मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 30

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 30


" अपनी रणनीति के मुताबिक़ पहले वह अपना दुश्मन सिलेक्ट करता है , फिर उससे कोई गलती करवाता है और जब दुश्मन गलती कर देता है , तो वह धीरे - धीरे उसके जाल में फंसता चला जाता है और एक बार दुश्मन उसके जाल में फंस गया ; फिर उसका बच निकलना नामुमकिन हो जाता है। " - सौरभ ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में बताया - " उसने दुश्मन के रूप में तुम्हें सिलेक्ट कर लिया है , अब वह तुमसे गलती करवाना चाहता है और वह गलती मेरे हिसाब से प्रिंसिपल सर से उसकी शिकायत करना ही हो सकती है।......और अगर तुमने ये गलती कर दी , तो तुम्हारे लिए मुसीबतों का ऐसा दौर शुरू हो जायेगा , जिसे ख़त्म करना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर होगा। "

" वाह ! " - रिचा क्लैप करते हुए बोली - " तुम्हारी इमेजिनेशन तो लाजवाब है।

" यह कोई इमेजिनेशन नहीं है। जो मैंने अभी कहा है , उसे याद ज़रूर रखना , क्योकि मैं बोलता कम हूँ।  लेकिन जो बोलता हूँ , वो बिलकुल फैक्ट होता है। "

" मुझे तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं लगती। अभय का तो शौक ही है , हर किसी को बेवजह परेशान करना। "

" वजह सामने आएगी रिचा ! " -  सौरभ बोला - " और जल्द ही आएगी। "

" देखते हैं। " - कुर्सी से उठते हुए रिचा बोली - " फिलहाल मैं चलती हूँ। वैसे , काफी अच्छी लगी तुम्हारी ये लाइब्रेरी और तुम्हारा शौक भी। बस एक बात कहना चाहूंगी , दिमाग हमारे शरीर का बड़ा नाजुक हिस्सा होता है ,  इसीलिए इसको ज्यादा परेशान नहीं करना चाहिए। "

सौरभ बस मुस्करा दिया , बोला कुछ नहीं।

रिचा वहां से रुखसत हुई।


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सौरभ कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा कोई बुक पढ़ रहा था।

वह बुक पढ़ने में पूरी तरह तल्लीन था।

एकाएक ही उसके हाथ से किसी ने बुक छीन ली।

सौरभ का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।

पहले उसे वे हाथ दिखे , जिनके माध्यम से बुक छीनी गयी थी !

फिर उसकी निगाह उन एक जोड़ी हाथों के मालिक पर पड़ी।

उसे देखकर उसका गुस्सा थोड़ा काम हुआ।

फिर उसे ईसा के वे शब्द याद आये , जो उन्होंने अपने अंतिम समय में कहे थे।

" हे ईश्वर ! इन्हें क्षमा कर दो , ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। "

यह अभय था।

और वह अकेला नहीं था।

अनिल , सलोनी , सुभाष और जतिन भी उसके साथ थे।

" यह तो उचित समय नहीं है , ईसा के शब्दों को याद करने का। " -सौरभ ने सोचा - " वैसे भी मैं माफ़ी से ज्यादा सजा देने में भरोसा करता हूँ। "

" साइकोलॉजी ऑफ़ ह्यूमन बिहैवियर ! " - बुक का टाइटल पढ़ते हुए अभय बोला।

" मेरी बुक वापस करो। " - सौरभ ने गुस्से पर नियंत्रण करते हुए कहा।

" तुम तो वैसे ही साइको लगते हो और ऊपर से ये साइकोलॉजी की बुक !  " - अभय बोला।

उसके सभी साथी ठहाका लगाकर हंस पड़े।

" देखो अभय ! मजाक बहुत हो गया। मुझे मेरी बुक वापस करो। " - सौरभ एक - एक शब्द पर जोर देते हुए बोला।

" दे दूंगा , पहले ये बताओ कि तुमने ऐसी क्या गलती की , जिसके लिये मुझे अपना कीमती वक़्त बर्बाद करके तुम्हारे पीछे टाइम स्पेंड करना पड़ रहा है ? "

" मुझे बेकार के सवालों का जवाब देने की आदत नहीं है। "

" तुम्हें ये बेकार का सवाल लगता है ? " _ अभय चीखा।

" शान्ति बनाये रखो अभय ! " - सौरभ धीमी आवाज़ में बोला - " तुम इस वक्त लाइब्रेरी में हो।

" नहीं रखूंगा , क्या करोगे ? "

सौरभ ने बेहद गंभीर होकर सीधे अभय की आँखों में देखा।

" अब ऐसे क्या देख रहे हो ? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे इस तरह देखने से मैं डर जाऊंगा ? "

सौरभ ने इनकार में सिर हिलाया।

" तुम मेरे काम में दखल दे रहे हो। "

" मैं नहीं , तुम।...तुम मेरे काम में दखल दे रहे हो। "

" क्या बकते हो ? "

" मेरी बुक। "

" ये रखो अपनी बुक ! " - डेस्क पर बुक पटकते हुए अभय बोला - " अब मेरी बात सुनो , रिचा मेरी शिकायत करने प्रिंसिपल के पास जा रही थी , लेकिन तुमने उसे रोका। "

" मैने तो तुम्हारी प्रॉब्लम कम ही की है। तुम्हें तो खुश होना चाहिये। "

" मेरी प्रॉब्लम कम की है ? " - अभय हंसा - " सच में मेरी प्रॉब्लम कम करना चाहते हो तो जाओ और जाकर रिचा से कहो कि वो प्रिंसिपल से मेरी शिकायत करे। "

