उस बारिश के बाद - 22

उस बारिश के बाद - 22

जिस कैब से सौरभ शहर छोड़कर जाने के लिए रेल्वे स्टेशन के लिए निकला था, उसी कैब से वह वापस अपने घर लौट रहा था। 


वह नहीं जानता था कि जो वह कर रहा था, वह उसके लिए सही था या गलत!... शहर छोड़कर वापस जाने के जिस फैसले को वह अपने माता - पिता तक के लिए बदलने को तैयार नहीं था, उसी फैसले को वह एक ऐसी लड़की की सलाह पर बदलने के लिए मजबूर हो गया था जिससे वह अभी तक केवल तीन बार ही मिला था।


लेकिन वह उस लड़की से कितनी बार मिला था, इस बात का कोई ज्यादा महत्व नहीं था। अधिक महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि उस लड़की संजना ने उसके दिल के उस कोने को टच किया था, जिसे आज तक कोई छू नहीं पाया था।


आज की इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में इतना टाइम भला किसके पास है कि वह किसी और की निजी जिन्दगी में हस्तक्षेप कर सके!... कितने लोग है जो बिना किसी स्वार्थ के किसी की मदद के लिए आगे आते हैं!


जितना ज्यादा वह संजना के बारे में सोच रहा था, उसके लिए उसके मन में उतना ही सम्मान बढ़ता जा रहा था।


शहर के ट्रैफिक और भीड़ भरी सड़कों से होते हुए कब वह अपने घर तक जा पहुंचा, पता ही नहीं चला।


गेटकीपर ने कैब को रुकते और उसमें से सौरभ को निकलते देखा तो आश्चर्य तो उसे हुआ था, लेकिन कुछ भी बोले बिना उसने गेट खोलने की अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से पूरी की।


लोहे के बड़े से गेट से इंटर होने के बाद वन वे पर चलते हुए सौरभ अपने घर की मुख्य इमारत तक जा पहुंचा।


घर में दाखिल होते ही सौरभ ने पाया कि उसके पिता शलभ दीवान डाइनिंग टेबल पर बैठे डिनर कर रहे थे।


सौरभ ने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली। रात के 8 बज चुके थे। सौरभ को देखकर वे थोड़ा चौंके।


उनके पास ही खड़ी सौरभ की मां शालिनी दीवान भी आश्चर्य भरे स्वर में बोली - “सौरभ! तू तो जबलपुर की ट्रेन पकड़ने गया था। फिर.. ट्रेन मिस हो गई क्या ?”


“बाप से मिले बिना जाने का मन नहीं हुआ होगा शायद!” - सौरभ की तरफ तेज नजरों से देखते हुए शलभ दीवान बोले।


“जबलपुर जाने का प्रोग्राम मैंने कुछ दिन के लिए स्थगित कर दिया है।”


“तो, कल से अपना फैमिली बिजनेस ज्वॉइन कर रहे हो ?” - शलभ दीवान ने पूछा।


“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है।” - सौरभ ने सख्त स्वर में जवाब दिया।


“वक्त की तुम्हारे लिए कोई कीमत नहीं है। अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुमको अपनी विरासत से बेदखल करके मुझे एक ऐसी वसीयत बनानी पड़ेगी, जिसमें मेरी सारी प्रॉपर्टी किसी वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम के नाम कर दी गई हो।”


“ये आप क्या कह रहे हैं ?” - शालिनी दीवान थोड़ा घबराते हुए बोली - “सौरभ हमारा इकलौता बेटा है।”


“अपनी प्रॉपर्टी इसको सौंपकर भी क्या फायदा! ये किसी लायक नहीं लगता मुझे तो!”


“इनकी बातों पर ध्यान मत दे बेटा!.. तू थक गया होगा। आ…खाना खा ले।” - सौरभ की मां ने कहा।


“मुझे भूख नहीं है मां!” - कहते हुए सौरभ सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर चला गया।


“क्या आप सच में अपनी सारी प्रॉपर्टी यूं ही किसी को भी दान में दे देंगे ?” - शालिनी दीवान ने पूछा।


“अगर इसने अपनी जिम्मेदारी नहीं संभाली तो और कोई रास्ता है भी नहीं मेरे पास।…मेरे बाद इस कम्पनी को इसे ही संभालना है। अगर ये ऐसा नहीं करता है तो सब कुछ बेचकर सारी प्रॉपर्टी चैरिटी को ही देनी पड़ेगी।” 


“मुझे तो ये ठीक नहीं लगता।”


“या तो ये खुद से अपनी सारी जिम्मेदारी समझकर जल्द से जल्द कम्पनी ज्वॉइन कर ले या फिर इसकी शादी के बारे में हम सोचना शुरू कर दें।”


“मुझे नहीं लगता कि सौरभ अभी शादी के लिए तैयार होगा।”


सौरभ की वर्तमान हालत और फैमिली बिजनेस के प्रति उदासीनता की वजह से शालिनी दीवान तो परिचित थी। लेकिन,  शलभ दीवान इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे।…ऐसे में उनको वही रास्ता समझ में आ रहा था जो हर भारतीय पिता का अपने बेटे को जिम्मेदार बनाने के लिए समझ में आता है।…उसकी शादी करा देना!


