उस बारिश के बाद - 38

 उस बारिश के बाद - 38

“तुझे समझ पाना आसान नहीं है।” - बरखा हार मानते हुए बोली - “मै पिछले तीन सालों से तेरे साथ हूँ। लेकिन, आज तक तुझे समझ नहीं पाई।”

रोशनी धीमे से मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट में ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य छिपा हुआ था।

“बाई दी वे, आज की ब्रेकिंग न्यूज सुनो।” - बातचीत का प्रसंग एकाएक ही बदलते हुए रोशनी बोली - “मेरे पापा ने मेरी शादी करने का निर्णय कर लिया है।”

“क्या!” - बरखा को बहुत ज्यादा आश्चर्य हुआ - “तुम्हारी शादी!... तुम तैयार हो इसके लिए!... तुम्हारा नेचर देखते हुए मुझे तो लगा था कि तुम कभी शादी करोगी ही नहीं।”

“अरे, तो किसने बोला कि मैं शादी कर रही हूं!”

“तो!”

“पापा ने फैसला किया है बस।.. अब उनके किए कुछ होना है क्या! आज तक उनकी कौनसी बात मानी है, जो ये मान लूंगी।”

“ओह!... वैसे लड़का है कौन ?”

“है सौरभ नाम का कोई लड़का।.. पापा के किसी बिजनेस फ्रेंड का बेटा है।”

“तो, वो आएगा तुझे देखने!”

“हो सकता है। पर, जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं पापा से उसका नंबर लेकर उसे अपनी एक फोटो भेज दूंगी। देखते ही वो मुझे रिजेक्ट कर देगा। फिर किस्सा खत्म!” - कहते हुए रोशनी जोर से हँस पड़ी।

बरखा आश्चर्य भरी नजरों से देखते हुए बोली - “रिजेक्ट होने में तुझे मजा आता है क्या!”

“अब इसका मैं क्या जवाब दूं।”

“पर, तुझे शादी करने में ऐतराज क्या है!.. बिजनेसमैन का बेटा है तो अमीर तो होगा ही, मिलकर देख ले, क्या पता हैंडसम भी हो!.. एक लड़की को इससे ज्यादा और क्या चाहिए!”

“अच्छा! बात तो तेरी सही है। पर तुझे तो पता है ना कि मैंने शादी न करने का फैसला लिया हुआ है। मैं लाइफटाइम सिंगल ही रहने वाली हूं।”

“हां, पता है। पर, रहना क्यों है तुझे सिंगल ?”

“बस मुझे अच्छा लगता है।”

***

दोपहर के दो बज चुके थे।

सनशाइन स्टील कंपनी में यह लंच का टाइम था।

यही वो वक्त था, जब रिसेप्शनिस्ट काव्या शर्मा को चौंक जाना पड़ा।

वजह यह थी कि वह आज ऐसा कुछ देख रही थी, जिसकी उसने कम से कम इस जन्म में तो कल्पना भी नहीं की थी।

रिसेप्शनिस्ट काव्या शर्मा करीब 27 वर्षीय आकर्षक सी दिखने वाली लड़की थी और शायद अपनी इसी खूबी की वजह से वह यहां रिसेप्शनिस्ट की नौकरी पाने में सफल हुई थी। नहीं तो सनशाइन स्टील कंपनी में जॉब हासिल करना कोई मजाक तो नहीं था।

कम्पनी के डायरेक्टर शलभ दीवान का बेटा सौरभ दीवान इस वक्त उसके सामने था।

“क्या बात है सर!.. आज सूरज किधर से निकला था। मतलब, आप और यहां!.. मैं तो यकीन ही नहीं कर पा रही हूं। मुझे तो लगा था कि आप कभी कंपनी में आओगे ही नहीं!” - बड़े ही उत्साहित स्वर में बोले जा रही थी काव्या शर्मा।

“तुम्हारा कहना सही है। मेरा यहां आना आश्चर्य की बात ही है। लेकिन, चिन्ता मत करो। मैं यहां अपने एक पर्सनल काम से आया हूं।”

“ओह! मुझे तो लगा था कि आपने कम्पनी ज्वॉइन करने का मन बना लिया है।”

“अभी तक तो नहीं।”

“इट्स ओके सर!.. वैसे मै आपकी हेल्प करने की पूरी कोशिश करूंगी।”

“मुझे अर्चिता से मिलना है। क्या वो इस वक्त ऑफिस में हैं ?”

“कौन अर्चिता सर ?”

“अर्चिता देसाई!.. पापा की सेक्रेटरी!”

“सेक्रेटरी!.. अर्चिता देसाई!.. जहां तक मुझे पता है। उसका नाम अर्चिता नहीं, बल्कि अनाया श्रीवास्तव है।”

“अनाया श्रीवास्तव!” - सौरभ आश्चर्य भरे स्वर में बोला - “लेकिन, पापा की सेक्रेटरी का नाम तो अर्चिता देसाई है ना!”

“नहीं है सर!” - काव्या विनम्र स्वर में बोली - “हो सकता है कि आपको कोई गलतफहमी हुई हो। आप कहें तो मैं अनाया श्रीवास्तव को बुला लूं ?”

