मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 41

 मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 41

रिंग चोरी की घटना को एक हफ्ता बीत चुका था।
उस समय तक रिंग चोरी की उस घटना से अगर किसी को कोई फर्क पड़ा था , तो वो थे आकाश और रिचा ! उन दोनों का ब्रेकअप हो चुका था।
सीधा - सादा आकाश शराबी बन चुका था।
और हर समय खुशी से चहकने वाली रिचा उदासी के घने बादलों से बुरी तरह घिर चुकी थी।
काव्या की कोशिशें जारी थी और उसे पूरा भरोसा था कि जल्द वह आकाश के इतना करीब पहुँच जाएगी कि दुनिया की कोई ताकत आकाश को उससे दूर ना कर सके।
और जहाँ तक मेरा सवाल था , मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई हो !
हाँ , काव्या मेरे लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी ही थी।
मेरा लालच अब बढ़ता जा रहा था।
" काव्या ! मुझे दस हजार रुपये की जरूरत है। " - कॉलेज में काव्या को अकेले घूमते देख मै बोली।
" क्या ? " - वह चौंकी।
" दस हजार रुपये काव्या ! " - मैं बिल्कुल बेशर्मी से बोली - " मुझे दस हजार रुपये चाहिये। "
" मैं समझ नहीं पा रही हूँ।...तुम ये क्या बोल रही हो ? मैंने डील के मुताबिक पचास हजार रुपये दिए तो थे ना तुमको ? "
" हाँ, दिए तो थे। लेकिन , वो खर्च हो गए। "
" तो ? "
" तो , बताया ना , मुझे दस हजार रुपये और चाहिये। "
" जब डील पचास हजार रुपये की हुई थी और वो मैं तुमको पहले ही दे चुकी हूँ। तो , तुम मुझसे और रुपयों की मांग क्यों कर रही हो ? "
" क्योंकि मुझे जरूरत है और तुम्हें देने पड़ेंगे। "
" मेरे पास अब कोई रुपये नहीं है। " - कहते हुए काव्या जाने लगी।
" रुको ! " - पीछे से आवाज देते हुए मैं बोली - " अगर तुम मुझे पैसे नहीं दोगी , तो मैं रिचा को बता दूंगी कि वो रिंग मैंने चुरायी थी और आकाश बेगुनाह है।...इसके बाद जो होगा , वो तुम भी अच्छी तरह से जानती हो। "
काव्या घबरा उठी - " तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी। "
" अब ये तो तुम पर डिपेंड करता है। "
" ठीक है। मैं कल रुपये ले आऊँगी। "
" दैट्स गुड ! "
काव्या बुरी तरह से फंस चुकी थी।
सच्चाई सामने आने पर तय था कि काव्या न केवल आकाश को हमेशा - हमेशा के लिए खो देगी , बल्कि उसकी नजरों से भी गिर जाएगी और पूरे दो साल इंतज़ार करने के बाद आकाश के करीब जाने का जो अवसर उसे मिला था , उसको वह इतनी आसानी से खोना नहीं चाहती थी। इसीलिए उसके सामने सिर्फ एक ही रास्ता था कि वह चुपचाप मेरे कहे अनुसार मुझे रुपये देती रहे।
अगले दिन हम फिर आयड़ की छतरियों में मिले , जहाँ उसने मुझे दस हजार रुपये दिए।
अब तो मेरा लालच और भी बढ़ गया था।
केवल दो ही दिन बाद मैंने उससे दस हजार रुपये और मांगे। वह मेरे सामने रोयी , गिड़गिड़ाई और बोली कि उसके पास अब और रुपये नहीं है। लेकिन , मुझे उस पर जरा भी दया नहीं आयी।
इस तरह से मैं हर दो - तीन दिन में उससे दस - दस हजार रुपये लेती रही।
और वह अपने प्यार की खातिर मुझसे ब्लैकमेल होती रही।
लेकिन , वो कहते है ना कि इंसान चाहे जितना धैर्यवान हो , सब्र की सीमा एक ना एक दिन टूट ही जाती है।
काव्या के सब्र का बांध भी टूट चुका था।
उस दिन 12 तारीख थी।
वह दिन जब काव्या कॉलेज से घर के लिए निकली तो थी , लेकिन घर पहुंच नहीं पाई।
मैं काव्या से अब तक सवा लाख रुपये ले चुकी थी।
उस दिन भी हमेशा की तरह कॉलेज से छुट्टी होने के बाद मैं आयड़ की छतरियों में काव्या का इंतजार कर रही थी।
आज फिर काव्या दस हजार रुपये लेकर आने वाली थी।
जल्द ही काव्या वहाँ पहुंची।
मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह चुपचाप रुपए मेरे हाथों में थमाकर चली जायेगी।
लेकिन , उस दिन ऐसा नहीं हुआ।
उस दिन जो हुआ , उसकी तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी !
वह बहुत सीरियस दिखाई दे रही थी।
" तुमने आज आने में कितनी देर लगा दी। जानती हो , मैं कितनी देर से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ ! " - मैं गुस्से में चिल्लाई।
