उस बारिश के बाद - 3
कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा सौरभ अतीत के गलियारों में भटक ही रहा था कि पुरोहित कैफे आ भी गया।
कार पार्क करके वह बाहर निकला और कैफे में दाखिल हुआ।
कैफे में ज्यादा भीड़ नहीं थी।
इंटर होते ही उसे एक चेयर पर बैठा आकाश दिखाई दिया।
वह उसकी तरफ बढ़ गया।
“आओ सौरभ! मैं तुम्हारा इंतजार ही कर रहा था।” - कहते हुए पास आ चुके सौरभ से हाथ मिलाने के लिए आकाश ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
सौरभ ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
वह चेयर के हवाले हुआ।
“मैं नहीं जानता कि तुमने मुझे यहां इस शहर में दोबारा आने के लिए क्यों मजबूर किया ?” - बैठते ही सौरभ बोला - “वह तुम ही थे, जिसकी वजह से मुझे ये शहर छोड़ना पड़ा था। अपने मम्मी पापा को अकेले छोड़कर यहां से भाग जाना पड़ा। नफरत है…नफरत है मुझे इस शहर से.. इस शहर की आबोहवा से…और…और इसकी एकमात्र वजह तुम हो सिर्फ तुम!”
“यही प्रॉब्लम है तुम्हारी!” - आकाश भी थोड़ा तेज स्वर में बोला - “तुमको लगता है कि सिर्फ तुम ही सही हो, बाकी सब गलत है। तुमने कभी किसी को समझने की कोशिश ही नहीं की। यही वजह थी कि तुम अकेले हो गए और तुम्हें ये शहर छोड़ देना पड़ा। तुमको किसी ने यहां से भगाया नहीं था।…तुम सोचते हो कि कोई मजबूरी थी, जिसकी वजह से तुमको ये शहर छोड़कर भागना पड़ा और कोई दूसरी मजबूरी थी, जिसकी वजह से तुमको फिर से यहां आना पड़ा। लेकिन मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि दोनों ही बार तुम गलत थे। न तो किसी ने तुमको ये शहर छोड़ने के लिए मजबूर किया था और न ही किसी ने तुम्हें यहां वापस आने के लिए मजबूर किया। तुम एक आजाद परिंदे की तरह हो। तुम्हे कभी कोई बांधकर नहीं रख सकता।…फिलहाल मैं तुम्हारे निजी जीवन में दलअंदाजी नहीं करना चाहता। तुम्हें वापस शहर बुलाने की मुख्य वजह तो मैं तुम्हे बताना भी नहीं चाहता।.. बता भी दूं तब भी तुम कहां यकीन करने वाले हो। पर, तुम्हे ये जरूर जान लेना चाहिए कि अंकिता तुमसे आज भी उतना ही प्यार करती है जितना..”
“ मुझे नहीं सुननी ये बकवास!” - आपे से बाहर होते हुए सौरभ इतनी जोर से चीखा कि कैफे में मौजूद सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।
“पहले कॉफी पी लो। ठंडी हो रही है।” - टेबल पर रखी कॉफी की तरफ संकेत करते हुए आकाश बोला - “और ये कोई बकवास नहीं है। तीन साल पहले तुम जिस साजिश का शिकार हुए थे, उसका असर आज तक कायम है और ये तुमने चीखकर साबित कर दिया है।”
“साजिश !” - सौरभ बोला - “हां। साजिश ही तो थी। तुम्हारी रची हुई साजिश, जिसका कि मैं शिकार हुआ था।”
“मैने कोई साजिश नहीं रची। साजिश, जिसकी रची हुई थी वह कोई और था। उसने तो मुझे मोहरा बनाकर तुम्हारे दिल में गलतफहमी पैदा की थी।.. ऐसी गलतफहमी, जिसकी सजा तुम्हारे साथ - साथ मैं और अंकिता भी भुगत रहे हैं।”
“कहा तुमने तब भी यही था और चाहा था कि मैं तुम्हारे झूठ पर यकीन कर लूं और आंखों देखे सच को नकार दूं।”
“मैंने तब भी सच कहा था और अब भी सच कह रहा हूं।”
“और कुछ कहना था तुमको ?”
“अंकिता तुमसे मिलना चाहती है।”
“मैं नहीं मिलना चाहता।”
“बस एक बार।”
“गुड बाय।” - बोलते हुए सौरभ अचानक खड़ा हुआ।
उसको जाते देख भी आकाश कुछ नहीं बोला।
कॉफी ठंडी हो चुकी थी।
सौरभ के साथ उसकी दोस्ती के रिश्ते की तरह ही!



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