उस बारिश के बाद - 29
सौरभ का आज का दिन बहुत अच्छा गया था। पूरे दिन वह संजना के साथ घूमता - फिरता रहा था। रात के 9 बजे जब वह घर लौटा था, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक थी।
“आज बहुत खुश दिखाई दे रहे हो!... क्या बात है सौरभ!” - सौरभ की मां ने उसके घर में दाखिल होते ही पूछा।
“कोई खास बात नहीं है मां! मैं तो बस हर रोज की तरह ही हूँ।” - सौरभ ने लापरवाही से जवाब दिया।
“वो तो तेरे चेहरे की चमक ही सब कुछ कह रही है। तेरे कुछ बोलने, न बोलने से कुछ नहीं होता!”
“हां, मां!” - सौरभ थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला - “कुछ ऐसा हो गया कि सालों बाद आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। जीने की नई उमंग सी जगी है दिल में!”
“ये तो खुशी की बात है बेटा!” - सौरभ की मां खुशी व्यक्त करते हुए बोली - “तू मुंह - हाथ धो ले। मैं तेरे लिए खाना लगाती हूं।”
“हां, मां!... आज तो मुझे बहुत जोरों से भूख लगी है।” - कहते हुए सौरभ ने पूछा - “पापा कहां है ?... डिनर कर लिया उन्होंने ?”
“हां। कभी का!... वे तो डिनर करके सो भी चुके।”
***
सुबह 8 बजे मोबाइल की इनकमिंग कॉल ने सौरभ की नींद तोड़ी। सौरभ ने हाथ बढ़ाकर सिरहाने रखे मोबाइल को हाथ में लिया और अधखुली आंखों से मोबाइल स्क्रीन पर निगाह डाली। स्क्रीन पर संजना के ही नम्बर फ्लैश हो रहा था।
हल्के से मुस्कुराते हुए सौरभ ने कॉल रिसीव की।
“हैलो, सौरभ! गुड मॉर्निंग!... हाऊ आर यू ?” - कॉल पिक करते ही संजना की उत्साह भरी आवाज सुनाई दी।
“आई एम फाइन!.. वाट अबाउट यू ?... आज भी चलना है क्या मॉर्निंग वॉक पर ?”
“आई एम अल्सो फाइन!... आज मॉर्निंग वॉक पर नहीं…कहीं और चलना है।.. पर वो तो बाद की बात है। अभी तो तुम्हारे लिए एक सरप्राइज़ है।”
“सरप्राइज़ ?” - सौरभ ने चकित स्वर में पूछा - “कैसा सरप्राइज़ ??”
“अरे, सब बताऊंगी। तुम आओ तो!”
“कहां पर ?”
“और कहां आओगे !.. मेरे घर।”
“अभी ना!”
“हां। पर आराम से!... मॉर्निंग वॉक पर तो चलना नहीं है आज। तो, अच्छे से रेडी होकर ही आना।”
“ओके।” - कहने के साथ ही सौरभ ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
सौरभ को बड़ी उत्सुकता थी, आखिर ऐसा क्या सरप्राइज़ देने वाली थी संजना उसे!
***
संजना के घर की बेल बजाने के एक पल बाद ही गेट खुला और जो सौरभ ने देखा, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।
सौरभ की उम्मीद के विपरीत संजना के घर संजना अकेली नहीं थी। कई लोगों का जमावड़ा था वहां पर तो।
“अरे, सौरभ! गेट पर ही खड़े रहोगे क्या!... अंदर आओ।” - मुस्कुराते हुए संजना ने कहा।
सौरभ भीतर आया।
उसने एक सरसरी निगाह वहां मौजूद लोगों पर डाली। संजना के अलावा वहां चार और लोग मौजूद थे।
वे सभी हॉल में ही सोफे और कुर्सियों पर बैठे थे।
सौरभ भी वहां एक चेयर पर बैठा।
उसने सवालिया नजरों से संजना की तरफ देखा।
“ये सब मेरे कॉलेज फ्रेंड्स है।” - संजना बोली।
“कॉलेज फ्रेंड्स!” - सौरभ आश्चर्य प्रकट करते हुए बोला - “पर तुम तो किसी NGO में…”
“हां। मैं NGO में ही वर्क करती हूँ।” - संजना बोली - “पर, कभी कॉलेज में भी पढ़ती थी।…ये सब भी मेरे साथ कॉलेज में ही थे। आज हम सभी अलग - अलग फील्ड में वर्क करते हैं। लेकिन, पुरानी यादें ताजा करने के लिए हर कुछ महीने में मिलकर कहीं ना कहीं ट्रिप पर जाते रहते हैं।”
“अच्छा!”
“हां। और इस बार हम माउंट आबू जाने का प्लान बना रहे हैं। आई थिंक, तुम भी चलना चाहोगे।”
संजना की बात सुनकर सौरभ थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया।
“ये तुम क्या कह रही हो। मैं भला कैसे चल सकता हूं ?” - सौरभ बोला।
“क्यों नहीं चल सकते ?” - संजना ने पूछा।
“तुम कॉलेज फ्रेंड्स के बीच भला मैं क्या करूंगा ?”
“तुम्हे अच्छा लगेगा सौरभ! एक बार चलकर तो देखो। हो सकता है कि इससे तुम्हारी लाइफ में कुछ अच्छा बदलाव आए!”
संजना सही कह रही थी।
सौरभ की लाइफ में कुछ सकारात्मक बदलाव तो आने शुरू हो भी चुके थे।
“ठीक है!” - सौरभ निश्चय भरे स्वर में बोला - “मैं भी चलूंगा।”
सौरभ की बात सुनकर संजना मुस्कुराई।
***
कहने की जरूरत नहीं कि संजना और उसके कॉलेज फ्रेंड्स के साथ सौरभ की वह पांच दिन की माउंट आबू की ट्रिप उसके लिए यादगार बन गई।
इस दौरान संजना से उसकी नजदीकियां भी बढ़ी और पुराने दोस्त कितने अच्छे हो सकते हैं, इसका अनुभव भी सौरभ को उस ट्रिप के दौरान हुआ।
“काश, मेरे दोस्त भी इतने ही अच्छे होते!” - सौरभ ट्रिप के दौरान कई बार सोचता।
सौरभ नहीं जानता था कि उस ट्रिप से लौटते ही एक ऐसी घटना उसका इंतजार कर रही थी, जो उसके जीवन में भूचाल लेकर आने वाली थी!
अंकिता उसे वह सच्चाई बताने वाली थी, जो वह पिछले तीन साल से बताना चाहने के बाद भी बता नहीं पा रही थी। लेकिन अब उसने फैसला कर लिया था कि वह सौरभ को अब सब कुछ सच - सच बताकर ही रहेगी।
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