" आज के बाद तुम्हें किसी का इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। " - वह गंभीर स्वर में बोली।
" क्या ? "
अगले ही पल जो मैंने देखा , वो मेरे होश उड़ा देने के लिए काफी था।
काव्या के हाथ में रिवॉल्वर थी !
" य…ये क्या है काव्या ? " - मैं घबराहट भरे स्वर में बोली - " ये रिवॉल्वर तुम्हारे पास कहाँ से आई ? "
" हालत खराब हो गई ना , इसे देखते ही ! अच्छे - अच्छे इसके सामने हार मान लेते हैं , फिर तुम क्या हो !...अरे , हाँ ! तुम्हें रुपये चाहिए थे ना , आज इतने रुपए दूँगी तुमको कि कभी किसी को ब्लैकमेल करने के बारे में सोचोगी भी नहीं। "
" न… नही !...म…मुझे कुछ नहीं चाहिये। तुम ये रिवॉल्वर नीचे करो। प्लीज ! इसे फेंक दो। " - मुझे अपने सामने साक्षात यमराज दिखाई देने लगे थे।
अपनी लाइफ में उल्टे - सीधे काम तो बहुत किये थे मैंने। लेकिन , जो सिचुएशन उस दिन मैं फेस कर रही थी , पहले कभी नहीं की।
मौत की दहशत क्या होती है , ये मैं पहली बार महसूस कर रही थी !
मैं जानती थी कि काव्या जैसी लड़की किसी मच्छर तक को नहीं मार सकती , फिर किसी इंसान की जान लेना तो बहुत बड़ी बात थी।
लेकिन , इस वक़्त उसके हाथ में रिवॉल्वर थी और उसका निशाना भी मैं ही थी !
जरूरत थी तो महज ट्रिगर दबाने की !
और वह तो चाहे - अनचाहे किसी से भी दब सकता है , बस हाथ में रिवॉल्वर होनी चाहिये , जो कि उस वक़्त काव्या के हाथ में थी !
" जरूरत से ज्यादा लालच करने का क्या अंजाम होता है , यह तुमको कुछ ही देर में पता चल जायेगा। "
" नहीं काव्या ! प्लीज…"
" गलती क्या थी मेरी ?...सिर्फ यही ना कि मैंने आकाश से प्यार किया , उसे अपना बनाना चाहा और इसके लिए मैंने तुम जैसी गिरी हुई लड़की की मदद ली...लेकिन , तुम…तुमने चंद रुपयों के लिये मेरी जिंदगी नरक से भी बदतर कर दी। माना कि मैं अमीर खानदान से हूँ , मेरे पापा लखपति है और उनके पास बहुत पैसा है , लेकिन इस सबके बाद भी मुझे लगा कि मैं अपने मम्मी - पापा को बताए बिना ही अपनी ये प्रॉब्लम सॉल्व कर दूँ और इसीलिए तुमको पचास हजार रुपये देने के लिए बिना किसी को बताए मैंने अपनी सोने की चैन बेच दी।...मुझे लगा कि बिना किसी को बताए मेरी ये प्रॉब्लम सॉल्व हो गई।...लेकिन , पचास हजार रुपये मिलने के बाद भी तुम्हारा मन नहीं भरा। तुमने और रुपयों की मांग रखी।
दस - पाँच हजार तक तो ठीक था , मैंने पापा से लिये। लेकिन , हर दो - तीन दिन में तुमको दस हजार रुपये चाहिये थे !...मुझे और दो - तीन बार पापा से रुपये मांगने पड़े और तुमको क्या लगता है…मैंने पापा को ये बोला कि सलोनी मुझे ब्लैकमेल कर रही है और उसका मुँह बन्द करने के लिए मुझे रुपये चाहिये ?....मुझे हर बार पापा से झूठ बोलना पड़ा। कभी मैंने अपने कॉलेज के किसी फ्रेंड के लिए बर्थडे गिफ्ट खरीदने के लिये पैसों की जरूरत है , ये झूठ बोला।...तो कभी फ्रेंड्स को एक पुरानी ड्यू पार्टी देनी है , ये झूठ बोला !.....जानती हो , पापा मुझ पर कितना भरोसा करते हैं !...इसके बाद भी मुझे उनसे बार - बार झूठ बोलना पड़ा , सिर्फ इसलिये ताकि तुम्हारे लालच का घड़ा भर सके। लेकिन , तुमने तो हद ही कर दी ! तुम्हारी पैसों की मांग तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही !....हर तीसरे दिन तुम्हारे लिए पैसों का बंदोबस्त करने की चिंता और हर रात यह डरावना सपना कि कहीं आकाश को या रिचा को तुम सच्चाई ना बता दो - इन दो कारणों से मेरे रातों की नींद गायब हो गई।...मैं समझ गई कि तुम जैसी लड़की को दुनिया की सारी दौलत भी मिल जाये , तब भी तुम्हारा लालच खत्म नहीं हो सकता। इसीलिए मैंने एक फैसला किया , रोज - रोज पैसों से तुम्हारा मुँह बन्द करने से अच्छा है , इस एक रिवॉल्वर से हमेशा - हमेशा के लिए तुम्हारा मुँह बन्द कर दूँ। "
" न…नहीं ! " - मैं जोर से चीखी - " ऐसा मत करना काव्या !...मैं तुम्हें अब कभी परेशान नहीं करूँगी , कभी तुमसे पैसे नहीं माँगूँगी। प्लीज ! रिवॉल्वर फेंक दो ! "
" तुम जैसी लड़की पर भरोसा करके मैं पहले ही गलती कर चुकी हूँ।...अब और नहीं। “


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