मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 28

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 28


 " यह है मेरी छोटी सी लाइब्रेरी। " - सौरभ ने लाइब्रेरी के भीतर प्रविष्ट होते हुए कहा।

" यह तो बहुत बड़ी है ! " - सौरभ के पीछे - पीछे भीतर आते हुए रिचा बोली - " इन किताबों की संख्या तो हज़ारों में होगी ! "

" बैठो ! " - लाइब्रेरी में रखी एक कुर्सी की ओर संकेत करते हुए सौरभ ने कहा।

" तुम्हें किताबों का इतना ज्यादा शौक है ! " - कुर्सी पर बैठते हुए रिचा बोली।

" सिर्फ किताबें एकत्र करने का नहीं , इन्हें पढ़ने और जीवन में उतारने का भी बहुत ज्यादा शौक है मुझे। " - सौरभ बड़े फक्र से बोला - " तुम्हें जानकार आश्चर्य होगा कि यहां रखी एक - एक किताब को मैं कई - कई बार पढ़ चुका हूँ। "

" अच्छा मज़ाक कर लेते हो तुम। "

" यह मज़ाक नहीं , सच है। " - सौरभ ने सीरियस होते हुए कहा।

रिचा ने एक बार फिर लाइब्रेरी को सरसरी निगाह से देखते हुए पूछा  - " कोई इंसान इतनी सारी किताबें कैसे पढ़ सकता है ? "

" लगता है तुम किताबें बिलकुल नहीं पढ़ती। "

" कॉलेज की पढ़ाई हो जाए , वही बहुत है। " - रिचा बोली - " वैसे , ये सब किताबें तो अलग - अलग विषयों पर लिखी गयी होगी ना ! ''

" नहीं। अलग - अलग विषयों पर किताबें तो कहीं भी मिल जायेगी , अपने कॉलेज की लाइब्रेरी में भी। घर के इतने बड़े हॉल में लाइब्रेरी बनाने के पीछे मेरा उद्देश्य ही था , एक खास विषय पर ढेर सारी किताबें एकत्र करना और उन्हें गहराई से पढ़ना। "

" क्या ? " - रिचा बुरी तरह से चौंक उठी - " ये सभी किताबें किसी एक ही विषय पर लिखी हुई है ? "

" हाँ। " - सौरभ ने बताया - " ये सभी किताबें उस एक ही विषय पर लिखी हुई है , जिसमे बचपन से ही मेरी बड़ी गहरी रुचि है। "

" ऐसा कौनसा विषय है ? " - रिचा ने उत्सुकतावश पूछा।

" साइकोलॉजी ! " - हलके - से मुस्कराते हुए सौरभ ने बताया।

" इतनी सारी किताबें सिर्फ साइकोलॉजी पर ? "

" हाँ। "

" तुम बोर नहीं हो जाते एक ही तरह की किताबें पढ़कर ? "

" इंट्रेस्ट कभी बोर नहीं करता। " - सौरभ ने बताया - " इन सब किताबों का विषय भले ही एक है , लेकिन इनकी विधायें अलग - अलग है। इनमे सिर्फ आर्टिकल नहीं है , बल्कि तरह - तरह की कहानियां , उपन्यास , शोध - सब कुछ है। "

" तभी सब तुम्हारे बारे में अजीब - अजीब बातें करते हैं। "

" क्या ? .... क्या कहा तुमने ? "

" कॉलेज में सब तुम्हारे बारे में बड़ी ही अजीब बातें करते हैं। "

" कैसी अजीब बातें ? " - सौरभ ने सीरियस होकर पूछा।

" यही कि तुम थोड़े सनकी हो , पागल हो और भी पता नहीं क्या - क्या ? " - रिचा बडे ही मजाकिया मूड में बोली।

सौरभ मुस्कराया - " और तुम्हें क्या लगता है ? "

