मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 39
" तुमने ऐसी कौनसी ग़लती कर दी सलोनी , जिसके लिए तुम्हें इतना अफसोस हो रहा है ? " - पलक ने पूछा।
" तुम्हारी रिंग , पलक ! " - सलोनी ने बताया - " तुम्हारी रिंग मैंने ही चुरायी थी। "
" क्या ? " - पलक अंदर तक हिल गयी - " वह रिंग तुमने चुरायी थी ? "
" हाँ। "
पलक ने आकाश की ओर आश्चर्य से देखा।
वह निर्विकार भाव से बैठा था।
" अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। " - आकाश बोला।
पलक समझ गयी कि उसका संकेत रिचा की ओर था।
जिसकी नजरों में आकाश खुद को बेगुनाह साबित करना चाहता था , वह अब इस दुनिया मे थी ही नहीं।
पलक दोबारा सलोनी से मुखातिब हुई - " तुमने ऐसा क्यों किया और किया तो किया , अगर तुम्हें रिंग चुरानी ही थी तो शौक से चुरा लेती , पर उसे आकाश के बैग में रखने की क्या जरूरत थी ? "
" मैं जानती हूँ कि मैंने बहुत गलत किया है। लेकिन , शायद तुम्हें नहीं मालूम कि मैंने क्या क्या गलत किया है। जाने - अनजाने में जो अपराध मुझसे हुए हैं , उन्हें स्वीकार करने और अपनी गलतियों को सबके सामने उजागर करने के लिए ही मैं यहाँ आई हूँ। " - सलोनी बोली।
पलक को अपने बात करने के ढंग पर थोड़ा अफसोस हुआ।
पलक कभी भी , किसी से भी कुछ भी बोल देती थी और अपनी कही बात का उसे कभी कोई अफसोस नहीं होता था।
लेकिन , आज जीवन में शायद पहली बार उसे अपने कुछ बोलने पर अफसोस हुआ था और वो भी उस स्थिति में , जबकि वो बिल्कुल सही थी !
सलोनी ने जो किया , उसके लिए पलक इतना तो बोल ही सकती थी।
लेकिन , जब गलती करने वाला शख्स खुद ही पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा हो , तो उसे कुछ भी गलत कहना , खुद अपनी ही आत्मग्लानि का कारण बन जाता है।
पलक के साथ यही हुआ था।
सलोनी आगे बोली - " मैं जब बहुत छोटी थी , तभी मेरे माता - पिता मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। चाचा - चाची ने मुझे अपनी सगी बेटी की तरह ही पाल पोसकर बड़ा किया।...सब कुछ ठीक ही चल रहा था। लेकिन , बाहर के लोग और ये समाज - इन्होंने मेरी लाइफ की वाट लगा दी। जब तक मैं एक अबोध बच्ची थी , तब तक तो आम लड़कियों की तरह ही अपने चाचा - चाची की आज्ञाकारी और लाडली बेटी थी। बस नाम का फेर था , बाकी मेरे लिए माता - पिता और चाचा - चाची में कोई फर्क नहीं था।
लेकिन , जब मैं थोडी बड़ी और समझदार हुई तो खुद के लिए बाहर के लोगों से मैंने बस यही सुना कि ' बेचारी , बिन माँ - बाप की बच्ची है। चाचा - चाची पता नहीं कैसा बर्ताव करते होंगे इसके साथ ! '
और मोहल्ले के लोग तो हद ही करते थे। वे लोग पूछते थे कि ' बेटी ! खाना तो दोनों टाइम खाती हो ना तुम ? '
छोटी थी तो ये बातें समझ नहीं आती थी। लेकिन , जैसे - जैसे बड़ी होती गई , मैं इन बातों का मतलब समझती गई और इन बातों की वजह मुझे समझ आती गई।...मेरी समझ में , मेरे सम्बंध में लोग इस तरह की बातें इसलिए करते थे , क्योंकि मेरे पास माता - पिता नहीं थे।
ऐसी कोई संतान आज दिन तक किसी घर में नहीं हुई , जिसे उसके घर के बड़ों से मार ना पड़ी हो , मैं भी इसकी अपवाद नहीं थी।
और , चलो मैं तो उस घर की भतीजी थी।
लेकिन , मेरा कजिन सोनू ! ...वो तो उस घर का बेटा था ना , वह भी तो जब कोई गलती करता था , तो मार खाता ही था।...लेकिन , बाहर के लोगों की बातें सुन - सुनकर मेरा दिमाग इतना खराब हो गया कि जब भी किसी गलती के लिए मुझे मार पड़ती , तो मुझे लगता कि मेरे साथ ऐसा इसलिए हो रहा है , क्योंकि मैं बिन माँ - बाप की बच्ची हूँ। मुझे लगता था कि अगर मेरे माता - पिता जीवित होते , तो मेरे साथ ये सब नहीं होता। सोनू के साथ भी वही सब होता था , जो मेरे साथ होता था और चाचा - चाची से मुझे मार मिलती थी , तो दुलार भी मिलता था , इस बात को मैंने बिल्कुल ही इग्नोर कर दिया था और इसकी वजह शायद यह थी कि उन्होंने तो मुझमे और सोनू में कभी भेद नहीं किया। लेकिन , मैंने यह बात अपने दिमाग में बैठा ली थी कि ये मेरे चाचा - चाची है , माता - पिता नहीं और अपने इसी भेद की वजह से मैंने उन्हें कभी अपने माता - पिता का दर्जा नहीं दिया , भले ही उन्होंने मुझे अपनी बेटी का दर्जा दे रखा हो !
निश्चित रूप से इस समय मैं बहुत ज्यादा इमोशनल हो रही हूँ। लेकिन , अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में इतना गहराई से बताने की वजह मेरे ये इमोशन्स नहीं है। इसकी असली वजह है , रिंग चोरी की वारदात को अंजाम देने के लिए मुझे उकसाने वाले हालातों को बयां करना।...मुझे रिंग चुरानी पड़ी , क्योंकि मैं गलत सोहबत में पड़ गई थी और ऐसा इसलिए हुआ था , क्योंकि इस समाज के लोगों ने मेरे बाल मन में माता - पिता और चाचा - चाची के बीच के फर्क को गहराई से स्थापित कर दिया था।
अब तक आप समझ ही गए होंगे कि मुझे गलत सोहबत में पड़ने से सिर्फ दो ही चीज़ें रोक सकती थी। या तो मेरे माता - पिता जीवित होते या फिर मैं अपने चाचा - चाची को माता - पिता का दर्जा दे देती। लेकिन , ये दोनों ही चीजें नहीं हो पाई और इसीलिए वह तीसरी चीज हुई , मुझे पलक की रिंग चुरानी पड़ी। " - बोलते हुए रागिनी अतीत में खो गई।
□ □ □

0 Comments