“नहीं, मुझे कोई गलतफहमी नहीं हो रही है। मुझे अर्चिता से ही मिलना है।”

“ओके सर! आप थोड़ा वेट करिए। मैं चेक करती हूं कि कम्पनी में इस नाम की कोई एम्प्लोई है या नहीं।” - कहने के साथ ही काव्या अपने सिस्टम पर अर्चिता देसाई का नाम सर्च करने लगी।

रिजल्ट में अर्चिता देसाई नाम की एम्प्लोई मिली तो सही लेकिन वह वर्तमान एम्प्लोई नहीं थी, बल्कि भूतपूर्व एंप्लॉई थी।

“सर! आपका कहना कुछ हद तक सही है।”

“क्या मतलब ?”

“अर्चिता देसाई यहां सेक्रेटरी की पोस्ट पर थी जरूर, पर अब नहीं है।”

“मैं समझा नहीं।”

“दो साल पहले वह यहां से रिजाइन कर चुकी है।”

“क्या ?... रिजाइन कर चुकी है! पर क्यों ?”

“अब इस क्यों का मै क्या जवाब दूं सर ?.. होगी कोई वजह। यहां से अच्छा पैकेज ऑफर कर दिया होगा किसी ने।…कॉर्पोरेट वर्ल्ड में तो ये सब चलता ही रहता है।”

“अच्छा!... क्या इसका कोई  एड्रेस या कॉन्टैक्ट नंबर मिल सकता है ?”

“हां। दो साल पहले का इसका रेसिडेंशियल एड्रेस और मोबाइल नंबर दर्ज तो है यहां।…अगर अभी तक इसने एड्रेस चेंज नहीं किया होगा या नंबर बन्द नहीं किया होगा तो आपका काम बन सकता है।”

काव्या ने जो एड्रेस और मोबाइल नंबर बताया, सौरभ ने उसे नोट कर लिया।

“सर! वैसे आप क्यों मिलना चाहते हैं इस भूतपूर्व सेक्रेटरी से ?” - काव्या शर्मा के इस अप्रत्याशित सवाल ने सौरभ को थोड़ा चौंका जरूर दिया।

लेकिन, उसने बेफिक्री से जवाब दिया - “है कुछ पर्सनल काम। इस मामले में तुम अगर अपना मुंह बन्द रखो और कम्पनी के डायरेक्टर शलभ दीवान तक को इस बारे में कुछ पता न लगने दो, तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हारी सैलरी में कुछ अच्छा खासा इजाफा हो जाए।”

“अरे, बिलकुल सर!” - अपनी आवाज में शहद सी मिठास घोलते हुए काव्या बोली - “भला मैं क्यों किसी को कुछ बताऊंगी। आप निश्चिंत रहें।”

***

“अर्चिता ने दो साल पहले ही कंपनी से रिजाइन कर दिया!.. क्यों कर दिया ?” - लिफ्ट की तरफ बढ़ते हुए सौरभ सोच रहा था - “अगर उसका पापा के साथ कोई अफेयर था तो ज्यादा पैकेज के लालच में ये जॉब छोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता। अफेयर होने की स्थिति में तो ये जॉब उसके लिए वरदान की तरह थी। फिर उसने जॉब क्यों छोड़ दी ?... इसका जवाब तो अब वही दे सकती है।”

लिफ्ट से नीचे पहुंचते ही सौरभ ने जल्दी से पार्किंग प्लेस से अपनी कार निकाली और ड्राइव करते हुए ही काव्या से हासिल अर्चिता देसाई का मोबाइल नंबर टाइप किया।

किस्मत अच्छी थी उसकी, कि वह नम्बर अभी तक चालू था।

रिंग गई और जल्दी ही कॉल पिक हुई।

“हैलो!” - कॉल के दूसरी तरफ से एक आकर्षक स्त्री स्वर उभरा।

“हैलो! अर्चिता देसाई बोल रही हो ?”

“हां।…आप कौन ?”

“सौरभ दीवान!.. तुम्हारे पुराने बॉस शलभ दीवान का बेटा!”

“शलभ दीवान!... हां। याद आया।.. कहो, क्या काम है ?”

“मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।”

“मुझसे मिलना चाहते हो ?.. पर क्यों ? और वैसे भी, जहां तक मुझे पता है, तुम तो शहर से बाहर कहीं जॉब करते हो।.. अपने पापा की कम्पनी से तुम्हारा तो कोई लेना - देना भी नहीं है। फिर मुझसे क्यों मिलना चाहते हो ?”

“ये मै ऐसे कॉल पर नहीं बता सकता। बस समझ लो कि कोई बड़ी इमर्जेंसी आ गई है और तुमसे मेरा मिलना बहुत ज्यादा जरूरी है।”

“पर, अभी तो मैं ऑफिस में हूँ। शाम 7 बजे से पहले तो नहीं मिल सकती।”

“ठीक है, तो 7 बजे बाद मुझे कॉल करो।”

“ओके।”

***



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