उस बारिश के बाद - 2

 उस बारिश के बाद - 2


सौरभ इस समय जयपुर के अपने घर में था।

उसने वापसी के बारे में कभी नहीं सोचा था। लेकिन, मजबूरी इंसान से क्या कुछ नहीं करा देती!

बहरहाल, सुबह की तेज धूप ग्लास विंडो से होते हुए उसके बेडरूम में दाखिल हो चुकी थी। उसकी नींद में खलल डालने के लिए धूप की यह हल्की सी हरकत ही काफी थी।

बारिश के बाद निकली ये सुनहरी धूप किसी प्रेमिका की तरह सौरभ के पहलू में जा पसरी थी।

अलसाई हालत में उसने आंख खोली और उठकर बैठ गया।

कुछ देर तक वह बस यूं ही बैठा अपनी स्थिति पर गौर करता रहा। फिर जैसे एक दृढ़ निश्चय के साथ एकाएक ही उठ खड़ा हुआ।

वह बाथरूम में घुसा और कुछ ही देर बाद तैयार होकर बाहर निकल कर आइने के सामने जा खड़ा हुआ।

अपनी ही आँखों में एकटक देखते हुए वह खुद से ही बोला - “इस बार शिकस्त नहीं फतह होगी मेरी। क्योंकि अब मैं वह तीन साल पुराना डरा - डरा रहने वाला दब्बू सौरभ नहीं, बल्कि एक साहसी युवक हूँ।”

उसका यह आत्म वार्तालाप अभी और लंबा चलता, अगर बीच में ही उसका मोबाइल बज न उठता।

बेड के सिरहाने रखे मोबाइल की तरफ तेजी से पहुंचकर जब सौरभ ने स्क्रीन पर फ्लैश होते नंबर पर नजर डाली तो उसकी आंखों में खून उतर आया।

फ्लैश होता नंबर आकाश का था।

आकाश, जो कभी उसका बेस्ट फ्रेंड हुआ करता था। लेकिन, तीन साल पहले जो कुछ भी हुआ था, उससे साबित हो चुका था कि वह दोस्त, दोस्त नहीं बल्कि आस्तीन का साँप था।

क्रोध में कांपते हाथों से उसने मोबाइल पिक किया।

“हैलो सौरभ! वेलकम टू जयपुर।” - कॉल रिसीव होते ही मोबाइल के दूसरी तरफ से आवाज आई, जो कि निश्चित रूप से आकाश की ही थी।

“कहां हो अभी ?” - सौरभ ने शुष्क स्वर में पूछा।

“अरे भई, ये क्या बात हुई ?” - आकाश अपने सदाबहार अंदाज में बोला - “ न हाय, न हैलो, बस सीधे ही काम की बात पर आ गए! भाई दोस्त हूँ तुम्हारा। कम से कम हालचाल तो पूछ लो।”

“मुझे न तुम्हारी दोस्ती में कोई इंटरेस्ट है और न ही तुम्हारे हालचाल से कोई मतलब।” - सौरभ रूखे स्वर में ही बोला - “तो जिस काम के लिए मुझे बुलाया है तुमने उसे ही करो पूरा, ताकि मैं वापस जा सकूं।”

“ठीक है। जैसी तुम्हारी इच्छा।” - आकाश बोला - “लेकिन, अब जबकि तुम यहां आ ही गए हो तो मुझे नहीं लगता कि वापस जा पाओगे।”

“क्या मतलब ?”

“तुमको मतलब समझाने के लिए ही तो मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।”

“कहां आना है ?”

“वहीं जहां हम कॉलेज टाइम में अक्सर मिला करते थे।”

“पुरोहित कैफे ?”

“क्या याददाश्त है तुम्हारी!” - आकाश प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “तीन साल इस शहर से दूर रहने के बाद भी कुछ भूले नहीं हो तुम।”

“पहुंचता हूँ।” - फोन कट करके सौरभ ने मोबाइल पॉकेट में डाला।

रूम से बाहर निकल कर वह सीढ़ियां उतरने लगा।

नीचे उसने डायनिंग टेबल पर मां को ब्रेकफास्ट की तैयारी करते पाया।

“मैं बाहर जा रहा हूं। किसी से मिलना है।” - बेरुखी से सौरभ बोला।

“वो तो तुमको सीढ़ियां उतरते देख कर ही समझ गई थी मैं कि तुम्हे कहीं जाने की जल्दी है। पर तीन साल बाद वापस आए हो बेटा! कम से कम ब्रेकफास्ट करके तो बाहर जाओ।”

“भले ही तीन साल बाद आया हूँ। पर तीन दिन भी रुक जाऊं तो गनीमत है।” - बोलने के बाद वह एक पल भी नहीं रुका और तेजी से चलते हुए घर से बाहर निकल गया।

पीछे छोड़ गया आंखों में आंसू भरे अपनी मां को।

“पता नहीं कब तक चलेगा ये सब! आखिर कब खत्म होगी इसकी नाराजगी और कब तक महज एक इंसान की गलती की सजा ये सबको देता रहेगा ?” - खुद से ही कहते हुए मां ने अपनी आंखों से आंसू पोंछे और बेमन से ब्रेकफास्ट करने लगी।


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