" तुम्हारी ये लाइब्रेरी और तुम्हारा इंट्रेस्ट देखने के बाद मुझे लगता है कि लोग गलत नहीं कहते। " - हँसते हुए रिचा बोली - " तुम्हारे शौक भी बड़े अजीब है सौरभ ! "

" जितने भी महान लोग हुए है , दुनिया ने पहले उनका मजाक बनाया था। "

" तुम खुद को महान समझते हो ? " - रिचा ने मजाक में पूछा।

" मैं खुद को जो समझता हूँ , वो मैं बता नही सकता। " - सौरभ गंभीर मुद्रा में बोला - " ईश्वर ना करे , कभी मुझे खुद को साबित करने की जरुरत पड़े ! "

" अरे ! तुम तो सीरियस हो गए , मैं तो बस मजाक कर रही थी। "

" खैर , जाने दो इन सब बातों को। " - सौरभ कुछ सोचते हुए बोला - " उम्मीद है , तुम भूल नहीं गयी होगी कि हम यहां आये किसलिये थे ! "

" ओह ! मैं तो सच में भूल ही गयी थी।  " - रिचा कुछ सोचते हुए बोली - " तुम तो मुझे ये बताने वाले थे ना , कि तुमको अभय के बारे में इतनी इन्फॉर्मेशन कैसे मिली ! "

" हाँ। बताता हूँ। " - सौरभ बोला - ' यह मामला भी किताबों और साइकोलॉजी से जुड़ा हुआ है। "

" हाँ , तुमने बताया था कि ये सब किताबों की बदौलत संभव हुआ है। "

" साइकोलॉजी बचपन से ही मेरा प्रिय विषय रहा है। " - सौरभ ने बताना शुरू किया - " जैसे - जैसे मैं साइकोलॉजी में घुसता गया , मानव व्यवहार के नए - नए रहस्य मेरे सामने खुलते चले गए। मैं अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को ऑब्ज़र्व करके उसके बाहरी व्यवहार से उसकी आदतों का पता लगा लेता था।  लेकिन जैसे -जैसे वक्त बीतता गया , मुझे यह आभास होने लगा कि मेरा ज्ञान अधूरा है। मानव व्यवहार के हर एक पहलू को समझने के लिए जिस व्यापक ज्ञान की जरुरत होती है , वो मुझमे नहीं था। और अधिक ज्ञान अर्जित करने की आकांक्षा ने मुझे साइकोलॉजी की नयी - नयी किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। वो कहते है ना , इंसान जितनी तेज़ी से पढता है , उससे भी दुगुनी तेजी से भूल जाता है। बस इसीलिये मुझे साइकोलॉजी की जो - जो किताबें मिलती गयी , उन सबको मैंने खरीद लिया और उसी का परिणाम है , मेरी ये लाइब्रेरी। "

सौरभ आगे बोला - " आमतौर पर लोगों का यह मानना होता है कि साइकोलॉजी पढ़ने वाले ज्यादातर इंसान दिमाग से पैदल होते है या उनके दिमाग का स्क्रू ढीला हो जाता है , लेकिन यह सच नहीं है। मैं मानता हूँ कि साइकोलॉजी पढ़ने से दिमाग अधिक तेजी से विकसित होता है।  साइकोलॉजी पढ़ने और समझने वाला व्यक्ति आम लोगों से अधिक बुद्धिमान होता है। ..... फिर , साइकोलॉजी पढ़कर बुद्धिमान बने लोग अजीब हरकतें क्यों करते हैं या लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि ये थोड़े - थोड़े पागल होते है ?...... इसका सीधा सा जवाब यह है कि जब ज्यादा बुद्धिमान लोग , कम बुद्धिमान या कुछ - कुछ मूर्ख लोगों की दुनिया में रहते हैं , तो उन कम बुद्धिमान या मुर्ख लोगों को उन बुद्धिमानो की हरकतें पागलों जैसी लगती ही है। “


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