उस बारिश के बाद - 21
ईशान बाइक को तेज स्पीड से दौड़ा रहा था। उसके पीछे बैठी सौम्या उससे बिल्कुल सटकर बैठी हुई थी। उसके दोनों हाथ ईशान के कंधों पर थे। सौम्या ईशान के साथ जितना खुश महसूस कर रही थी, उतना खुश उसने कभी किसी लड़के के साथ कभी महसूस नहीं किया था।
इसकी वजह शायद उसकी खूबसूरती ही थी। उसका फेयर कलर, ड्रेसिंग सेंस, अट्रैक्टिव लुक और खुद को स्पेशल समझने की वजह से वह कॉलेज में इतने लड़कों के होने के बाद भी किसी को भाव नहीं देती थी। लेकिन जब एक कम उम्र के डॉक्टर को उसने देखा तो अपने एटीट्यूड को साइड में रख कर उस पर अपना दिल हार बैठी और लाइफ के 21 सालों तक जिन इमोशंस को उसने अपने दिल में ही दबाकर रखा हुआ था, ईशान को देखते ही वे सारे इमोशंस उस पर जाहिर कर दिए।
अब तो ये हालत हो गई थी कि ईशान को देखते ही उस पर दीवानगी सी छाने लगती थी। एक पल के लिए भी वह ईशान को खुद से अलग नहीं होने देना चाहती थी।
तभी तो इस समय वह ईशान से इतनी नजदीक बैठी थी मानो वह अपने और ईशान के शरीर और रूह सबको एक कर देना चाहती हो।
रास्ते में ट्रैफिक की वजह से तो बीच - बीच में ईशान को बाइक की स्पीड अचानक कम करनी पड़ ही रही थी। साथ ही कभी कोई ब्रेकर आ जाता तब भी स्पीड कम करनी पड़ रही थी।…ऐसी स्थिति में रूह का तो पता नहीं, लेकिन दोनों के शरीर जरूर एक दूजे के करीब.. बहुत करीब आ जाते थे।
सौम्या की देह के अग्रभाग का ऐसा कोई हिस्सा बचता नहीं था, जो ईशान के पश्च भाग को छूता न हो। ऐसी कंडीशन में सौम्या की रग - रग में आनंद की लहरें दौड़ जाती थी।
करीब घंटे भर तक की ड्राइव के बाद वे शहर के बाहरी हिस्से में जा पहुंचे।
किसी भी शहर का बाहरी हिस्सा, वो इलाका होता है, जहां कोई आबादी नहीं होती, ट्रैफिक नहीं होता और ब्रेकर भी न के बराबर होते हैं।.. ऐसी जगहों पर अगर कुछ होता है तो पहाड़, प्रकृति और पेड़ पौधे!
ये इलाका भी कुछ ऐसा ही था। सौम्या आसपास की चीजों को बड़े ध्यान से देख रही थी। यहां का प्राकृतिक वातावरण उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
कुछ ही देर बाद एक जगह ईशान ने बाइक रोकी।
ये जगह एक झील के पास थी। यह झील वैसे तो प्राकृतिक झील ही रही थी। लेकिन अब इसको काफी डेवलप कर दिया गया था। इसके आसपास छोटा सा पुल बना दिया गया था, जो इसकी लम्बाई के समानांतर बना हुआ था। कई जगह छोटे - छोटे घाट बना दिए गए थे।
वैसे तो इस झील की तरफ बहुत कम लोग ही सैर सपाटे के लिए आते थे। लेकिन आज तो यहां कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था।
ईशान और सौम्या झील के पास पैदल ही चहल कदमी करने लगे। बारिश का मौसम होने की वजह से वातावरण बहुत खुशनुमा हो रहा था।
“वाऊ! इट्स अमेजिंग!” - सौम्या अपने चारों तरफ देखते हुए खुशी से चिल्लाई - “क्या मस्त जगह चुनी है तुमने ईशान!... झरने की तरफ से आने वाली ये ठंडी हवा…इट्स ग्रेट फीलिंग!”
“हां। शहर के पॉल्यूशन से दूर.. इस जगह की शुद्ध हवा सांसों में एक नई जान भर देती है।” - ईशान भी खुश होते हुए बोला।
पुल के बीच में चलते हुए सौम्या ने ईशान का हाथ अपने हाथों में लिया हुआ था। कुछ देर तक यूं ही घूमते रहने के बाद वे झील के एक घाट की सीढ़ियां उतरकर सबसे आखिरी वाली सीढ़ी पर जा बैठे। झील से आने वाली ठंडी हवा के झोंके धीरे - धीरे अपना असर दिखाने लगे। सौम्या अपने दाहिने हाथ की अंगुलियों को ईशान के बाएं हाथ की अंगुलियों में उलझाए हुए अपना सिर उसके कंधे पर रखे हुए थी। उस अद्भुत पल में उसे ऐसा लग रहा था, जैसे इस समय वह धरती पर नहीं, बल्कि स्वर्ग में थी!
