मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 26
" रिचा ! " - यह आवाज़ सुनकर आगे बढ़ती रिचा के कदम एकाएक ही थम गये।
वह पीछे घूमी।
उसके सामने सौरभ था।
सौरभ को देखते ही रिचा के चेहरे पर मुस्कान उभर आयी।
यह कोई नयी बात नहीं थी , सौरभ था ही इतने सौम्य चेहरे वाला लड़का कि उसे देखने वालों के चेहरे पर बरबस मुस्कान आ ही जाती थी।
" क्या हुआ सौरभ ? " - रिचा ने पूछा।
" प्रिंसिपल सर के पास जा रही हो ? "
" हाँ। "
" अभय की शिकायत करने ? "
" तुम्हें कैसे पता ? " - रिचा ने थोड़ा शॉक्ड होते हुए पूछा।
" जब अभय तुम्हें बेवजह परेशान कर रहा था , तब मैं वहीं था। "
" वहीं थे ? " - रिचा चौंकी - " और तुमने मेरी कोई हेल्प भी नहीं की ? "
" रिचा ! " - सौरभ समझाने वाले अंदाज़ में बोला - '' तुम जानती होना कि अभय किस तरह का लड़का है ? "
रिचा ने प्रश्नसूचक नज़रों से सौरभ की ओर देखा।
सौरभ आगे बोला - " बेवजह हर किसी को परेशान करना , लड़ाई - झगड़ा करना - हमेशा यही सब तो करता रहता है वो। "
" ऐसा इसलिये होता है , क्योंकि कोई उसका विरोध नहीं करता। " - रिचा बोली - " जब अन्याय सहने वाले बढ़ जाते हैं , तो अन्याय करने वालों में स्वतः ही बढ़ोतरी होने लगती है। "
" तो तुम अन्याय का विरोध करना चाहती हो ? "
" हाँ। "
" और ये तुम कैसे करोगी ! " - सौरभ व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - " प्रिंसिपल सर से अभय की शिकायत करके ! "
" तुम कहना क्या चाहते हो ? " - रिचा ने पूछा।
'' जब अभय तुम्हारे साथ बदतमीजी से पेश आ रहा था , तब मैं वहीं एक तरफ खड़ा सब देख - सुन रहा था। " - सौरभ ने कहा - " अगर तुम सोचती हो कि प्रिंसिपल सर से अभय की शिकायत करने का डिसीज़न तुम्हारा था , तो तुम बिल्कुल गलत हो।....यह अभय का डिसीज़न था , वह तो खुद चाहता है कि तुम प्रिंसिपल सर से उसकी शिकायत करो और प्रिंसिपल सर उसे कुछ दिनों क लिये कॉलेज से बाहर निकाल दे। "
" सौरभ ! " - रिचा बोली - " जो बातें तुमने वहाँ पर छिपकर सुनी थी , वे ही बातें मैंने वहां सबके सामने सुनी थी। जो तुम मुझे बता रहे हो , वो सब मैं अभय के मुँह से पहले ही सुन चुकी हूँ। "
सौरभ मुस्कराया - " सुनने और समझने में फर्क होता है रिचा ! "
" क्या मतलब ? "
" तुमने सोचा है , अभय ने ऐसा क्यों कहा कि प्रिंसिपल से मेरी शिकायत कर दो ? "
" क्योंकि वह बेवकूफ है। " - रिचा क्रोध भरे स्वर में बोली।
" नहीं ! " - सौरभ बोला - " वह बेवकूफ नहीं , चालाक है। उसने कोई योजना बनाई है , जिसके क्रियान्वित होने के लिए प्रिंसिपल सर से उसकी शिकायत किया जाना जरूरी है।....ऐसा भी हो सकता है कि वह तुम्हें किसी बड़ी मुसीबत में फंसाना चाहता हो !
