "
" अभी मैं घर पर हूँ। तुम चाहो तो यहाँ आ सकती हो। "
" घर पर ?...हम कहीं बाहर मिल सकते हैं ? "
" ठीक है। करीब 7 बजे मैं सूरजपोल के ' द सेकंड हाउस बार ' में जाऊँगा , तुम वहीं आ जाओ। "  - आकाश बोला - " वैसे , तुमको मुझसे क्या काम है ? "
" मिलकर बताती हूँ। "
" ओके। "
मैंने फोन कट किया।
उस वक़्त 6.30 बजे थे।
" आधे घंटे बाद द सेकंड हाउस बार में होगा वो। " - अभय की ओर देखते हुए मैं बोली - " अब आगे क्या करना है ? "
" हमे आकाश से पहले वहाँ पहुँचना होगा। " - कार से बाहर निकलते हुए अभय बोला - " मैं अपने मम्मी - पापा को बताकर आता हूँ कि आज मुझे घर लौटने में थोड़ी देर हो जायेगी। "
अभय घर के भीतर गया।
मुझे बहुत टेंशन हो रही थी।
मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर अभय करना क्या चाह रहा था !
वह जल्द ही लौटा।
" मुझे नहीं पता था कि तुम कब , कहाँ जा रहे हो , ये सब अपने मम्मी - पापा को भी बताते हो ! " - आश्चर्यचकित होकर मैंने पूछा।
" ये तुमसे किसने कहा कि ऐसा मैं हमेशा करता हूँ ! " - ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए अभय बोला - " मैंने मम्मी - पापा से ये बोला है कि आज सलोनी , मतलब तुम्हारा बर्थ डे है और सेलिब्रेट करने के लिए हम दोनों माउन्ट आबू जा रहे हैं। "
अभय ने कार स्टार्ट की।
जल्द ही कार उदयपुर की सड़कों पर दौड़ रही थी।
" तुमने झूठ क्यों बोला ? " - कुछ देर चुप रहने के बाद मैं बोली।
" सलोनी ! तुम दो सालों से मेरी दोस्त हो। लेकिन , मुझे अफसोस होता है कि तुम अभी तक मेरे काम करने के तरीके से वाकिफ नहीं हो पाई हो। "
" क्या मतलब ? "
" बिना प्लानिंग के , मैं कभी कुछ नहीं करता और मेरी हर प्लानिंग अचानक बनती है , इतनी अचानक कि मुझे खुद भी सिर्फ मेरे अगले कदम की जानकारी होती है , मेरा दूसरा कदम क्या होगा , ये मुझे तब तक पता नहीं चलता , जब तक कि मैं पहला कदम ना उठा लूँ ! इसीलिये इस वक़्त तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब देना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। जो हो रहा है , तुम बस चुपचाप देखती जाओ। जल्द ही तुम्हारे सारे सवालों के जवाब तुम्हें मिल जायेंगे। "
इसके बाद मैं न कुछ बोली और न ही मैंने कुछ पूछा।
अभय बिल्कुल रिलेक्स होकर ड्राइव कर रहा था , यह जानते हुए भी कि कार की डिक्की में एक लाश थी !
अभय के कॉन्फिडेंस ने हमेशा ही मुझे प्रभावित किया है।
जल्द ही हम द सेकंड हाउस बार पहुंचे।
" तुम भीतर जाकर आकाश का इंतजार करो। " - इस बार मैंने कुछ नहीं पूछा , तो अभय ने खुद ही बोलना शुरू किया - " उसके आने के बाद उसे बातों में उलझाओ और उसे बहुत ज्यादा ड्रिंक करने पर विवश करो। जब वह नशे में डूब जाए तो उसकी कार की चाबी लेकर बाहर आ जाना। "
" ठीक है। " - पूरी बात ध्यान से सुनते हुए मैं बोली।
" और एक बात का खास ध्यान रखना , उसे जरा भी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम उसकी कार की चाबी लेकर बाहर निकली हो। "
" नहीं चलेगा। " - कहते हुए मैं कार से बाहर निकली।
तेजी से चलते हुए मैं बार में दाखिल हुई।
7 बजने में अभी भी 15 मिनट बाकी थे।
मैं वहीं एक तरफ रखे सोफे पर बैठकर आकाश के आने की प्रतिक्षा करने लगी।
मेरे लिए एक - एक पल बिताना मुश्किल हो रहा था।
बड़ी कठिनाई से मैंने 15 मिनट का समय निकाला।
7.10 बजे मुझे आकाश दिखाई दिया।
" हैलो , आकाश ! " - बोलते हुए मैं सोफे से उठकर उसके पास गई।
" हैलो ! " - वह रूखी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए बोला।
" तुम्हें यहाँ देखकर अजीब लग रहा है। " - मैं बोली।