" क्या ? " - सौरभ ने चौंकने का अभिनय करते हुए कहा - " तुम ऐसा क्यों कह रहे हो ? ऐसा करने से तो प्रिंसिपल सर गुस्सा होंगे और तुम्हें रेस्टीकेट भी किया जा सकता है ! "

" ये प्रिंसिपल की प्रॉब्लम है , तुम वो करो जो मैं कहता हूँ। "

" तुमको अपनी शिकायत ही करवानी है ना ! " - कुछ सोचते हुए सौरभ बोला - " तो मैं जाकर बोल देता हूँ ना , प्रिंसिपल सर को कि तुमने मेरी बुक ले ली और उसे वापस भी नही कर रहे। "

अभय दोबारा हंसा - " तुम्हारी इन छोटी - मोटी शिकायतों से कुछ नही होने वाला , तुम जाओ और रिचा से शिकायत करने को कहो। "

" एक सवाल करूं ? "

" बोलो। "

" तुम रिचा के पीछे ही क्यों पड़े हो ? "

अभय मुस्कराया - " जानना चाहते हो ? "

" तुम बताना चाहते हो ? "

" रिचा मेरा टारगेट है और उसकी तबाही मेरा जुनून। " - कहते हुए अभय अपने साथियों से बोला - " चलो। "

" वजह ? " - सौरभ ने पूछा।

अभय लौटा।

उसने अपना एक हाथ सौरभ की डेस्क पर रखा और दूसरे हाथ की पहली अँगुली सौरभ की ओर उठाते हुए बोला - " वजह जानना तुम्हारे लिये जरूरी नहीं है , तुम्हारे लिये जरूरी है , इस मामले से दूर रहना और अगर तुमने अपनी आदत नहीं बदली , तो मेरा अगला टारगेट तुम भी हो सकते हो। "

अभय वहां से रुखसत हुआ।

" टारगेट ? " - सौरभ मन ही मन बोला - " रिचा टारगेट है इसकी ?....क्यों ?.... "


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"  मैंने अभय की शिकायत  प्रिंसिपल सर से कर दी है। अब देखती हूँ , मुसीबतों का कौनसा दौर शुरू होता है। " - कैंटीन में पहुंचकर सौरभ के ठीक सामने एक कुर्सी पर बैठते हुए रिचा बोली।

" इट्स ओके रिचा ! मैं तुम्हें प्रोटेक्ट करूंगा। " - सौरभ बोला।

" हाँ , जरूर करना , अगर जरूरत पड़ी तो। "

" यहां कौन है , जिसने अभय की शिकायत प्रिंसिपल से की है ? " - कैंटीन में प्रवेश करते हुए जतिन बोला।

" हो गया शुरू इनका गेम ! " - सौरभ बोला।

" क्या ?.... कैसा गेम ? " - रिचा ने पूछा।

" तुमने जो करना था , वो तो कर ही लिया। अब बस तमाशा देखना बाकी है , वो भी देख लो। "

" क्या मतलब ? ''

" मतलब मैं समझाता हूँ। " - जतिन वहाँ आते हुए बोला - " तुमने अभय की शिकायत प्रिंसिपल से की है और अब प्रिंसिपल सर उसकी क्लास ले रहे हैं। तुम तो अब गयी। "

" धमकी दे रहे हो ? " _ रिचा बोली।

" तुमको जो समझना है , समझ लो। "

" अभय यही तो चाहता था कि रिचा उसकी शिकायत प्रिंसिपल सर से करे , इसने वही तो किया है। " - सौरभ बोला।

" अभय कुछ भी बोल सकता है। उसने कहा तो उसकी शिकायत कर दोगे ? "

" तुम चाहते क्या हो ? " - रिचा ने पूछा।

" मैं कुछ नहीं चाहता। लेकिन अभय की शिकायत करके जो गलती तुमने की है , उसकी सजा तो तुमको मिलेगी और वो , अभय खुद तुमको देगा। "

जतिन वहाँ से चला गया।

" रिचा ! तुम ठीक तो हो ना  ? " - रिचा को टेंशन में देखकर सौरभ ने पूछा।

" वो लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं ? "

" चिंता नहीं करो , तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता। "

करीब 15 मिनट बाद अभय वहां आया।

" बधाई हो रिचा ! प्रिंसिपल ने मुझे रेस्टीकेट कर दिया है , पूरे 5 दिनों के लिये ! " - अभय व्यंग्य भरे स्वर में बोला।

" बधाई हो अभय ! " - सौरभ ने कहा।

अभय ने घूरकर सौरभ को देखा।

फिर रिचा से बोला - " वैसे बधाई मैं तुम्हें इसलिये नहीं दे रहा हूँ कि मुझे रेस्टीकेट कर दिया गया है , बल्कि इसलिए दे रहा हूँ , क्योकि तुमने एक गलती की है और गलती करने वाले को सजा देना बहुत जरूरी होता है।...... तो अब मिलते हैं , 5 दिनों के बाद ! और हाँ , सजा के लिए तैयार रहना। "

अभय वहां से रुखसत हुआ।

" तुम सही थे सौरभ ! " - रिचा बोली - " अभय ने मुझसे गलती करवा दी , अब वो मुझे सजा देगा। .... लगता है , मेरे लिए मुसीबतों का दौर शुरू हो चुका है। "

" हर समस्या का कोई ना कोई समाधान जरूर होता है और इसीलिये इस अभय नाम की समस्या का भी एक समाधान है। "

" क्या है वो समाधान ? "

" ये बैठा तो है तुम्हारे सामने। "

" तुम ? "

" हाँ , मैं.....सौरभ ! "


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