उस बारिश के बाद - 24

 उस बारिश के बाद - 24

सौरभ को इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि उसके पिता उसे जिम्मेदार बनाने के लिए उसकी शादी के बारे में सोचना शुरू कर चुके थे। 

अपने रूम में दाखिल होकर उसने अपना बैग एक तरफ रखा और खुद बेड पर बैठकर संजना के बारे में सोचने लगा -  “ये लड़की आखिर है कौन ?..NGO में काम करती है तो NGO वाले तो गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करने वाली का काम करते है। फिर ये मेरी लाइफ में क्या कर रही है ?... मैं न तो गरीब हूँ और न ही बेसहारा!... इसने मुझे एक सप्ताह तक और इस शहर में रूकने को कहा है।…कितने साल मैने इस शहर में गुजारे है, कभी कुछ नहीं बदला।.. एक और सप्ताह रुक लेने से क्या ही हो जायेगा!... मै अच्छे से जानता हूं कि कल के आठवें दिन मैं एक बार फिर से इस शहर को छोड़ने की तैयारी शुरू कर दूंगा और कर क्या दूंगा, ये शहर छोड़ ही दूंगा।”

सौरभ एक सप्ताह बाद शहर छोड़कर वापस जबलपुर जाने के बारे में सोच रहा था।…लेकिन, इसमें तो अभी पूरा एक सप्ताह बाकी था और उसे जरा भी अहसास नहीं था कि इस एक सप्ताह में उसके साथ क्या कुछ हो जाने वाला था!

सौरभ की सुबह हर रोज 7 बजे शुरू होती थी। लेकिन, उस दिन ऐसा नहीं हुआ।

रात को 11 बजे सोया सौरभ सुबह 4.30 बजे ही उठने के लिए मजबूर हो गया। वजह थी एक फोन कॉल!

“अब ये आधी रात में कौन कॉल कर रहा है ?” - सोचते हुए सौरभ ने अपना सिर ब्लैंकेट से बाहर निकाला और बेड के पास ही मेज पर रखा मोबाइल उठाया।

मोबाइल स्क्रीन पर संजना का नंबर फ्लैश हो रहा था।

“हैलो!” - मोबाइल कान से लगाते हुए सौरभ बोला।

“हैलो! सौरभ! गुड मॉर्निंग!” - मोबाइल के दूसरी तरफ से संजना की अट्रैक्टिव आवाज सुनाई दी।

“मॉर्निंग!” - चकित स्वर में बोलते हुए सौरभ ने मोबाइल स्क्रीन पर टाइम देखा।

4.35 बज रहे थे।

“किस मॉर्निंग की बात कर रही हो ?... अभी तो रात ही है ना!” - सौरभ की आवाज में अभी तक नींद की खुमारी छाई थी।

“नहीं है।” - संजना बोली - “और अगर तुमको ऐसा लगता भी है तो जब तक मेरे घर पहुंचोगे, तब तक तो पक्का सुबह हो चुकी होगी।”

“तुम्हारे घर! पर क्यों ?”

“मॉर्निंग वॉक के लिए।”

“मॉर्निंग वॉक!... मैं कुछ समझा नहीं।”

“समझने की जरूरत भी नहीं है। तुम बस जल्दी से मेरे घर पहुंचो।”

“ओके।” - कहते हुए सौरभ ने कॉल कट की।

“संजना क्या करना चाहती है ?” - सोचते हुए सौरभ ने खुद को ब्लैंकेट से बाहर निकाला।

वह नाइट सूट में ही नीचे पहुंचा और बाइक निकालकर संजना के घर की तरफ चल पड़ा।

बाहर अभी अंधेरा ही था।

रोड लाइट्स का हल्का प्रकाश जरूर सड़कों को रोशन कर रहा था।

कुछ ही देर बाद सौरभ, संजना के घर की बेल बजा रहा था।

संजना ने गेट खोलने में एक पल भी नहीं लगाया। सौरभ को लगा कि वह काफी देर से गेट के पास ही खड़ी बेल के ही बजने का इंतजार कर रही थी।

संजना ने भी रेड कलर का नाइट सूट ही पहना हुआ था, जिस पर सफेद फूल प्रिंट थे। उसके बाल खुले थे और पैरों में स्पोर्ट्स शूज थे।

“तो चलें ?” 