और इसके लिए उनकी नजर में उनके ही जैसा बिजनेस घराना था। उनका बिजनेस फ्रेंड अतुल सक्सेना काफी समय से अपनी बेटी रोशनी सक्सेना की शादी उसके बेटे सौरभ से कराने की बात कर रहा था। इसके पीछे उसकी सोच थी कि इससे दोनों के बीच बिजनेस के रिश्ते ज्यादा मजबूत बनेंगे।


अब शलभ दीवान को लग रहा था कि सक्सेना के प्रस्ताव को स्वीकार करने का वक्त आ गया है।


***


शहर के बाहरी इलाके में झील के किनारे बैठकर सुहावने वातावरण का पर्याप्त लुत्फ ले लेने के बाद सौम्या और ईशान एक बार फिर से बाइक पर सवार होकर शहर की भीड़ और शोरगुल में खो चुके थे। 


दिन का समय प्रकृति के बीच बिताना हर किसी को अच्छा तो लगता है। लेकिन, रात होने पर सबको शहर की चकाचौंध ही अच्छी लगती है। दुनियाभर में अंधेरा होने के बावजूद शहर की जगमग करती लाइटें किसी को भी अपनी आकर्षित कर लेती है। सौम्या और ईशान भी इसके अपवाद नहीं थे।


रात के 9 बजे का समय हो चुका था। शहर के एक पब के बाहर ईशान ने अपनी बाइक पार्क की ही थी कि सौम्या का मोबाइल बज उठा।


पर्स में से मोबाइल निकालकर उसने मोबाइल स्क्रीन पर निगाह डाली तो उस पर संजना का नंबर फ्लैश हो रहा था।


सौम्या ने कॉल पिक की।


“हैलो, सौम्या! कहां है तू ?” - सौम्या को संजना का चिन्तित स्वर सुनाई दिया।


“मैं अपनी फ्रेंड साक्षी के साथ मार्केट आई हुई हूँ।” - बहानेबाज सौम्या को झूठ बोलने में एक पल भी नहीं लगा।


“इतनी रात को ?... वापस कब तक आएगी ?”


“घंटा भर तो और लग ही जाएगा।” - सौम्या बेफिक्री से बोली।


“ओके! अपना खयाल रखना।”


“ओके! तू टेंशन मत ले।” - कहते हुए सौम्या ने कॉल कट कर दी।


इसके बाद वह ईशान के साथ पब में दाखिल हुई।


पब में कई सारी टेबलें सजी हुई थी। लोग मेजों पर बैठे तरह - तरह की ड्रिंक्स का आनन्द ले रहे थे। हाइ वॉल्यूम में म्यूजिक बज रहा था। 


डांस फ्लोर पर कैबरे डांसर अपनी अदाओं से लोगो को लुभा रही थी। 


ईशान और सौम्या एक मेज पर बैठे।


ईशान ने बीयर ऑर्डर की। कुछ ही देर बाद वेटर की सर्व की बियर लेते हुए वे दोनों वहां के जन्नती अहसास को महसूस करने लगे।


मेजों के साथ - साथ वहां पर कुछ सोफे भी लगे हुए थे, जिन पर बैठे प्रेमी युगल एक दूसरे की बांहों में बाहें डाले प्रेम प्रदर्शन कर रहे थे। लड़कियों में से ज्यादातर ने शॉर्ट्स पहने हुए थे। 


बियर पीते हुए ईशान और सौम्या पर भी नशा हावी होने लगा। वहां सोफे पर बैठे प्रेमी युगल को सौम्या बड़े ध्यान से देख रही थी।


कुछ युगल डांस भी कर रहे थे। जैसे - जैसे रात गहराती जा रही थी, लोग शर्म- हया छोड़कर और ज्यादा फ्रैंक होते जा रहे थे। रात गहराने के साथ ही वहां मौजूद प्रेमी युगल में से लड़कियों के जिस्म पर से वस्त्र कम होते जा रहे थे और उनके साथ के पुरुषों के हाथ उनके अंदरुनी अंगों पर फिसलते जा रहे थे। 


ऐसे माहौल को देखकर एक बार फिर सौम्या पर मदहोशी सी छाने लगी। उसने ईशान को डांस के लिए बोला। जल्द ही ईशान का एक हाथ सौम्या की कमर पर था और दूसरा उसके हाथ की अंगुलियों में उलझा हुआ था।


धीरे - धीरे उनके चेहरे फिर से करीब आने लगे। सांसों में सांसें समाने लगी। होंठों में फिर से जंग छिड़ने लगी।


कुछ देर बाद तो ईशान भी इतना बेकाबू हो गया कि कब उसके हाथों ने सौम्या की कमर और उसके हाथ की अंगुलियों से अपना मुकाम उसके सीने को बना लिया, पता ही नहीं चला। कब सौम्या के रेड कलर के शर्ट के बटन खुलने लगे और कब ईशान का हाथ उसके सीने के अंदरूनी हिस्से तक जा पहुंचा, उसे अहसास भी नहीं हुआ। सौम्या की सांसों की गति भी बढ़ गई और उस पर बेचैनी सी हावी होने लगी। दोनों के ही लिए अब और अधिक समय तक खड़े रह पाना मुश्किल हो रहा था। शायद यही वजह थी कि जल्दी ही वे दीवार के सहारे लगे एक सोफे पर थे। सौम्या का शर्ट उसके जिस्म से अलग हो चुका था और ईशान के होंठ उसके सीने के अंदरूनी हिस्से में अपना सुकून तलाश कर रहे थे। जल्दी ही ईशान नशे की अधिकता से उसके सीने पर सिर रखे सो चुका था।


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