" तुम मुझे डरा रहे हो ? "
" नहीं ! सावधान कर रहा हूं। " - सौरभ बोला - " वैसे , तुम्हारे लिए एक सलाह है। "
" क्या ? "
" अभय की शिकायत तुम दो दिन बाद भी कर सकती हो।.....तब तक उसकी योजना भी पता चल जाएगी और अगर तुम्हारे भीतर धैर्य नहीं है , तो जाओ और अभी ऐसा कर दो। "
रिचा ने पल भर के लिए सोचा।
" सौरभ ! तुम्हें अभय के बारे में इतना कुछ कैसे पता ? "
सौरभ मुस्कराया - " यह सब किताबों की बदौलत हुआ है। "
" क्या ? " - रिचा हंसी - " किताबों की बदौलत ? वो कैसे ? "
" किताबों ने मुझे काफी कुछ सिखाया है रिचा ! " - सौरभ ने बताया - " किताबों ने मुझे जीना सिखाया है। "
रिचा को बहुत आश्चर्य हुआ - " कैसे ? "
" यह कोई ऐसा विषय नहीं है , जिस पर चलते - चलते बात की जा सके।.....इसके बारे में बात करने के लिये शान्ति और एकांत की जरुरत होगी। "
" और वो शान्ति.....वो एकांत कहाँ मिलेगा ? "
" पता नहीं। " - सौरभ मुस्कराते हुए बोला - " खैर ,अभी चलता हूँ। "
" किताब वाली बात ? "
" फिर कभी। "
सौरभ वहां से चला गया।
" सौरभ कितना समझदार और सुलझे दिमाग वाला लड़का है। " - रिचा सोच रही थी - " पता नहीं उसे अभय के बारे में इतना सब कैसे पता ! "
□ □ □
अगले दिन आकाश कॉलेज कैंटीन में बैठा था।
" हैलो , आकाश ! " - काव्या वहां आकर बोली - " हाउ आर यू ? "
" फाइन ! " - आकाश बनावटी मुस्कान के साथ बोला।
काव्या आज काफी खुश दिख रही थी।
ग्रीन कलर के सूट में वह बहुत खूबसूरत लग रही थी।
" आज कॉफी आर्डर नहीं की ? "
" नहीं। " आकाश बोला - " मैं भी बस अभी ही आया हूँ। "
" अच्छा ! "
इसी पल आकाश की निगाह कैंटीन के गेट की ओर गयी।
रिचा गेट पर प्रकट हुई।
उसे देखते ही आकाश की हार्टबीट थोड़ी बढ़ गयी , लेकिन सिर्फ एक पल के लिये ; क्योकि रिचा वहां अकेली नहीं आयी थी।
वह अपनी फ्रेंड्स के साथ भी नहीं आयी थी।
वह वहां आयी थी , सौरभ के साथ !
सौरभ और रिचा को एकसाथ देखकर आकाश को थोड़ा अजीब लगा।
आकाश को बुरा लगा था।
" इसमें कौनसी बड़ी बात है ! " - एक पल के लिए आकाश ने सोचा।
" यहाँ काफी कुछ बदल चुका है आकाश ! " - काव्या बोली।
" मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता। " - आकाश उपेक्षा से बोला।
काव्या मुस्करायी - " खुद को कब तक अँधेरे में रखोगे आकाश ? सौरभ के बारे में पूरा कॉलेज जानता है। वह एकांतप्रिय लड़का है , लड़कियों में उसकी कोई रुचि नहीं है , अक्सर वह लाइब्रेरी में ही पाया जाता है और वही आज रिचा के साथ कैंटीन में दिखाई दिया है , तुम्हें यह सब नॉर्मल लग रहा है ? "
आकाश कुछ नहीं बोला।
" आकाश ! मैं पिछले दो दिनों से देख रही हूँ , तुम बहुत उदास और मायूस रहने लगे हो। " - काव्या चिंतित स्वर में बोली - " ऐसा कब तक चलेगा ?....रिचा को देखो , उसने तो तुमसे रिलेशन तोड़कर सौरभ के साथ जोड़ भी लिया। "
आकाश ने खा जाने वाली नज़रों से काव्या की ओर देखा।
" ऐसे मत देखो आकाश ! " - काव्या बोली - " सच्चाई को स्वीकार करो। "
" कैसी सच्चाई ? "
" वो जो..." - काव्या ने एक तरफ बैठे सौरभ और रिचा की ओर संकेत करते हुए कहा - " .....उस टेबल पर बैठी है। "
आकाश एकाएक उठ खड़ा हुआ।
'' क्या हुआ ? "
" मैं यह सब और नहीं सह सकता।....चलो काव्या ! कहीं और चलते हैं। " - आवेश में आकर आकाश बोला।
आकाश के शब्दों को सुनकर काव्या का मन प्रफुल्लित हो उठा।
वह मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई।

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