मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 43

 मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 43

अचानक से धड़ाम की आवाज मेरे कानों में पड़ी।
लेकिन , गोली चलने की आवाज मुझे सुनाई नहीं दी और ना ही मुझे किसी तरह की तकलीफ का अहसास हुआ।
मैं समझ नहीं पाई कि आखिर हुआ क्या था !
मैंने धीरे से अपनी आँखें खोली।
मैंने देखा , काव्या नीचे जमीन पर पड़ी हुई थी , उसके पास ही एक बड़ा- सा खून से सना पत्थर पड़ा हुआ था और उसकी रिवॉल्वर उससे दूर एक तरफ पड़ी हुई थी।
काव्या के सिर से ढ़ेर सारा खून निकलकर जमीन पर बह रहा था।
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती , मेरे चेहरे पर किसी ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया।
अगले ही पल मैंने देखा , मेरे सामने अभय खड़ा था।
" अभय ! तुम यहाँ ? "
" बेवकूफ लड़की ! " - अभय गुस्से से चीखा - " तुम ये सब क्या कर रही हो ? "
" म…मैंने क्या किया ? " - मैं घबराहट भरे स्वर में बोली।
" अगर तुमने कुछ नहीं किया , तो काव्या जैसी मासूम लड़की तुम्हें शूट क्यों करना चाहती थी ?..." - कहते हुए अभय काव्या के जमीन पर गिरे बैग में से रुपये निकालकर मुझे दिखाते हुए बोला - " और ये क्या है ? "
" मुझसे सवाल तुम बाद में भी कर सकते हो , पहले हमें काव्या को हॉस्पिटल ले जाना होगा। " - कहते हुए मैं काव्या की ओर लपकी - " काव्या ! उठो , तुम ठीक तो हो ना ! "
अभय ने काव्या की नब्ज चेक की , फिर घबराते हुए उसकी साँसे चेक की और फिर उसने अपना सिर नीचे की ओर झुका दिया।
" क्या हुआ अभय ? " - डरते हुए मैंने पूछा।
" यह मर चुकी है। " - बहुत ही धीमे स्वर में अभय बोला।
" क्या ?...यह तुम कैसे कह सकते हो ?...तुम कोई डॉक्टर नहीं हो ! "
अभय शांत रहा।
भय और विस्मय के मिले जुले भाव मुख पर लिए मैंने काव्या की ओर देखा , उसके शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी।
" य… यह तुमने क्या किया ?...तुमने काव्या को मार डाला ! " - मैं बदहवास सी चीखी।
" मैंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया। यह सब अनजाने में हुआ है। मैं अगर इस पर हमला नहीं करता , तो इसकी जगह पर तुम्हारी लाश पड़ी होती यहाँ। " - अभय सफाई देते हुए बोला - " मैं कोई पेशेवर कातिल नहीं हूँ , जो किसी का भी यूँ ही कत्ल कर दूंगा। जब मैं यहाँ पहुंचा तो ये रिवॉल्वर का ट्रिगर दबाने ही वाली थी , इसीलिए जो पत्थर मुझे दिखाई दिया , उसी से मैंने इस पर हमला कर दिया। मुझे लगा , यह सिर्फ घायल होगी और मैं इसके हाथ से रिवॉल्वर छीन लूँगा। लेकिन…"
मैंने दोबारा काव्या की मृत हो चुकी देह पर निगाह डाली।
" काव्या अगर वहाँ नहीं होती , तो उसकी जगह मेरी लाश पड़ी होती ! " - यह सोचकर ही मेरी रूह काँप उठी।
एक पल के लिए मैने खुद को रिलैक्स किया , फिर बोली - " तुम अचानक यहाँ कैसे पहुँच गए ? "
" कॉलेज से घर जाने के लिए तुम हमेशा कॉलेज के बाहर से ही ऑटो लेती हो। लेकिन , पिछले कुछ दिनों से मैं नोट कर रहा था कि अब तुम कॉलेज से पैदल ही निकल पड़ती हो। बस इसीलिये आज मैंने तुम्हारा पीछा किया और यहाँ तक आ पहुंचा। " - अभय ने बताया - " तुम्हें देखकर मुझे ये तो समझ आ रहा था कि यहाँ तुम किसी का इंतजार कर रही हो , लेकिन किसका और क्यों ?...यह मुझे समझ नहीं आया।...मैं जानना चाहता था कि तुम्हारे यहाँ आने की वजह क्या है , इसीलिये बिना तुमको कुछ बताये , मैं ऑब्जर्व करता रहा। लेकिन , इसी बीच जतिन का कॉल आ गया और मुझे यहाँ से जाना पड़ा।...कुछ देर बाद जब मैं लौटा , तो मैंने देखा कि काव्या तुमको रिवॉल्वर से शूट करने के लिए बस ट्रिगर दबाने ही वाली है। इसके बाद जो हुआ , वो तुम्हारे सामने है। "
" ओह ! "
" लेकिन , तुम दोनों यहाँ कर क्या रही थी और ऐसा क्या हो गया कि काव्या यहाँ रिवॉल्वर लेकर तुमको शूट करने आ गई ? " - अभय ने पूछा।
मैं शांत रही।
" बताओ सलोनी ! और काव्या के बैग में इतने रुपये क्यों थे ? "
" मैं उसे ब्लैकमेल कर रही थी। " - मैं धीरे से बोली।
" क्या ? " - अभय बुरी तरह चौंका - " लेकिन , क्यों ?...तुम्हें काव्या को ब्लैकमेल करने की जरूरत क्यों पड़ी। "
मैंने बताया।
" तुम इतनी इंटेलिजेंट कब से हो गई ? " - पूरी बात सुनने के बाद अभय बोला - " तुमने बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी। कम से कम मुझे बताया तो होता।...अपनी लाइफ में मैंने हर तरह के उल्टे - सीधे काम किये हैं , लेकिन कभी कोई गड़बड़ नहीं हुई।...खैर , जो होना था , वो तो हो चुका। अब हमें इस लाश को कहीं छिपाना होगा। "
" क्या ? " - मैं चौंकी - " लाश को छिपाना पड़ेगा ? "
" हाँ। अगर यह लाश पुलिस के हाथ लग गई , तो हम फँस जाएँगे। " - अभय चिंतित स्वर में बोला।
" हम ?....हम नहीं , अभय ! " - मैं बोली - " तुम , सिर्फ तुम ! क्योंकि कत्ल तुमने किया है। "
" क्या ? " - अभय दहशत से काँप उठा - " तुम ये क्या बोल रही हो ? पैसों के लिए तुमने काव्या को ब्लैकमेल किया , वो तुम्हें मारने के लिए यहाँ आयी , तुम्हें बचाने के लिए मेरे हाथ से एक हादसा हो गया , काव्या गलती से मारी गई और अब इस सबके लिए तुम मुझे दोषी ठहरा रही हो !...मैं अगर वक़्त पर ना पहुंचा होता , तो काव्या की जगह तुम्हारी लाश पड़ी होती। याद रखो , मैं अगर फँसा तो तुम भी बचोगी नहीं। "
" ठीक है , तो अब तुम मुझसे क्या चाहते हो ? "
" काव्या की लाश को ठिकाने लगाने में तुम मेरी मदद करोगी। "
" कैसी मदद ? "
" इस लाश को मेरी कार में रखने में हेल्प करो। "
" ठीक है। "
अभय अक्सर कार से ही कॉलेज आया करता था।
इस वक़्त भी वह कार से ही आया था।
जल्द ही हम काव्या की लाश को कार तक ले जाने में सफल हो गये।


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