मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 22

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 22

रात के करीब 8 बजे दरवाजे पर दस्तक हुई।

मैंने गेट खोला।

गेट पर आकाश था। लेकिन वह अकेला नहीं था , उसके साथ कोई और भी था और वह कोई और उसके साथ सिर्फ इसलिये था , क्योंकि आकाश अकेले घर पहुंचने की हालत में नहीं था।

" अंकल ! आकाश खुद ड्राइव करने की हालत में नहीं था , इसलिये मैं इसे ड्राॅप करने चला आया। " - वह ' कोई और ' आकाश का काॅलेज फ्रेंड विशाल था , जिससे मैं पहले से वाकिफ था।

आकाश ने ड्रिंक की हुई थी। उसके शरीर से शराब की गंध आ रही थी। 

अपने बेटे को ऐसी हालत में देखकर मेरा दिल खून के आंसू रो पड़ा।

विशाल ने मेरे हाथ में बाइक की चाबी थमायी और जाने के लिये मुड़ा।

" आकाश तो कभी शराब को छूता तक नहीं , फिर आज ?…" - मैंने पूछा।

विशाल पलभर के लिये ठिठका , फिर उसके मुंह से महज़ एक लफ्ज़ निकला - " रिचा ! "

मैं समझ गया।

बेटा हाथ से निकल चुका था।

प्रेम की सफलता इंसान को आबाद करती है , तो विफलता उसे बर्बाद कर देती है।

आकाश प्रेम में विफल हो चुका था।

रिचा के प्यार ने उसे तबाह कर दिया।

वह अभी तक गेट पर ही खड़ा था।

" भीतर आओ। " - मैं धीमे स्वर में बोला।

डगमगाते कदमों के साथ वह आगे बढ़ा।

दो - एक कदम चलने पर ही वह लडखडाकर गिरने लगा , तो अकस्मात् ही मैंने उसकी बाहें थामकर उसे गिरने से बचाया।

अब तक दूर खड़ी यह सब देख रही रीना ने आगे बढ़कर आकाश की दूसरी बांह थामी।

मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था , रीना की आंखें आँसूओं से तर थी।

जिस बेटे ने जीवन में कभी सिगरेट - शराब को छुआ तक न हो , एक शाम अचानक वो नशे में डूबा हुआ घर पहुंचे तो उस वक्त उसके परिजनों की जो हालत हो सकती है , वही हालत उस वक्त हमारी हो रही थी।

मेरे लिये तो खुद को संभालना भी मुश्किल हो रहा था , ऐसे में रीना फूट - फूटकर न रो पड़ी ; महज आंसू बहाकर रह गयी। उसका यह आत्मनियंत्रण उसकी सहनशीलता का परिचायक था।

काफी मुश्किल से आकाश को हम उसके बैडरूम तक ले जाने में सफल हुए।

हमने उसे पलंग पर लिटाया।

नशे में वह बडबडा रहा था - 

" गिर पड़े हम उसके प्यार में ,

मजा भी तो था उस तकरार में।

एक दिल ही तो संभालना था ,

छोड़ गयी उसे भी वो मझधार में। " 

उस रात हममें से किसी ने भोजन नहीं किया।

हाँ , हर तरह से सामर्थ्यवान और साधन सम्पन्न होने के बावजूद उस रात हम भूखे ही सोये।

उस रात के बाद यह तो तय हो ही गया था कि मेरे बेटे आकाश की उस हालत के लिये सिर्फ और सिर्फ रिचा ही जिम्मेदार थी।

उसके बाद तो आकाश का ड्रिंक करके घर आना आम बात हो गयी थी। 

उस लड़की की वजह से मेरे बेटे की जिंदगी तबाह हो गयी और यही वजह है कि मैं उससे नफरत करता हूँ , इतनी ज्यादा कि आज उसके मरने के बाद भी यह बरकरार है। "

" आकाश अब भी ड्रिंक करता है ? " - साकेत ने पूछा।

" नहीं। " - पवन माथुर ने बताया - " मरने से एक दिन पहले पता नहीं क्यों , अचानक से रिचा ने आकाश को माफ कर दिया था और उसने ड्रिंक करना छोड़ दिया। "

" आकाश ने बताया था आपको , कि रिचा ने उसे माफ कर दिया है ? "

" हाँ , बताया था और उस दिन वह काफी खुश भी था। " - मिस्टर माथुर बोले - " मैंने जानना चाहा था कि क्या उसे आकाश की बेगुनाही पर भरोसा हो गया था , लेकिन आकाश के जवाब ने मुझे निराश ही किया। आकाश को नहीं पता था कि रिचा को उसकी बेगुनाही पर भरोसा है या नहीं। "

इसी पल साकेत का मोबाइल बजा।

" एक्सक्यूज मी। " - बोलते हुए साकेत उठा और एक तरफ आकर उसने काॅल रिसीव की।

" हैलो ! " - फोन के दूसरी तरफ से एक महिला स्वर उभरा

" कौन ? " 

" सर ! मैं पलक बोल रही हूँ , आपको कुछ बताना था। "

" हाँ , बोलो पलक ! "

" फोन पर नहीं बता सकती। क्या आप मेरे घर आ सकते हैं ? "

" लेकिन , अभी तो  3 बजे हैं। " - साकेत ने रिस्टवाॅच की ओर देखते हुए कहा - " तुम्हें तो इस वक्त काॅलेज में ही होना चाहिये ! "

" मैं आज जल्दी ही घर आ गयी थी। " 

" ठीक है , मैं पहुंचता हूँ। एड्रेस बोलो। " 

पलक ने बताया।

" ओके। " - फोन कट करने के साथ ही साकेत मिस्टर माथुर से बोला - " आपसे मिलकर काफी अच्छा लगा। अब चलता हूँ। "

पवन माथुर उठे और साकेत को गेट तक छोड़ा।

साकेत ने कार स्टार्ट की और पलक के घर की ओर रुख किया।

□  □  □


Post a Comment

0 Comments