मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 27
काव्या आकाश को मन ही मन चाहती थी।
' चाहत ' बहुत छोटा शब्द था।
हकीकत में वह आकाश से प्यार करती थी।
न सिर्फ प्यार , बल्कि कहा जा सकता है कि वह मर जाने की हद तक आकाश से मोहब्बत करती थी।
दो साल पहले उसने आकाश को प्रपोज़ भी किया था , लेकिन आकाश ने यह कहते हुए साफ़ मना कर दिया कि वह सिर्फ और सिर्फ रिचा से प्यार करता है।
सुनकर काव्या अंदर ही अंदर टूट गयी थी।
आकाश के बेरुखी भरे जवाब से उबरने के लिए उसने लगातार एक हफ्ते तक खूब शॉपिंग की और अपनी फ्रेंड्स के साथ खूब पार्टियां भी की।
लेकिन , उसने हार नहीं मानी।
वह आकाश से दोबारा मिली और उसके सामने यह प्रस्ताव रखा कि हम कम से कम दोस्त तो बन ही सकते हैं।
आकाश ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
और काव्या ने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह आकाश का साथ दिया।
जब भी आकाश दुखी या उदास होता , काव्या दोस्ती का फर्ज निभाती हुई हर वक़्त उसके साथ ही होती।
आज भी ऐसा ही हुआ था !
रिचा से ब्रेकअप के बाद जब आकाश खुद को बिलकुल अकेला महसूस कर रहा था , तब ऐसे कठिन समय में भी काव्या उसके साथ ही थी।
वे कैंटीन से बाहर आये।
" चलो आज थोड़ा ड्राइव पर चलते हैं। " - आकाश बोला।
" कहाँ ? " - अपनी ख़ुशी पर काबू पाने का भरपूर प्रयास करते हुए काव्या ने पूछा।
" बस यूँ ही , कहीं भी। "
" ओके। "
कुछ ही पलों के बाद आकाश और काव्या एकसाथ बाइक पर थे।
उस बाइक पर , जो अनियंत्रित गति से युनिवेर्सिटी रोड पर दौड़ी चली जा रही थी।
काव्या यकीन नहीं कर पा रही थी कि जो कुछ वह देख रही थी , वो सच में हकीकत थी या महज़ एक सपना !
अगर ये हकीकत थी तो यकीनन आज काव्या इस दुनिया की सबसे खुशकिस्मत लड़की थी और अगर ये सपना था, तो वो चाहती थी कि वह हमेशा सोयी रहे और सोकर हमेशा - हमेशा इसी सपने में खोयी रहे।
ऐसा नहीं था कि वह पहली बार आकाश के साथ बाइक पर कहीं जा रही थी , यह सुअवसर तो उसे पहले भी कई बार मिल चुका था।
फिर उसके इतने अधिक खुश होने की वजह क्या थी ?.....
वो वजह थी , आकाश का मूड ज़बरदस्त तरीके से ऑफ था और ऐसे समय में उसकी इच्छा हुई थी कि वह फ़ास्ट ड्राइविंग करे , जो कि नौजवानो में आम बात होती है।
बहरहाल , यहाँ ख़ास बात ये थी कि आकाश अपनी आदत के मुताबिक़ , मूड ऑफ होने पर फ़ास्ट ड्राइविंग के लिए अक्सर अकेले ही जाया करता था। लेकिन , आज वह काव्या को भी साथ लेकर आया था। बस इसी वजह से काव्या यह सोचकर बहुत खुश थी कि आकाश की ज़िंदगी में उसकी अहमियत एकाएक ही कितनी अधिक बढ़ गयी है !
जल्द ही वे शास्त्री सर्कल , चेतक सर्कल और फतेहपुरा होते हुए फतेहसागर झील तक जा पहुंचे।
फतेहसागर झील पर ठण्ड थोड़ी ज्यादा थी।
आकाश ने बाइक एक जगह पार्क की और पुल की रेलिंग के सहारे खड़ा होकर झील को निहारने लगा।
" तुम तो बहुत तेज़ ड्राइव करते हो ! " - काव्या ने हैरान होने का अभिनय करते हुए कहा।
" कभी - कभी अन्दर भरा गुस्सा बाहर निकालने का और कोई रास्ता मिलता ही नहीं। "
" इसीलिये तेज़ ड्राइव करते हो ? "
" हाँ। "
" और ऐसे में अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो ? "
" तो ! .... तो क्या फर्क पड़ता है। " - आकाश व्यंग्य से मुस्कराया।
" जिंदगी इतनी सस्ती नहीं है कि इसके खोने का इंसान को कोई खौफ ही न हो। "
" ये सब बोलना बड़ा आसान होता है। " - आकाश बोला - " लेकिन , जब खुद पर बीतती है , तो अच्छे - अच्छों की हिम्मत जवाब दे जाती है। "
" दिल टूटने की तड़प मैंने भी महसूस की है आकाश ! " - काव्या इमोशनल होते हुए बोली - " लेकिन , दिल टूटने पर मैं खुद भी तुम्हारी तरह टूट नहीं गयी थी। मैंने खुद को संभाला था और बहुत अच्छी तरह से संभाला था। "
" कब ? .... कैसे ? ...... तुमने तो बताया तक नहीं ! "
काव्या कुछ बोली नहीं। बस एकटक आकाश की ओर देखती रही।
आकाश को देखते - देखते पता नहीं क्यों , उसकी आँखे नम हो गयी।
अचानक से आकाश को कुछ याद आया और उसे अपने ही सवालों की व्यर्थता समझ में आयी।
" सॉरी ! " - आकाश बोला।
" इट्स ओके आकाश ! " - काव्या बोली - " जो तूफ़ान दो साल पहले ही आकर गुज़र गया , उसका क्या अफ़सोस करना। "
" मैं भूल गया था। "
" दोस्ती न की होती , तो अब तक तो मुझे भी भूल ही जाते। "
आकाश कुछ नहीं बोला।
" मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि तुम हमेशा खुश रहो। "
" अपनी हर तकलीफ के वक़्त मैंने तुमको अपने साथ खड़ा पाया है काव्या ! " - आकाश बोला - " इसमें कोई शक नहीं कि तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो। "
" खैर , जाने दो इन सब बातों को। " - काव्या ने कहा - " यहां ठण्ड थोड़ी ज्यादा है , लेकिन इस जगह की खूबसूरती बेजोड़ है। "
" सही कहा। "
कुछ देर और वहीं रूककर वे वहां से रुखसत हुए।
वे फिर से कॉलेज पहुंचे।
आज आकाश के साथ गुज़रे वक़्त ने काव्या को जो ख़ुशी दी थी , उस ख़ुशी ने उसे काफी कुछ सोचने के लिये विवश कर दिया था।
काव्या एक फैसला तो कर ही चुकी थी।
उसने सोच लिया था कि चाहे जो हो , लेकिन आकाश के करीब जाने का जो मौक़ा उसे मिला है , उसे वह अपने हाथ से जाने तो नहीं देगी ; किसी भी कीमत पर नहीं।
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