“कहां ?”

“अरे, मॉर्निंग वॉक पर और कहां!”

“ओके।” - सौरभ बोला - “और मेरी बाइक यहीं पार्क कर देता हूं।”

“नहीं, नहीं। हम तुम्हारी बाइक पर ही तो चलेंगे।”

सौरभ ने उसे अजीब नजरों से घूरा।

“बाइक पर!... मॉर्निंग वॉक!”

“अब चलो भी! इतना हैरान होने की जरूरत नहीं है। हम थोड़ा दूर चल रहे हैं। पैदल जायेंगे तो थक जायेंगे।” - कहते हुए संजना बाहर आई।

अपने पीछे उसने गेट बन्द किया और सौरभ को बाइक चलाने का इशारा किया।

जल्दी ही वे बाइक पर सवार होकर शहर की सड़कें नाप रहे थे।

“चलना कहां है ?” - सौरभ ने पूछा।

“शहर से बाहर!” - संजना बोली।

करीब 35 मिनट की ड्राइव के बाद वे शहर से बाहर ऐसी जगह जा पहुंचे, जहां हर तरफ पहाड़ और जंगल थे। 

“बस अब यहीं कहीं बाइक पार्क कर दो।” - संजना बोली।

सौरभ ने सड़क के किनारे से थोड़ा अंदर की तरफ कच्ची सड़क पर एक पहाड़ के नीचे ही बाइक रोकी और उसे लॉक करके पार्क कर दिया।

“चलो अब शुरू करते हैं अपनी मॉर्निंग वॉक!” - खुशी से चहकते हुए संजना बोली।

सुबह के 5.30 बज चुके थे। कुछ - कुछ उजाला हो चुका था।

धीमे - धीमे चलते हुए सौरभ और संजना चहलकदमी करने लगे।

उनके चारों तरफ हरे - भरे पेड़ और पहाड़ थे। एक तरह से वे किसी जंगल में ही थे। 

“कैसा लग रहा है सौरभ ?” - चलते हुए संजना ने पूछा।

“सुबह 7 बजे तक उठने वाले शख्स को 4.30 बजे ही उठाकर घर से इतनी दूर लाकर मॉर्निंग वॉक करने के लिए मजबूर करने के बाद यह सवाल कर रही हो, तो जवाब तो तुमको खुद पता होना ही चाहिए।” - सौरभ रूखे स्वर में बोला।

संजना हँसी।

“मैं समझ सकती हूँ कि सुबह इतना जल्दी उठना बहुत मुश्किल है। लेकिन, इसके अच्छे परिणाम भी जल्दी ही मिलेंगे।…जानते हो प्रकृति में अद्भुत शक्ति होती है। इससे हमें बहुत एनर्जी मिलती है।”

“हो सकता है।”

करीब आधे घंटे की वॉकिंग के बाद सौरभ को कुछ अच्छा लगने लगा।

“यहां गीली मिट्टी की जो सोंधी गंध आ रही है, उससे ऐसा लगता है जैसे कि कुछ देर पहले ही यहां बारिश हुई हो।” - सौरभ बोला तो संजना के चेहरे पर मुस्कुराहट उभर आई।

“हां। सही कह रहे हो। और ये जो हल्की ठंडी हवा चल रही है, इसको महसूस किया तुमने ?”

“हां। काफी सुकून भरा वातावरण है यहां।” - सौरभ भी खुश होते हुए बोला।

“चलो अब थोड़ा पहाड़ पर चढ़ते हैं।” - कहते हुए संजना पहाड़ की तरफ दौड़ी।

सौरभ को अब बहुत अच्छा लग रहा था।

वे पहाड़ों पर चढ़ रहे थे। वहां का वातावरण काफी अच्छा था।

बहुत देर तक वे उसी जंगल और पहाड़ में घूमते रहे।

सौरभ, जो पिछले तीन सालों से गहरी उदासी में डूबा हुआ था। आज उसे अपने अंदर से एक अलग ही खुशी महसूस हो रही थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे कई सालों बाद वह आज वाकई में खुश हुआ था।


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