" तुम्हें मुझसे क्या काम था ? "
" वही तो बता रही हूँ। " - मैंने एक खाली टेबल की ओर जाकर चेयर पर बैठते हुए कहा।
आकाश भी मेरे सामने ही बैठा।
" तुम अपनी लाइफ क्यों बर्बाद कर रहे हो ? " - मैं इतने आकस्मिक ढंग से बोली कि वह बुरी तरह से चौंक उठा।
" इससे तुम्हें क्या मतलब ? " - आकाश थोड़ी तेज आवाज में बोला - " क्या यही वो जरूरी काम है , जिसके लिए तुम मुझसे मिलना चाहती थी ? "
" तुम्हारा प्यार सच्चा है आकाश ! " - मैंने सीधे आकाश की आँखों में देखते हुए इमोशनल होने का नाटक करते हुए कहा - " लेकिन , रिचा !...वो तुम्हारे प्यार के लायक नहीं है। "
मैं जानती थी कि प्यार और रिचा - ये दो शब्द आकाश की कमजोरी थे और मुझे पूरा भरोसा था कि इन शब्दों को सुनने के बाद उसका मन जरूर ड्रिंक करने का होगा।
जल्द ही साबित हो गया कि मैं गलत नहीं थी।
उसने ' मैजिक मोमेंट ' ऑर्डर की।
जल्द ही शराब हमारी टेबल पर थी।
मैंने आकाश की नजरों से बचाकर उसकी गिलास में खूब सारा ड्रग्स डाल दिया।
वही ड्रग्स , जो मेरी जीन्स की पॉकेट में खुला हुआ ही रखा था और जिसे मैंने काव्या को दिखाने के लिए उसके सामने ही खोला था।
आकाश ने एक ही साँस में पूरी गिलास खाली कर दी।
इसके बाद उसने अपनी गिलास दोबारा शराब से भरी और उसे भी एक ही साँस में खाली कर दिया।
इस तरह से जल्दी ही मैजिक मोमेंट की पूरी बोतल वह गटक गया।
जल्द ही वह नशे में बुरी तरह से डूब गया।
मैंने उसकी पॉकेट से कार की चाबी निकली।
आकाश ने आज से पहले शराब के अलावा किसी तरह का कोई नशा नहीं किया था , निश्चित रूप से इसीलिए ड्रग्स मिली शराब पीने से वह लगभग बेहोश हो चुका था।
चाबी हासिल करके मैं जल्द ही बाहर आई।
मेरी नजरें अभय को तलाश रही थी। लेकिन , मुझे वो नहीं दिखा।
मैंने उसे अपने मोबाइल से कॉल किया।
कॉल तत्काल रिसीव हुई - " सलोनी ! तुम आकाश की कार लेकर आयड़ की छतरियों के पास पहुँचो। "
" क्या ?...वहाँ क्यों ? "
" सवाल मत करो। जल्दी से पहुँचो। "
समझ तो मुझे कुछ आया नही , लेकिन मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था।
मैं जल्द ही आकाश की कार ड्राइव करते हुए आयड़ की छतरियों के पास पहुँची।
मैंने अभय को अपनी प्रतिक्षा करते हुए पाया।
" अब क्या करना है ? " - मैंने पूछा।
" काव्या की लाश को आकाश की कार डिक्की में ट्रांसफर करना है। "
" क्या ? " - मैं बुरी तरह से चौंक उठी - " लेकिन , हम लाश को कहीं दफना भी सकते है। आकाश की कार में रखने की क्या जरूरत है ? "
" ऐसा करने की दो वजह है , एक तो सारा इल्जाम आकाश पर लगेगा और दूसरी वजह है , रिचा से बदला लेना।...आकाश ने रिंग चोरी जैसी गिरी हुई हरकत की , ये सुनकर ही रिचा बुरी तरह से टूट चुकी है। अब जब वो ये सुनेगी कि आकाश ने एक लड़की का कत्ल कर दिया है , तो उसकी जो हालत होगी , उसे देखकर मुझे बड़ा सुकून मिलेगा। "
तो ये योजना थी अभय की !
निश्चित तौर पर मैं एक मूर्ख लड़की थी , जो उसकी योजना को समझ नहीं पाई थी।
हमने जल्द ही काव्या की लाश और उसके बैग को अभय की कार से निकालकर आकाश की कार की डिक्की में रख दिया।
" अब इस कार को जहाँ से उठाया था , वहीं ले जाकर रख दो। " - अभय बोला।
मैं कार ड्राइव करते हुए दोबारा द सेकंड हाउस बार पहुँची और कार को पार्क करके मैं बार में प्रविष्ट हुई।
आकाश अभी भी बेहोश पड़ा था।
मैंने कार की चाबी उसकी पॉकेट में रखी और उसके होश में आने का इंतजार करने लगी।
करीब दो घंटे बाद उसे होश आया।
10 बजे उसने मुझे अपने घर ड्राप किया।

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