मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 40

 मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 40

उसी समय प्रोफेसर आभा मैडम क्लासरूम में प्रविष्ट हुई।
उस दिन हिस्ट्री की क्लास नहीं हो पाई थी , सर छुट्टी पर थे।
सेकंड क्लास हिंदी की होती थी।
आभा मैडम के आते ही पलक ने रिंग बॉक्स अपने बैग में डाली और हिंदी की बुक निकाल ली।
11.30 बजे थे।
क्लास 12.30 बजे खत्म होती थी।
मतलब , मुझे पूरे एक घंटे प्रतिक्षा करनी थी।
वह एक घंटे का समय मैंने बड़ी बैचेनी से निकाला।
12.30 बजे क्लास खत्म हुई।
यह लंच टाइम था।
इस समय ज्यादातर स्टूडेंट कैंटीन में जाते थे और कुछ बस यूँ ही बाहर घूमते रहते थे।
बस कुछ ही स्टूडेंट क्लास में रुकते थे।
मैंने अपने बैग से एक नोटबुक निकाली और कुछ लिखने का अभिनय करने लगी।
उस वक़्त मेरे अलावा क्लास में चार स्टूडेंट और थे।
मैंने क्लास खाली होने की प्रतिक्षा की।
जल्द ही मुझे अवसर मिला।
पूरी क्लास खाली हो गई।
अब क्लासरूम में मेरे अलावा कोई नहीं था !
मैंने एक बेवकूफीभरी हरकत की।
मैं जल्दी से उठी और क्लासरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।
मेरे पास बहुत कम वक्त था।
उस वक़्त अगर कोई भी आ जाता तो मैं शक के दायरे में आ सकती थी।
मैंने जल्दी से पलक के बैग से रिंग बॉक्स निकाला और उसे आकाश के बैग में शिफ्ट कर दिया।
यह सब करने में मुझे एक मिनट से भी कम समय लगा।
मेरा काम हो चुका था।
मैंने सावधानी से गेट खोला और बाहर आकर सब तरफ ध्यान से देखा।
मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त थी कि मेरी इस हरकत को किसी ने भी नोट नहीं किया।
इसके बाद मैं तेज कदमों से चलते हुए कैंटिन की ओर गई।
ताकि मुझ पर किसी को शक हो भी , तो मैं ये कहकर खुद को बचा सकूँ कि मैं उस वक़्त कैंटिन में थी।
इसके बाद , सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा कि मैंने सोचा था।
लंच टाइम पूरा होने के बाद पलक ने अपना बैग चेक किया। उसे रिंग बॉक्स नही मिला।
उसने अपने बैग का सारा सामान डेस्क पर उलट दिया। लेकिन , उसे न रिंग मिली , न रिंग बॉक्स !
उसका मन अनजानी आशंका से भर उठा।
वह तेजी से दौड़ते हुए प्रिंसिपल रूम की ओर भागी।
कुछ देर बाद आभा मैडम क्लास में आई और एक - एक स्टूडेंट की तलाशी ली गई।
परिणाम वही निकला , जो निकलना था।
रिंग बॉक्स आकाश के बैग में से बरामद हुआ।
आकाश रिंग चोर साबित हो चुका था।
वह अंत तक यही कहता रहा कि रिंग उसने नहीं चुरायी और उसे नहीं पता कि यह रिंग उसके बैग में कैसे आ गयी। लेकिन , वो कहते है ना कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं होती।
यहाँ भी बस कुछ ऐसा ही हुआ।
आकाश को प्रिंसिपल रूम में ले जाया गया।
प्रिंसिपल सर ने तो बस वार्निंग देकर उसे छोड़ दिया था। लेकिन , रिचा !...रिचा ने आकाश को इसके लिए माफ नहीं किया।
उसने आकाश से ब्रेकअप कर लिया।
रिचा और आकाश दो साल तक रिलेशनशिप में रहे थे।
अब अचानक ही उनमें ब्रेकअप हो गया , तो यह बात जंगल में आग की तरह जल्द ही पूरे कॉलेज में फैल गई।
मेरी योजना सफल हो चुकी थी।
अब मुझे काव्या से डील के मुताबिक पचास हजार रुपये हासिल करने थे।