यही वो पल था, जब ईशान को भी सौम्या के प्रति अपने प्यार का अहसास हो रहा था।
***
संजना के घर के बाहर खड़ा कैब ड्राइवर अभी ईशान के आने का वेट कर ही रहा था। घर के भीतर हॉल में रखे सोफे पर अभी भी सौरभ का बैग रखा हुआ था। संजना और सौरभ दोनों में से कोई भी वहां पर नहीं था।
जिस समय सौम्या बिना संजना को कुछ बताए घर से निकली थी, उस समय संजना, सौरभ को अपने साथ छत पर लेकर गई थी। इसीलिए तो सौम्या को सौरभ का बैग तो सोफे पर रखा हुआ दिखा था, लेकिन संजना और सौरभ वहां नहीं थे।
“मैं जब भी बहुत खुश या बहुत दुखी होती हूं, तो यहां आ जाती हूं।” - छत पर चहलकदमी करते हुए संजना कह रही थी - “यहां पर मुझे काफी सुकून मिलता है।”
“यहां छत पर!” - सौरभ को आश्चर्य हुआ।
“हां।” - संजना हल्के से मुस्कुराते हुए बोली - “हर किसी की लाइफ में ऐसी एक जगह जरूर होती है, जहां जाकर उसे सुकून मिलता है।”
“हो सकता है।”
“कभी - कभी हम शहर की भागदौड़ भरी जिन्दगी के इस कदर आदी हो जाते हैं कि हम भटक से जाते हैं। हमको ये तक पता नहीं होता है कि हम जो कर रहे हैं, वो सब किसलिए कर रहे हैं! और ऐसी बेमतलब की भागदौड़ हमें सिर्फ और सिर्फ थकाने का ही काम करती है।” - संजना किसी दार्शनिक की तरह बातें कर रही थी।
“तुम क्या बोल रही हो ?” - सौरभ बोला - “मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।”
“जब मैं कॉलेज में थी, तब मेरी बेस्ट फ्रेंड थी - प्रिया!” - संजना सौरभ को समझाने की कोशिश कर रही थी - “देर रात तक पार्टी करना, पब में जाकर ड्रिंक करना - इसी तरह के उसके शौक थे।.. फिर उसे एक लड़के से प्यार हो गया, जिसने बाद में उसे धोखा दे दिया।…दिल टूटने के दर्द से उबरने में उसे पूरे दो साल लग गए।”
सौरभ ने प्रश्नवाचक दृष्टि संजना पर डाली।
“तुम तो पिछले तीन साल से एक ही लड़की की वजह से अपना सब कुछ छोड़कर बैठे हो। बेवजह अपनी लाइफ तबाह करने में लगे हो। जबकि वो तो बड़े मजे से अपनी लाइफ एंजॉय कर रही है।”
सौरभ व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोला - “इन सब बातों से कोई फायदा नहीं होने वाला। मैं तो बस अपनी लाइफ वैसे ही जी रहा हूं, जैसे कि मैं जीना चाहता हूं।”
“भगोड़ा बनकर ?”
“मेरी ट्रेन का टाइम हो रहा है।” - सौरभ अचानक से बोला।
और संजना समझ गई कि वह बात खत्म करना चाहता था।
“तकलीफ हो रही है सच जानकर ?”
“मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भगोड़ा हूँ तो वही सही।” - कहते हुए सौरभ जाने लगा।
संजना ने जाते हुए सौरभ का पीछे से हाथ पकड़ लिया और बोली - “मैं तुम्हें भगोड़ा नहीं बनने दूंगी।”
संजना के हाथ की गर्माहट सौरभ को अच्छी तो लग रही थी। लेकिन, वह फालतू के इमोशंस में अब और नहीं फंसना चाहता था।
“हाथ छोड़ो संजना!” - सौरभ धीमे स्वर में बोला - “मेरी ट्रेन निकल जाएगी।"
“जिन्दगी हाथों से निकल जाए, इससे अच्छा है कि ट्रेन ही निकल जाए!” - संजना बोली - “भगोड़े मत बनो सौरभ! बहुत भाग लिए तुम!.. खुद से भी और इस शहर से भी! बस अब और नहीं!... अंकिता ने तुमको अपनी झूठी कहानी सुनाने के लिए वापस बुलाया था, लेकिन तुममें उसको सुनने की हिम्मत नहीं है! नफरत करते हो तुम उससे और सुनना नहीं चाहते उसकी बकवास!... लेकिन यह तो कायरता है। तुम कायर नहीं हो सौरभ! सामना करो उसका।…तीन साल पहले भी तो भागकर गए थे तुम! लेकिन कुछ भी भुला नहीं पाए। भागने से हालात बदल नहीं जाते, उनको बदलने के लिए तो सामना करना पड़ता है।”
“तुम्हें इन सब चीजों से क्या लेना - देना!... मेरी निजी जिन्दगी में इतना हस्तक्षेप क्यों ?”
“तुम शायद भूल रहे हो, मैं NGO में काम करती हूं और खुद से ज्यादा दूसरों की कहानियों में इंट्रेस्ट रखती हूँ।”
“तो अब मुझसे क्या चाहती हो ?”
“सब कुछ भूलने के लिए हालातों का सामना करना सीखो सौरभ!... सिर्फ एक सप्ताह और रुक जाओ इस शहर में। उसके बाद अगर तुम जाना चाहो तो मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं।”
जाने कैसी कशिश थी संजना की आंखों में, कि सौरभ उसका प्रस्ताव अस्वीकार ना कर सका।
***

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