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" आकाश और रिचा का ब्रेकअप हो गया है। " - मैंने काव्या को खुशखबरी देते हुए कहा - " अब तुम्हारा रास्ता क्लियर है। "
" हाँ , मैंने भी बस अभी - अभी सुना। " - काव्या बोली - "लेकिन , मैं समझ नहीं पा रही कि यह सब हुआ कैसे !....तुमने कहा था कि तुम उन दोनों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर दोगी। लेकिन , तुम्हें तो कुछ करना ही नहीं पड़ा। आकाश ने पलक की रिंग चुराकर रिचा को खफा कर दिया। "
मैं हँसी - " तुम्हें लगता है कि वो रिंग आकाश ने चुरायी है ? "
" हाँ। "
" उसे रिंग चुराने की क्या जरूरत ? "
" क्या मतलब ? " - हैरत भरी नजरों से काव्या ने मेरी तरफ देखा।
" वो रिंग मैंने ही पलक के बैग से आकाश के बैग में ट्रांसफर की थी। "
" क्या ? " - काव्या बुरी तरह से चौंक उठी - " पर , तुमने ऐसा क्यों किया ? "
" ताकि रिंग चोरी का इल्जाम आकाश पर आए और रिचा आकाश से खफा हो जाये। "
" लेकिन , तुमने यह अनुमान कैसे लगाया कि आकाश पर रिंग चोरी का इल्जाम लगने से रिचा उससे ब्रेकअप कर लेगी ? "
" बहुत आसान था। कोई भी लड़की ऐसा बॉयफ्रेंड नहीं चाहेगी , जो चोरियां करता फिरे। "
" वाह ! क्या दिमाग लगाया है तुमने ! " - खुशी से चहकते हुए काव्या बोली - " तुम सच में जीनियस हो ! "
" जरूरत सब कुछ करा देती है काव्या ! "
" जरूरत ? "
" तुम नहीं समझोगी।...मुझे मेरे रुपये कब मिल रहे हैं ? "
" रुपये !....वो तो मैं कल ही ले आऊँगी। "
" यहाँ कॉलेज में नहीं। " - मैं बोली - " आयड़ की छतरियों में। "
" क्या ?...वहाँ क्यों ? "
" रकम बड़ी है और मैं किसी तरह का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती। "
" ठीक है। जैसा तुम कहो। "
" ठीक है। "
अगले दिन कॉलेज से छुट्टी होने के बाद हम अलग - अलग ' आयड़ की छतरियों ' में पहुंचे।
वह स्थान कॉलेज से ज्यादा दूर भी नहीं था और वहाँ पर एकांत भी पर्याप्त था।
वह सारे पैसे अपने कॉलेज बैग में लेकर आई थी।
वे रुपये मैंने अपने बैग में ट्रांसफर किये।
" तुम चाहो , तो इन्हे गिन सकती हो। " - काव्या बोली।
" जरूरत नहीं है। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। "
" ठीक है , अब मैं चलती हूँ। " - कहते हुए काव्या जाने के लिए घूमी।
" काव्या ! सुनो। " - पीछे से आवाज देते हुए मैंने कहा।
" क्या हुआ ? " - वह लौटी।
" रिंग और पैसों वाली बात गलती से भी किसी को पता नहीं चलनी चाहिए , क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मेरा तो जो होगा , सो होगा , लेकिन तुम…तुम आकाश को हमेशा - हमेशा के लिए खो दोगी। "
" मैं समझती हूँ , सलोनी ! " - काव्या थोड़ा इमोशनल होते हुए बोली - " पर , प्लीज तुम भी थोड़ा ध्यान रखना। "
" मेरी तरफ से तुम बिल्कुल निश्चिंत रहो। "
" थैंक्स ! " - कहते हुए काव्या वहाँ से चली गयी।

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